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    सरायकेला के पत्रकारों को याद आए पूर्व उपायुक्त छवि रंजन

    एक्सपर्ट मीडिया न्यू नेटवर्क। झारखंड के सरायकेला जिले में कल जिस तरह के मामले सामने आए है। उससे निश्चित तौर पर जिले के पत्रकारों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच कड़वाहट पैदा हुई है। वहीं एक बार फिर से जिले के पत्रकारों को पूर्व उपायुक्त छवि रंजन की याद आ रही है।

    मालूम हो कि तत्कालीन उपायुक्त छवि रंजन के कार्यकाल में जिले का एक पत्रकार सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया था, जहां आर्थिक तंगी के कारण पत्रकार का महंगे अस्पताल में इलाज कराना संभव नहीं था, लेकिन जैसे ही जिले के उपायुक्त को इसकी सूचना मिली।

    saraikela dc journalist 3उन्होंने जिले के तमाम सरकारी कार्यालयों के प्रधान को अपने वेतनमान से निजी तौर पर पत्रकार के इलाज में होने वाले खर्च में सहयोग करने का फरमान जारी कर दिया।

    तत्कालीन एसपी चंदन कुमार सिन्हा ने भी सभी थाना प्रभारियों को पत्रकार के इलाज के लिए सहयोग करने का निर्देश दिया था।

    जिसका नतीजा हुआ कि लगभग 90 हजार रुपए का खर्च जिला पुलिस और प्रशासन के सहयोग से वहन करते हुए पत्रकार की जिंदगी बचाई गई थी; परिस्थितियां बदली, सरकार बदली सरकारी तंत्र बदले, लेकिन जिस तरह की घटना वर्तमान उपायुक्त के कार्यकाल में घटित हुई उससे पूरा पत्रकारिता जगत स्तब्ध है।

    कल जिले के वरिष्ठ पत्रकार बसंत साहू को जिला पुलिस ने बीडीओ चांडिल की शिकायत पर गैर जमानती धारा 353, यानी सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने जैसे संगीन अपराध के तहत गिरफ्तार कर पिछले दरवाजे से जेल भेज दिया।

    बीते 20 मई को जिले में पहला कोरोना पोजेटिव मरीज पाया गया था, इसको लेकर तमाम मीडिया संस्थान प्रशासनिक पुष्टि किए जाने को लेकर जिले के उपायुक्त व प्रशासनिक पदाधिकारियों से संपर्क साधने में जुटे थे, लेकिन जिले के उपायुक्त ने अंत तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की।

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    इससे झल्ला कर एक निजी चैनल का झारखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार बसंत साहू ने उपायुक्त को फोन लगाया, जिस पर उपायुक्त ने झल्लाकर पत्रकार से यह कहा कि कहीं कुछ नहीं हुआ है, सब ठीक है, आराम से घर में सो जाओ, जबकि पूरे राज्य में इसकी चर्चा फैल चुकी थी, कि जिले में पहला कोरोना पॉजिटिव पकड़ में आया है।

    ऐसे में आप सब समझ सकते हैं कि मीडिया संस्थानों का स्थानीय पत्रकारों पर कितना दबाव होगा। उधर बसंत साहू ने सरायकेला-खरसावां जिला के लिए बनाए गए आईपीआरडी ग्रुप में उपायुक्त द्वारा किए गए बर्ताव से संबंधित ऑडियो डाल दी।

    जिसे उपायुक्त ने गंभीरता से लेते हुए पहले बसंत साहू को ग्रुप से हटाया, उसके बाद चांडिल बीडीओ को बसंत साहू के खिलाफ चौका थाना में मामला दर्ज कराने का निर्देश दिया।

    इस पर बीडीओ चांडिल ने संज्ञान लेते हुए आईपीसी की धारा 353, 156, 505 (1b), आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत धारा 51 और धारा 54, महामारी अधिनियम 1897 के तहत धारा 3 जैसे गंभीर धाराएं लगाकर आनन-फानन में बगैर आधिकारिक पुष्टि किए जेल भेज दिया।

     सवाल उठता है कि आखिर बसंत साहू ने कितना बड़ा अपराध किया ? क्या जिले के उपायुक्त सह नोडल पदाधिकारी होने के नाते उनकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि जिले के पत्रकारों को कोरोनावायरस से संबंधित पर्याप्त जानकारी उपलब्ध कराई जाए, ताकि पत्रकार भ्रमित ना हो, और गलती से कहीं गलत खबर ना बना दे ?

    क्या इसके लिए जिले के उपायुक्त पर कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।

    वैश्विक संकट के इस दौर में जिले के उपायुक्त द्वारा भले यह दावा किया जा रहा हो कि वे काफी चिंतित हैं, काफी परेशान हैं, लेकिन क्या पत्रकारों की भूमिका को नजरअंदाज किया जा सकता है ?

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    वैसे निश्चय ही दुर्भावना से ग्रसित होकर यह कार्रवाई किए जाने की बात सामने आ रही है। इसको लेकर जिले के पत्रकारों में रोष भी है।

    उधर जनरलिस्ट यूनियन ऑफ झारखंड ने मामले पर संज्ञान लेते हुए राज्य के मुख्यमंत्री को मामले से अवगत करा दिया है। इसके अलावा प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी अवगत करा दिया गया है। जल्द ही मामले पर बड़ा फैसला आ सकता है।

    वहीं स्थानीय पत्रकारों से जब इस बाबत जानकारी ली गई, तो उनके द्वारा जिले में कभी भी ऐसी घटना नहीं होने की बात कही गई।

    पत्रकारों ने तो यहां तक बताया कि यही राज्य का इकलौता जिला है, जहां घायल पत्रकार के इलाज में जिला पुलिस और प्रशासन ने पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन अचानक से इस वैश्विक संकट के दौर में एक पत्रकार के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई लोगों को हैरान कर सकती है।

    राज्य सरकार को इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। अन्यथा जिले में पत्रकार और प्रशासन के बीच एक गहरी खाई बन सकती है।

    हालांकि इस संबंध में जिले के उपायुक्त ने रांची के एक पत्रकार संगठन के नेता को कहा है, कि उन्हें जिले के एक दो पत्रकारों ने ही यह कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया है।

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    अगर ऐसी बात है तो हम उन पत्रकारों के नाम का खुलासा नहीं कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि हम सब की गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं। जरूरत पड़ी तो उनके नामों का भी खुलासा कर सकते हैं।

    सवाल है कि बीडीओ चांडिल यह साबित करे, कि जिस दिन बसंत साहू ने आईपीआरडी ग्रुप में ऑडियो वायरल किया है, उस वक्त वे उस ग्रुप में मौजूद थे। आखिर कैसे उन्हें इसकी जानकारी मिली कि बसंत साहू ने ऑडियो वायरल किया है ?

    क्या जिले के उपायुक्त के निर्देश पर उन्होंने इसकी पुष्टि की? अगर पुष्टि की, तो क्या उस वायरल ऑडियो में उपायुक्त की भाषा मर्यादित थी?  क्या उन पर ऐसे गंभीर मामले पर सच छुपाने का आरोप साबित नहीं होता है ?

    बहरहाल, ऐसे कई सवाल है, जिसका जवाब देना जिले के उपायुक्त के लिए संभव नहीं ? भले स्थानीय पत्रकार इस मामले में चुप्पी साध रखे हो, लेकिन यह घटनाक्रम एक बड़ा सवाल छोड़ रहा है। आने वाले दिनों में सब तैयार रहें।

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