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    कोविड के चलते भारत में हुई मौतों पर अमेरिका के अखबार की खबर है चर्चाओं में !

    राजनामा.कॉम डेस्क। कोरोना कोविड 19 के संक्रमण के चलते देश में कितने लोग कालकलवित हुए हैं, अर्थात कितने लोगों ने दम तोड़ा है इस बारे में कुहासा अब तक हट नहीं सका है। कहीं सवा पांच तो कहीं पांच लाख लोगों के कालकलवित होने की बात कही जा रही है।

    कोविड की दूसरी लहर मार्च 2021 से मई 2021 के बीच मानी गई थी। इस दौरान देश भर में कितने लोगों ने कोविड के चलते दम तोड़ा यह बात भी रहस्य ही बनी हुई है। आखिर इस बात का खुलासा केंद्र सरकार या सूबाई सरकारें क्यों नहीं करना चाहतीं। सरकार तो सरकार विपक्ष भी इस संवेदनशील मामले में जबड़े भींचे ही नजर आता है।

    इधर, देश में कोविड 19 के संक्रमण के चलते हुए मौतों की संख्या पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा अनुमान ने ठहरे हुए पानी में कंकर मारकर लहरें पैदा कर दी हैं।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन अर्थात डब्लूएचओ के द्वारा आधिकारिक तौर पर आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं, किन्तु अमेरिका के एक अखबार के द्वारा डब्लूएचओ के प्रतिवेदन का एक हिस्सा प्रकाशित किए जाने के बाद मामला तूल पकड़ता दिख रहा है। मौका मिलते ही विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने सरकार पर मौत के आंकड़े छुपाने के आरोप भी लगा दिए हैं।

    केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया से चर्चा के दौरान कहा कि भारत सरकार के द्वारा इस विषय में अनेक आपत्तियां जताई गई हैं, जिसमें अनेक विषयों पर विस्तार से विमर्श होना बाकी है।

    सूत्रों का यह भी कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को अभी बहुत सारे सवालों के जवाब भी देना शेष है।

    सूत्रों का यह भी कहना है कि भारत जैसे विशाल भूभाग वाले देश में वे ही मापदण्ड कैसे लागू किए जा सकते हैं जो बहुत कम क्षेत्रफल और आबादी वाले देश ट्यूनीशिया में लागू किए गए हैं। इस तरह इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता के आधार पर इसे सिरे से खारिज भी किया जा सकता है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा टियर वन कंट्री अर्थात प्रथम पंक्ति के स्तरीय देशों में कोविड से हुई मौतों के संबंध में उन देशों के आधिकारिक सरकारी आंकड़ों को आधार बनाया है तो दूसरी और भारत गणराज्य के डेढ़ दर्जन राज्यों में गैर सरकारी आंकड़ो को आधार बनाया गया है।

    डब्लूएचओ आखिर इस तरह के दोहरे मापदण्ड कैसे अपना सकता है। भारत के द्वारा यह बात काफी पहले से कही जा रही है, इसलिए डब्लूएचओ यह नहीं कह सकता है कि भारत के द्वारा इस रिपोर्ट को लीक होने के बाद इस तरह की बात कही जा रही है।

    वैसे भारत में कोविड के संक्रमण के चलते वास्तव में कितने लोगों ने दम तोड़ा है और कितने लोगों की मौत को रिकार्ड में लिया गया है इस बारे में शुरू से ही विरोधाभास की स्थिति बनी रही। सोशल मीडिया, प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया में दूसरी लहर के दौरान भयावह स्थिति को जिस तरह से चित्रित किया गया। उसके बाद कुछ कहने को नहीं रह जाता है।

    दरअसल, कोविड संक्रमित मरीजों को सरकारी अस्पतालों में कोविड सस्पेक्टेड वार्ड में रखा जा रहा था। इनकी जांच के उपरांत अगर वे पाजिटिव आते तब उन्हें कोविड वार्ड में भेजा जाता।

    उस समय कहा जा रहा था कि सरकारी अस्पतालों में कोविड की जांच भी बहुत ही धीमी गति से हो रही थी, इसी बीच कोविड सस्पेक्टेड वार्ड में किसी का निधन हो जाता तो उसे कोविड से हुई मौत नहीं माना जा रहा था, क्योंकि उसकी कोविड की जांच हुई ही नहीं।

    हां, यह जुदा बात थी कि उसके शव को परिजनों को न सौंपकर कोविड प्रोटोकाल के तहत ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाता। एक बात और अगर देश भर के जिलों के जन्म मृत्यु प्रमाण पत्रअगर देख लिए जाएं तो मार्च 2021 से जून 2021 के बीच कितने मृत्यु प्रमाण पत्र बने और हर माह का औसत इससे इतर कितना निकलता है इसका अगर अध्ययन कर लिया जाए तो वास्तविकता अपने आप सामने आ सकती है।

    बहरहाल, विश्व स्वास्थ्य संगठन के जिम्मेदारों को खतो खिताब और वर्चुअल बैठकों के जरिए भारत सरकार के द्वारा अपने पक्ष से आवगत कराया जाता रहा है।

    मजे की बात तो यह है कि अमेरिका के अखबार के द्वारा जो रिपोर्ट छापी है, उसमें भारत में कोविड से हुई मौतों के आंकड़े तो हैं पर टियर वन देशों के आंकड़े उसके द्वारा प्रकाशित नहीं किए गए हैं, इससे यही लग रहा है मानो यह खबर प्रायोजित तरीके से ही प्रकाशित करवाई गई हो।

    डब्लूएचओ के सूत्रों के हवाले से अमेरिका के अखबार ने जो रिपोर्ट छापी है उसका भारत सरकार की ओर से प्रतिकार भी नहीं किया गया है।

    दरअसल कोविड एकदम नई बीमारी थी, और उसका नियंत्रण, इलाज, तीमारदारी आदि के मामले में ज्यादा मालुमात नहीं होने की दशा में चूक होना बहुत स्वाभाविक ही माना जा सकता है, क्योंकि दूसरी लहर की तीव्रता बहुत ज्यादा ही रही।

    वैसे देखा जाए तो डब्लूएचओ के द्वारा कोविड को लेकर अगर आंकलन किया जा रहा है तो यह आंकलन भारत सहित किसी भी देश की स्वास्थ्य सुविधाओं, स्वास्थ्य तंत्र, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आदि की दृष्टि से भविष्य के लिए एक सबक ही माना जा सकता है, जिसे पूरी तरह पारदर्शी एवं विश्वसनीय बनाए जाने की दरकार है।

    आने वाले समय में भारत सरकार को इस बात पर विचार जरूर करना चाहिए कि उसे अगर कुछ निशुल्क करना है तो वह सिर्फ और सिर्फ स्वास्थ्य एवं शिक्षा को ही निशुल्क करे।

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