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    मीडिया द्वारा देशद्रोही-खालिस्तानी-नक्सली-कांग्रेसी कहने से आहत आंदोलनकारी किसानों ने निकाला यूं अपना ‘ट्रॉली टाइम्स’!

    "खीचों न कमानों को न तलवार निकालों,जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालों"

    राजनामा.कॉम। ‘अकबर’ इलाहाबादी की इस अमर वाक्य की मिसाल पेश की है दिल्ली में 20दिनों से भी ज्यादा समय से डटे आंदोलनकारी किसानों ने।विवादित कृषि बिल के खिलाफ दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के लिए जमे किसानों ने अपना अखबार निकाल कर एक और नई, अनोखी मिसाल पेश की है।

    किसानों ने 18 दिसम्बर को अपना नया अखबार “ट्रॉली टाइम्स” का प्रकाशन शुरू किया है। किसानों का यह अखबार सप्ताह में दो दिन प्रकाशित होगा।

    गुरुमुखी और हिंदी में निकले यह अखबार ने पहले ही दिन काफी लोकप्रियता बटोर ली। पहले ही दिन 2000 कापी बिक गई। इस अखबार को निकालने में लगभग 60लोगो की एक टीम लगी हुई है।

    महात्मा गांधी भी खुद एक पत्रकार थे। वे कहा करते थें कि -“मजदूर और किसान मेरे पाठक है।यही असली भारत है।”

    इसलिए महात्मा गांधी ने भी जंगे आजादी में अपना अखबार निकाला। यहां तक कि समाज सुधारक राजाराम मोहन राय ने भी अखबार निकाला। अपने अखबार “मिरातुल अखबार’ में सामाजिक बुराईयों पर प्रहार किया। महात्मा गांधी और राजाराम मोहन राय के नक्शे कदम पर दिल्ली में जमे किसान चल रहे है।

    कृषि बिल के विरोध में पंजाब, हरियाणा, यूपी-उतराखंड के किसान पिछले माह से ही दिल्ली-यूपी,दिल्ली-पंजाब के विभिन्न बार्डर पर जमे हुए है।

    वे अपनी खेती, फसल और जमीन बचाने के लिए सर्दी की इस भीषण सर्द रात में खुले आसमान के नीचे, ट्रैक्टर ट्रालियों में रात गुजार रहे है, जीवन से संघर्ष कर रहें है। जिसको मीडिया देशद्रोही, खालिस्तानी, नक्सली, कांग्रेसी किसान बताने में जरा सा भी संकोच नही कर रहा है।

    आंदोलकारी किसानों ने भी समझ लिया है कि उनकी यह लड़ाई लंबी चलने वाली है,मोदी सरकार अबांनी-अडानी को नाराज नही कर सकती है। सरकार के लिए किसान देश का नागरिक,अन्नदाता नही है। किसानों के खिलाफ सरकार, केंन्द्रीय मंत्रियो और मीडिया के दुष्प्रचार के खिलाफ उससे खुद निपटना होगा।

    इसलिए टिकरी बॉर्डर पर किसानों ने चार पेज का अपना एक अखबार “ट्राली टाइम्स” न्यूज़ पेपर लॉंच किया  है। करीब 60 लोगों की टीम जिस में ज्यादा से ज्यादा आर्टिस्ट हैं, जिंहोने इस अखबार की शुरुआत की है।

    एक अखबार  के लिए पांच रुपया के करीब खर्चा आ रहा है। पेपर के लिए किसी से कोई डोनेशन नहीं लिया जा रहा है। इस पेपर से जुड़े लोग खुद अपने पैसे से यह पेपर छाप रहे हैं। इस पेपर का टाइटल सुरमीत मावी ने रखा है। सुरमीत मावी आर्टिस्ट हैं।

    कई लोगों के मन में यह सवाल आ रहा होगा कि ट्राली नाम क्यों रखा गया। ट्राली मतलब ट्रेक्टर की ट्राली और ट्रेक्टर किसानों से जुड़ा हुआ है। इस पेपर के लिए किसी बड़े दफ्तर में मीटिंग नहीं हुई थी। ट्रैक्टर के ट्राली में बैठकर इस पेपर की रूपरेखा बनाया गया।

    सबसे बड़ी सवाल है यह पेपर क्यों शुरू किया गया? जब देश में इतने सारे न्यूज़ पेपर और न्यूज़ चैनल हैं तो इस पेपर की क्या जरूरत थी ? जरूरत थी क्यों कि न्यूज़ चैनल और न्यूज़ पेपर वालों की फर्जीवाड़ा को रोकने के लिए यह पेपर शुरू किया गया, ताकि किसान आंदोलन को लेकर सही खबर किसानों तक पहुंच सके।

    आज कल न्यूज़ पेपर और न्यूज़ चैनल किस हद तक पहुंच गए हैं, यह सब को पता है। किसानो के खिलाफ फैलाए जा रहे झूठ किसान आंदोलन को बदनाम कर रही है।

    किसानों की माने तो आंदोलन में आएं किसानों को अन्य आंदोलनकारी किसानो के बीच सही ढंग से संवाद कायम नही हो पा रहा है। सही सूचनाएं वहां तक नही पहुंच रही है या फिर किसानों के लिए जो घोषणा किसान नेताओं द्धारा जारी सूचना, दिशा निर्देश और घोषनाए नही पहुंच पा रही है।

    ऐसे में अगले अगले दिन ट्राली न्यूज के जरिये किसान पढ़ते हैं, तब तक इसकी रूपरेखा बदल जाती है। उन्हें सही जानकारी मिल जाती है। किसानों के पास सही जानकारी पहुंचाने के लिए ट्राली न्यूज का प्रकाशन असरदायक साबित हो रही है।

    साथ ही ट्राली न्यूज के माध्यम से किसानों को अन्य महत्वपूर्ण जानकारी भी मिलेगा। जैसे, मेडिकल कैम्प कहाँ पर है, लंगर कहाँ पर है, बेड कहाँ पर है,बुक स्टोर कहाँ पर है ताकि किसान आसानी से वहां पहुंच सके।

    कुल 60 लोगों की टीम है। टीम के 8-10 लोग फंडिंग कर रहे हैं। यह टीम पेपर के साथ साथ सफाई और अनुशासन का भी ध्यान रखता है।

    इस टीम ने “सांझी साथ” के नाम मे एक स्कूल भी वहां खोला है। इस स्कूल में 70 के करीब बच्चे पढ़ रहे हैं। किसानों के बच्चे के साथ साथ लोकल बच्चे भी पढ़ रहे है।

    पिछले माह से विभिन्न राज्यों से आएं लाखों किसान दिल्ली के विभिन्न सीमाओं पर अपने हक-हकूक  के लिए डटे हुए है,तो दूसरी तरफ किसान आंदोलन के खिलाफ झूठ पूरे लाव-लश्कर के साथ दौरे पर है। उसके साथ इस देश का पूरा मिशनरी, कॉरपोरेट है,मीडिया है।

    ऐसे में किसानों द्वारा शुरू किया गया उनका खुद का अखबार “ट्राली न्यूज” एक सशक्त हथियार बनेगा, देश के लिए एक नजीर बनेगा। सरकार की गोद में बैठी मीडिया को एक सबक मिलेगा। जिस तरह जंगे आजादी में मीडिया एक योद्धा की तरह लड़ा वही ट्राली न्यूज वर्तमान सरकार के खिलाफ उसी तरह लड़ेगी।

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