डीसी का गैर जिम्मेदाराना ऑडियो वायरल करना वरिष्ठ पत्रकार को पड़ा महंगा पिछले दरवाजे से भेजे गए जेल

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राज़नामा.कॉम।  वैश्विक संकट के दौर में सरायकेला-खरसावां जिला के पहले एक्रिएटेड पत्रकार बसंत साहू को जिले के उपायुक्त के निर्देश पर जेल भेज दिया गया। वो भी पिछले दरवाजे से।

बसंत साहू सहारा समय के सीनियर जर्नलिस्ट हैं। इस संबंध में न मीडिया को जानकारी दी गई न ही, उनका अपराध बताया गया।

वैसे मामला बीते 19 तारीख का है। जब जिला में पहला कोरोना पोजेटिव का मामला आया, पूरे राज्य में इसको लेकर ढिंढोरा पिट गया, लेकिन जिले के उपायुक्त से स्थानीय मीडियाकर्मी घण्टों पुष्टि के लिए आग्रह करते रहे, न तो जिले के उपायुक्त ने आधिकारिक पुष्टि की, न ही सिविल सर्जन ने।

इसी बीच चांडिल निवासी सहारा समय के झारखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार बसंत साहू ने जब इस मामले में जिले के उपायुक्त से बात किया तो उन्होंने बेहद ही गैर जिम्मेदाराना बयान देते हुए कहा कहीं कुछ नहीं आया है, कोई मामला नहीं है। जाओ सो जाओ।

अब सवाल यह उठता है कि पूरे राज्य में इस बात का ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि जिले में पहला कोरोना पॉजिटिव पाया गया और जिला का अधिकारी एक सीनियर पत्रकार से इस तरह बात कर रहा है। निश्चित तौर पर पत्रकार को बुरा लगेगा ही।

उसने डीसी द्वारा दिए गए जवाब का ऑडियो स्थानीय मीडिया कर्मियों के लिए बनाए गए आईपीआरडी ग्रुप में डाल दी, जिससे अगले दिन खफा होकर उपायुक्त ने बसंत साहू को ग्रुप से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

इधर आज अचानक बसंत साहू को उपायुक्त के निर्देश पर सरायकेला पुलिस ने जेल भेज दिया। बताया जाता है कि किसी बीडीओ के शिकायत पर यह कार्रवाई की गई है। हालांकि इस संबंध में जिला प्रशासन या पुलिस की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई है।

वैश्विक संकट के इस दौर में सरायकेला- खरसावां जिला प्रशासन का यह चेहरा निश्चित तौर पर काफी डरावना प्रतीत हो रहा है। खासकर मीडिया कर्मियों के लिए।

सवाल यह उठता है कि स्थानीय मीडिया कर्मियों ने जिला प्रशासन के इस रवैया के खिलाफ कोई आवाज क्यों नहीं उठाई। वैसे यह पहला मौका नहीं है, जब सरायकेला- खरसावां प्रशासन ने पत्रकार को जेल भेजा है।

इससे पूर्व भी जिले में ऐसी घटना घट चुकी है। एक तरफ दिन-रात पत्रकार जान जोखिम में डालकर  पत्रकारिता कर रहे हैं जिन्हें ना तो  संस्थान की ओर से पूरा सहयोग मिल रहा है, ना ही सरकार की ओर से।

ऐसे में जिला प्रशासन अगर इस तरह से दुर्भावना से ग्रसित होकर कार्रवाई करती है,  तो  निश्चित तौर पर झारखंड सरकार के लिए यह एक बेहद ही शर्मिंदगी भरा मामला कहा जा सकता है।

खासकर वैसे मीडिया कर्मियों के लिए जो पूरे प्रकरण को जानते हुए भी अंजान बने बैठे हैं, क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि आज बसंत साहू तो कल उनकी बीमारी हो सकती है।

यहां यह भी बता दें कि इसी संक्रमण काल के दरम्यान जिले के उपायुक्त के निर्देश पर सरायकेला नगर पंचायत के उपाध्यक्ष मनोज चौधरी को धोखे से थाना बुलाकर पिछले दरवाजे से जेल भेजा गया था। हालांकि अगले ही दिन उन्हें जमानत मिल गई थी।

ऐसे में यह कहा जा सकता है कि जिले के उपायुक्त के खिलाफ बोलने वालों को सीधे जेल में डाल दिया जाएगा। चाहे वह जनप्रतिनिधि हो या पत्रकार।

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