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      इस तरह के व्यवहार दूषित और अमानवीय मानसिकता है मिस्टर मीडिया !

      विडंबना यह है कि कोई भी हुकूमत अपनी आलोचना करने वालों पर यह मेहरबानी नहीं करती, जबकि देश का तंत्र कोरोना से लड़ने में नाकाम साबित हो रहा हो। इसलिए सरकारों से उम्मीद रखने के बजाय खुद पर ही भरोसा करना पड़ेगा मिस्टर मीडिया…..!

      ✍️ राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार 

      राजनामा.कॉम डेस्क।  पत्रकारों पर कोरोना काल कहर बनकर टूटा है। अपने फर्ज को अंजाम देते हमारे अनेक साथी शहीद हुए हैं। सैकड़ों पत्रकार अभी भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं।

      याद नहीं आता कि हिंदुस्तान के किसी भी पत्रकार ने इस आफत की घड़ी में अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ा हो अथवा अपनी जान बचाने का प्रयास किया हो। इस अभूतपूर्व भयावह संकट काल में यह सोचना भी फिजूल है कि किसी पत्रकार ने अपनी भूमिका के साथ बेईमानी की हो।

      ठीक उसी तरह, जैसे कि एक डॉक्टर के बारे में यह ख्याल भी नहीं आ सकता कि वह कोरोना संक्रमितों का इलाज़ करने के बजाय उनसे दूर भागने की कोशिश करेगा।

      लेकिन हाल ही में कोरोना संक्रमण से पीड़ित एक एंकर हृदयाघात से दिवंगत हुआ तो तमाम सोशल और डिजिटल माध्यमों में उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर तीखी निंदा की गई।

      यह दूषित और अमानवीय मानसिकता का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में किसी भी स्वर्गीय इंसान की आलोचना निंदनीय और घृणित माना जाता है। जीवित रहते भले ही हम उससे असहमति रखें, उससे उग्र बहस करें, मगर मौत के बाद माफ कीजिए, उनकी बुराई करने की मुहिम उचित नहीं ठहराई जा सकती।

      इसलिए वैचारिक आधार पर मूल्यांकन अच्छा नहीं है। सियासत ने हमें पहले ही बहुत से खंडों में बांट दिया है। अब और बंटवारा पत्रकारिता के लिए शुभ संकेत नहीं है।

      एक जानकारी के मुताबिक, भारत में कोविड-19 के कारण देह छोड़ने वाले पत्रकारों की संख्या ढाई सौ से अधिक है। करीब डेढ़ हजार से अधिक अभी भी पीड़ित हैं। इनमें बहुत से मामले ऐसे हैं, जिनमें पत्रकारों ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया है।

      केंद्र और राज्य सरकारों का रवैया इस चौथे स्तंभ के प्रति सम्मानजनक नहीं रहा है। इस खौफनाक दौर में ये मौतें आकस्मिक हैं और किसी पत्रकार को अपनी मृत्यु के बाद परिवार के लिए कोई आर्थिक बंदोबस्त करने का अवसर नहीं मिला है। हकीकत तो यह है कि चिकित्सा पर ही उसकी जमापूंजी खर्च हो रही है।

      कुछ उदाहरण तो ऐसे भी हैं, जिनमें पत्रकार की जान चली गई और वह अपने इलाज पर बड़ा कर्ज लिए चला गया। अब उसका परिवार यह ऋण चुकाएगा। ऐसे में सरकार का दायित्व बनता है कि कम से कम बीस-पच्चीस लाख रुपये की आर्थिक मदद उसके परिवार को दे। मगर उल्टा हो रहा है।

      इंदौर के दो पत्रकारों के परिवार को चार लाख रुपये दिलाने में उसके साथियों को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा। ऐसे मामलों में सरकारी मशीनरी की बेरुखी निंदनीय है।

      ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया’ ने अपने ताजा बयान में केंद्र सरकार के पत्रकारों के प्रति इस उदासीन रवैये पर ध्यान खींचा है।

      गिल्ड का कहना है कि सियासतदानों का पत्रकारों के प्रति यह उपेक्षा भाव ठीक नहीं है। उन्हें न तो ढंग से दवाएं मिलीं और न ही चिकित्सकीय सहयोग।

      गिल्ड ने पत्रकारों को कोरोना से बचाव के टीके लगाने में प्राथमिकता देने का आग्रह भी किया है, क्योंकि वे मोर्चे पर तैनात फ्रंटलाइन योद्धा हैं और महामारी से जुड़ी तमाम खबरें आम अवाम तक पहुंचाते हैं। सरकारों को उन्हें फ्रंटलाइन योद्धा क्यों नहीं मानना चाहिए?

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