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    …तो अब कोई पत्रकार की मदद करने नहीं आएगा

    सरायकेला (राजनामा.कॉम)। एक कहावत है ‘का से करूं सिंगार, जब पिया मोर आन्हर’ यानी उस दुल्हन का श्रृंगार किस काम का जिसकी  पिया यानी पति ही अंधा हो। यहां हम बात कर रहे हैं झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले की। जहां बीते शनिवार को एक नाटकीय घटनाक्रम में एक निजी चैनल के पत्रकार बसंत साहू को जिले के उपायुक्त ए दोड्डे के निर्देश के बाद बीडीओ चांडिल की शिकायत पर चौका थाना प्रभारी ने बगैर आरोपों की सत्यता की जांच किए आनन-फानन में गलत धाराएं लगाकर जेल भेज दिया था।

    वैसे पत्रकार का दोष इतना था कि उसने जिले में पहला कोरोना प्रोजेक्टिव मरीज पाए जाने की सूचना जिले के उपायुक्त से फोन पर मांगी थी, जिस पर उपायुक्त ने पत्रकार बसंत साहू को बेहद ही गैर जिम्मेदाराना जवाब देते हुए कहा था,  कहीं कुछ नहीं हुआ है चुपचाप घर में सो जाओ।

    उसके बाद पत्रकार बसंत साहू ने डीसी द्वारा दिए गए जवाब की ऑडियो जिले के आईपीआरडी ग्रुप में यह कहते हुए वायरल कर दी, कि उपायुक्त सरायकेला खरसावां मुझे बोला कि आराम से सो जाये ईचागढ़ में कुछ नहीं है, वहीं डॉक्टर जुझार मांझी बोल रहा है कि 29 आदमी के साथ मुम्बई के ठाणे से ईचागढ़ आया था, जिसमें एक कोरोना पोजेटिव पाया गया हौ।

    दोनों पदाधिकारी का बात सुन लिजिए, पत्रकार को किस तरह गुमराह करते हैं पदाधिकारी जबकि चैनल पर प्रसारित हो रहा है, ओर हमलोग हाथ धरे बैठे हैं। जिला प्रशासन जमशेदपुर के खाते में दिखाना चाहते हैं। शायद सरायकेला खरसावां उपायुक्त अभी तक पुष्टि नहीं किया है। सुबह का इंतजार करना होगा। उपायुक्त के पुष्टि से ही समाचार प्रकाशित होगा।

    हालांकि उस दिन ग्रुप के कुछ अन्य पत्रकार भी जिले के उपायुक्त से पॉजिटिव मरीज के संबंध में पुष्टि को लेकर जानकारी मांगते रहे, लेकिन उपायुक्त ने पुष्टि नहीं की। वैसे पूरे राज्य में जिले में पॉजिटिव मरीज पाए जाने की सूचना वायरल हो चुकी थी।

    हालांकि पत्रकारों को कोविड-19 से संबंधित जानकारी जिले के उपायुक्त द्वारा ही दिए जाने का प्रावधान है। खैर अगले दिन उपायुक्त ने बसंत साहू के ऑडियो और पोस्ट पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बसंत साहू को ग्रुप से बाहर कर दिया। ग्रुप के अन्य पत्रकारों को लगा चलो गलती बसंत साहू ने की थी। बाहर कर दिए गए।

    इन सबके बीच बीते शनिवार को अचानक बसंत शाहू को बीडीओ चांडिल की शिकायत पर आईपीसी की धारा 353, 156, 505 (1b) आपदा अधिनियम 2005 के तहत धारा 51 और 54 के अलावा महामारी अधिनियम 1800  की धारा 3 जैसे  गंभीर  आरोप  लगाते हुए  चौका थाना पुलिस  द्वारा जेल भेज दिए जाते हैं।

    इस पर जिले के कुछ पत्रकारों  ने कड़ी आपत्ति जताते हुए विरोध शुरू कर दिया। उधर देखते ही देखते विरोध की चिंगारी राजधानी रांची सहित राज्य के अन्य जिलों में जा पहुंची।

    फिर क्या था, पूरे राज्य के पत्रकार पहली बार एक बड़े आंदोलन की रूपरेखा तय करने में जुट गए। पत्रकार के खिलाफ शुरू हुए इस आंदोलन में राज्य की मुख्य विपक्षी दल भाजपा  ने भी सरकार और स्थानीय प्रशासन को आड़े हाथ लेते हुए ट्विटर पर सरकार और सरकारी तंत्र पर हमला करना शुरू कर दिया।

    इनमें से मुख्य रूप से रांची सांसद संजय सेठ, पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश सहित मीडिया और कारपोरेट जगत के लोगों ने भी इस घटना पर ट्विटर वॉर शुरू कर दिया। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इस मामले पर संज्ञान ले लिया।

    इधर रांची प्रेस क्लब ने भी खुलकर सरकार से आर-पार की लड़ाई लड़ने की ठान ली। सभी एकमत से पत्रकार को बाइज्जत बरी किए जाने की मांग करने लगे। रांची प्रेस क्लब ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात कर 24 घंटे के भीतर पत्रकार बसंत साहू को बाइज्जत रिहा किए जाने की मांग की।

    प्रेस क्लब ने एलान किया कि जब तक बसंत साहू बाइज्जत बरी नहीं किए जाते, वे काला बिल्ला लगाकर काम करेंगे। वहीं हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव रंजन ने हाईकोर्ट में इस कार्रवाई के खिलाफ पीआईएल भी दाखिल कर दिया।

    मामला बिगड़ता देख सरायकेला- खरसावां पुलिस प्रशासन ने कूटनीतिक खेल शुरू कर दिया। जहां एक समय ऐसा लगने लगा था कि मामले पर सरकार  कड़े फैसले  ले सकती है, लेकिन कुछ स्थानीय पत्रकार संगठनों और चाटुकारों का सहारा लेकर प्रशासन  पूरे आंदोलन को कुंद करने में जुट गई। इसमें वैसे चेहरे सामने आए जिसे पत्रकारिता का ककहरा भी नहीं पता।

    राज्य और जिले के पत्रकारों का बड़ा वर्ग जिले के उपायुक्त और एसपी से मिन्नत फरियाद न करने पर अड़े रहे। वहीं दूसरी तरफ चाटुकार संगठनों के पत्रकारों ने बसंत साहू के परिजनों को आगे कर उपायुक्त और एसपी के समक्ष पत्रकार को रिहा किए जाने की फरियाद कर बैठे।

    मौके की नजाकतता को देखते हुए जिला प्रशासन ने पत्रकार के परिवार का हवाला देते हुए यह भरोसा दिलाया कि वे जमानत की अर्जी दे प्रशासन न्यायालय से जमानत दिए जाने की अपील करेगी।

    वैसे चाटुकारों ने यह अफवाह उड़ाई कि जिले के एसपी ने उन्हें भरोसा दिलाया है, कि पत्रकार पर दर्ज गैर जमानती धारा 353 हटाने का भरोसा दिलाया गया है, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

    बसंत साहू को सभी धाराओं के साथ बांड बेल यानि सशर्त जमानत दी गई। चूंकि मामला इतना हाईप्रोफाइल हो चुका था कि इस मामले में हर हाल में जमानत मिलनी ही थी। जिसे स्थानीय चाटुकार पत्रकार अपनी जीत मान बसंत साहू के साथ जश्न मनाते फोटो वायरल कर रहे हैं, उनके लिए यह जीत पत्रकार की जीत नहीं, बल्कि एक बड़ी नैतिक हार मानी जा रही है। राज्य भर के पत्रकारों में इसको लेकर घोर नाराजगी है।

    गौरतलब है कि पहली बार राज्य के पत्रकार किसी बड़े आंदोलन की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन चाटुकारों के कारण यह आंदोलन ठंडा पड़ गया। वैसे इस आंदोलन को सबसे बड़ा झटका उस वक्त लगा जब रिहाई के बाद खुद पत्रकार बसंत साहू ने अपनी भूल मानी और प्रशासन से किसी तरह की कोई वैमनस्यता नहीं होने की बात कही।

    चाटुकार पत्रकारों ने बसंत की सशर्त जमानत के बाद फूल माला से लदा एक वीडियो भी स्थानीय सोशल मीडिया ग्रुप और स्थानीय समाचार चैनलों पर भी वायरल किया। जिसमें बसंत साहू यह कहते सुने जा रहे हैं कि जो हुआ सो हुआ गलतफहमी में ऐसा हुआ, मुझे प्रशासन से कोई गिला शिकवा नहीं।

    जिन पत्रकारों ने मुझे बाहर निकालने में सहयोग किया उनका भी धन्यवाद, प्रशासन का भी धन्यवाद। पत्रकार का कोई दोस्त नहीं होता कोई दुश्मन नहीं आगे से मिलकर काम करेंगे।

    एक अन्य वीडियो में बसंत साहू यह कहते सुने जा रहे हैं कि मैं बसंत कुमार साहू अभी जेल से निकला हूं, न प्रशासन का दोष, न मेरा दोष, जो भी मनमुटाव था, सब समाप्त हो गया.

    वैसे बसंत साहू के ये दो वीडियो वायरल होने के बाद राज्य भर में आंदोलन कर रहे पत्रकारों को गहरा धक्का लगा। जहां पत्रकार यह कहते सुने गए की बसंत साहू बाहर जरूर आ गया, लेकिन पत्रकारिता जेल की चारदीवारियों के पीछे ही रह गया।

    रांची प्रेस क्लब के एक वरिष्ठ पत्रकार ने तो यहां तक कह डाला कि एक बड़ी भूल हो गई। उन्हें अगर पत्रकार बसंत साहू के कैरेक्टर की पूर्व से जानकारी होती तो शायद कभी इस प्रकरण को आंदोलन का रूप लेने नहीं देते।

    वैसे रांची शिफ्ट होते ही कई दिग्गज पत्रकारों ने इस प्रकरण को आंदोलन का रूप देने में अहम भूमिका निभाई थी, जो जायद भी था और इसमें पत्रकारिता की जीत तय थी, लेकिन चाटुकार पत्रकारिता लॉबी  के चक्कर में आकर बसंत साहू ने पूरा खेल बिगाड़ दिया।

    हालांकि बसंत साहू के इस रुख से राज्य में आने वाले दिनों में पत्रकारों के लिए आंदोलन खड़ा करना मुश्किल हो जाएगा। वैसे भी वैश्विक संकट के इस दौर में राज्य के अलग-अलग हिस्सों से पत्रकार उत्पीड़न के कई मामले सामने आए हैं, लेकिन पहली बार इस मामले में राज्य के पत्रकारों को लगा कि वाकई में बसंत साहू इस प्रकरण में निर्दोष है और उन्हें संघर्ष करना चाहिए।

    सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, लेकिन प्रशासनिक कूटनीति के चक्कर में पड़कर चाटुकार पत्रकारों ने ऐसा कुकर्म कर दिया, जिससे आने दिनों में पत्रकार प्रताड़ना के मामलों में बढ़ोतरी होगी और फिर कोई पत्रकार या पत्रकार संगठन किसी मामले में हाथ जलाना नहीं चाहेगा।

    हालांकि जहां तक पता है, कि पत्रकार बसंत साहू पूर्व में भी विवादों में रहा है और प्रशासन के साथ उसका विवाद कोई नई बात नहीं है। प्रशासन ने भी इस मामले में उसे बैकफुट पर लाने के लिए उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया। जिससे बसंत साहू को बैकफुट पर आना पड़ा।

    लेकिन आंदोलन कर रहे पत्रकारों को ये नहीं पता था कि यह पत्रकार कम है। तभी तो दलालों के चक्कर में उसने आंदोलन कर रहे पत्रकारों को भी ठेंगा दिखा दिया और पत्रकारिता के माथे पर एक बड़ा कलंक लगा दिया।

    बसंत साहू के रवैये से राज्य के बड़े-बड़े पत्रकार मर्माहत हैं। जहां उसके जमानत पर रिहा होने की खबर सुनते ही सभी आंदोलनकारी पत्रकारों ने काला बिल्ला उतार अपनी नैतिक हार स्वीकार कर ली।

    हां देर रात बसंत साहू के चौका स्थित आवास पर जश्न जरूर मनाया गया। जिसमें शामिल पत्रकारों की पूरी सूची उपलब्ध है, लेकिन प्रमाण नहीं दे सकता, क्योंकि पत्रकारिता कलंकित होगी।

    हां इतना जरूर है कि उस जश्न में वैसे पत्रकार भी शामिल थे, जिन्होंने बसंत साहू को पिछले दरवाजे से जेल भेजे जाने का राज छुपाने का प्रयास किया था। वो तो भला हो सरायकेला सदर अस्पताल के एक सूत्र का जिसने ऐन वक्त पर पत्रकार बसंत साहू को पहचान लिया, और इसकी सूचना स्थानीय कुछ पत्रकारों को दी। 

    जिसके बाद स्थानीय पत्रकारों ने जमशेदपुर और चाईबासा के पत्रकारों के साथ मिलकर एक ऐसा आंदोलन खड़ा कर दिया, जिसमें रांची, धनबाद, दुमका, देवघर, गिरीडीह आदि जिलों के भी पत्रकार आंदोलन में कूद पड़े थे।

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