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    नये जमाने की पत्रकारिता ‘मोजो’ (मोबाइल जर्नलिज्म), कैसे बनाएं कैरियर

    अब मोजो यानी मोबाइल जर्नलिज्म का जमाना है। मोजो जर्नलिस्ट बनकर न‌ केवल पत्रकारिता के पैशन को पूरा कर सकते हैं, बल्कि अपनी खबरे बेब पोर्टल और मीडिया हाउस को भेजकर अच्छी कमाई भी कर सकते हैं.

    राजनामा डॉट कॉम। मोबाइल पत्रकारिता जिसे आजकल मोजो के नाम से ज्यादा जाना जाता है। 21वीं सदी की एक सबसे ज्यादा लोकप्रिय पत्रकारिता का एक स्वरूप है। इसने पत्रकारिता के सारे पुराने नियमो को बदल कर रख दिया है।हमारे लिए स्मार्ट फोन महज एक  फोन ही नही है। बल्कि यह बदलती हुई  पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण टूल्स भी है। वे दिन लद गये जब कंधे पर भारी भरकम कैमरे लेकर पत्रकारों/कैमरामैन‌ को चलना पड़ता था।

    आमतौर पर प्रिंट या अखबारों में पत्रकारों से विस्तार से खबर लिखने की उम्मीद की जाती है, तो टीवी में कम से कम शब्दों में दृश्यों और ध्वनि आधारित सामग्री के आधार पर खबर देनी होती है, वहीं रेडियो में न तो लंबी रिपोर्ट के लिए समय होता है, ना ही खबरों की पुष्टि करनेवाले दृश्य, तो कुल मिलाकर ध्वनियों और बोलते शब्दों के जरिए खबर देनी की चुनौती पत्रकारों के सामने होती है।

    जबकि ऑनलाइन पत्रकारिता का फलक विस्तृत है,और परिदृश्य मिला-जुला है, उसमें टीवी भी है, रेडियो भी है और प्रिंट तो है ही, यानि ऑनलाइन पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करनेवाले मीडियाकर्मियों को किसी भी खबर की प्रस्तुति में एक ही साथ कई चीजों का ध्यान रखना पड़ता है-

    प्रिंट की तरह खबर से जुड़ी जानकारियों की डिटेलिंग भी रिपोर्ट में मौजूद हो, अगर उससे जुड़े दृश्य (विजुअल) और तस्वीरें मौजूद हों, तो उनका भी यथोचित उपयोग हो, अखबारों में इस्तेमाल होनेवाले और टीवी पर चलनेवाले इन्फोग्राफिक्स का भी उपयोग हो और पर्याप्त एंबियंस(ध्वनि) सामग्री का भी उपयोग हो।

    वहीं, एजेंसी के पत्रकारों की तरह खबर फ्लैश करने में भी वो पीछे न रहें। मोबाइल पत्रकारिता वस्तुतः ऑनलाइन पत्रकारिता का विस्तार है जिसके लिए माध्यम बदल गया है और चुनौतियां और बड़ी हैं।

    पत्रकारिता को पहले बीट यानी विभाग के आधार पर परिभाषित किया जाता था- राजनीतिक पत्रकारिता, खेल पत्रकारिता, बिज़नेस या आर्थिक पत्रकारिता, खेल पत्रकारिता, विज्ञान पत्रकारिता, इत्यादि। बीट आधारित पत्रकारिता का विभाजन अब धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा और अब यह समझ पुरानी पड़ती जा रही है।

    वर्तमान दौर में पत्रकारों को “Jack of All Trades, Master of None” मानने की परिपाटी शुरु हो चुकी है। माना जाता है कि कोई भी विषय ऐसा नहीं, जिसे वो कवर नहीं कर सकते। वहीं, दूसरी ओर समाचार माध्यमों के विकास के साथ-साथ पत्रकारिता की नई-नई विधाओं का जन्म हुआ है, मसलन,  न्यूज़ एजेंसी की पत्रकारिता, अखबारी पत्रकारिता, टीवी पत्रकारिता, रेडियो पत्रकारिता, ऑनलाइन पत्रकारिता और अब मोबाइल पत्रकारिता।

    जाहिरा तौर पर, पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांत अपनी जगह, लेकिन हर माध्यम की कुछ अपनी विशेषताएं और जरूरतें होती हैं जिनके मुताबिक अलग-अलग माध्यमों में काम करनेवाले पत्रकारों या मीडियाकर्मियों को अपने काम को अंजाम देने के लिए तैयार होना पड़ता है।

    जैसे कोई ट्रक ड्राइवर ट्रेन नहीं चला सकता या फिर उसे बस चलाने में भी तब तक दिक्कत हो सकती है जब तक कि वह थोड़ा अभ्यास नहीं कर ले, ठीक उसी तरह अखबारों के पत्रकारों को टीवी या रेडियो के पत्रकारों को ऑनलाइन या अखबारों में काम करने के लिए नए सिरे से तैयार होना पड़ता है।

    क्योंकि हरेक माध्यम अपने-आप में एक-दूसरे से अलग है, उनकी व्यवस्था अलग है, उनकी अपनी-अपनी मांग है, भले ही पत्रकारिता का बुनियादी अर्थ सबके लिए एक ही है- खबर देना, खबरों की प्रस्तुति। लेकिन, तौर-तरीके अलग-अलग हैं।

    ऑलनाइन पत्रकारिता में संप्रेषण का माध्यम जहां डेस्कटॉप और लैपटॉप पर खुलनेवाली यानि देखी जा सकनेवाली वेबसाइट्स हैं। वहीं मोबाइल पत्रकारिता में यह काम मोबाइल फोन पर और टैबलेट्स पर उपयोग होनेवाले एप के माध्यम से होता है।

    फर्क यह लगता है कि ऑनलाइन पत्रकारिता का उपभोक्ता जहां टीवी और अखबार की तरह थोड़ा समय देकर, कुछ विस्तार से खबरों और उससे जुड़ी सामग्रियों के बारे में जानना चाहता है, वहीं, मोबाइल पर खबरों के लिए उपभोक्ता के पास अधिक समय मिल जाता है।

    मोबाइल के इसी उपयोग ने मोबाइल पत्रकारिता को जन्म दिया और  ऑनलाइन बल्कि, तमाम अखबारों से लेकर टीवी और रेडियो तक के पत्रकार अब मोबाइल पत्रकारिता को भी अपने काम का हिस्सा बनाने लगे हैं, क्योंकि उन्हें मोबाइल उपयोग करनेवाले अपने उपभोक्ताओं से जुड़ना है, उन तक खबरें पहुंचानी हैं, उनकी प्रतिक्रियायें भी हासिल करनी हैं।

    तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि पत्रकारिता के हथियार के रूप में मोबाइल सिर्फ मोबाइल पत्रकारिता के लिए ही नहीं बल्कि टीवी, प्रिंट, रेडियो और ऑनलाइन पत्रकारिता में भी इस्तेमाल हो रहे हैं।

    पहले बताया जा चुका है कि पत्रकारों के लिए अपने काम को अंजाम देने के वास्ते सरल, सहज, सस्ते और बेहद हुए जेहन में सुविधाजनक डिवाइस के रूप में उभरे हैं मोबाइल, जो एक ही साथ लेखन, कैमरे, ऑडियो रिकॉर्डिंग और ओबी वैन जैसे सारे काम पूरे करने के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। तो कहना न होगा कि मोबाइल पत्रकारिता अब बड़ी तेजी से परंपरागत पत्रकारिता की जगह लेती जा रही है, क्योंकि यही समय की मांग है।

    मोबाइल पत्रकारिता की बात करते यही बात सबसे पहले उभरती है कि आखिर कैसे की जा सकती है मोबाइल पत्रकारिता या मोबाइल से पत्रकारिता? यह सवाल बड़ा आसान भी है और बहुत कठिन भी।

    वैसे, यह तो परम सत्य है कि किसी भी उद्देश्य को आप कठिन समझकर सोचें, तो उसे पूरा करना मुश्किल ही हो जाएगा, और अगर आसान समझकर कोशिश करेंगे, तो उसे और आसान बनाने की राहें भी निकलती जाएंगी।

    मोबाइल पत्रकारिता पर भी कमोबेश यह बात फिट बैठती है। सबसे पहले यह जान लीजिए कि मोबाइल से पत्रकारिता इसलिए बेहद आसान है क्योंकि आज हर किसी के हाथ में मोबाइल है, ज्यादातर लोगों के हाथों में स्मार्टफोन हैं, जो इंटरनेट से लैस हैं। चाहे वह कोई मीडियाकर्मी हो, या फिर आम आदमी- मोबाइल तो सबके पास है।

    लिहाजा, अगर आप मीडियाकर्मी या पत्रकार हैं, तो आपके लिए अपनी खबरों के उपभोक्ता या बाजार तलाशने की जरूरत नहीं, क्योंकि वह सहज-सुलभ है और उपभोक्ताओं के लिए भी यह सुविधा है कि उन्हें ताजा-तरीन खबरों को जानने के लिए अखबार खरीदने बुक-स्टॉल पर जाने या कमरे में जाकर टीवी ऑन करने या लैपटॉप या डेस्कटॉप ऑन करने की जरूरत ही नहीं है। खबरों के उत्पादक (प्रोड्यूसर-पत्रकार-प्रस्तुतकर्ता) और उपभोक्ता (आम लोग)- दोनों ही ऐसे माध्यम से सीधे-सीधे जुड़े हैं, जो उनकी पहुंच से दूर नहीं, बल्कि उनकी मुट्ठी में ही है।

    मोबाइल पत्रकारिता के लिए यह जरूरी नहीं है कि आप किसी मीडिया संगठन, किसी अखबार या किसी टीवी चैनल या फिर किसी वेबसाइट से जुड़े हों। अगर आप इनमें से किसी माध्यम से जुड़े हों, तो और भी अच्छी बात है।

    लेकिन आपको बुनियादी तौर पर यह जानना चाहिए कि आपके अंदर खबरों की भूख हो, खबरों को सूंघने, उनको पकड़ने और खबर बनाने (यानी घटनाक्रम और सूचनाओं को अपनी सोच, समझ और इच्छा के मुताबिक एंगल देने की क्षमता), जी हां, खबर बनाने की क्षमता हो और आपके हाथ में हो एक मोबाइल हैंडसेट। यह बात तो तय है कि आपका हथियार जितना ही आधुनिक, उन्नत और मजबूत होगा, आपका काम उतना ही आसान हो जाएगा।

    आजकल कम से कम और अधिक से अधिक दाम में एक से एक बढ़िया कैमरे, रैम और स्टोरेज कैपिसिटी वाले मोबाइल फोन बाज़ार में उपलब्ध हैं, जो मोबाइल पत्रकारिता के लिए बेहद मुफीद हो सकते हैं। लेकिन पहले यह तय होना जरूरी है कि आज किस तरह की मोबाइल पत्रकारिता करना चाहते हैं।

    कहने का मतलब यह है कि जैसी जरूरत वैसा हथियार होना चाहिए। अगर आप प्रिंट मीडिया से जुड़े हैं तो आपके लिए कम स्टोरेज और रैम वाला एक सामान्य स्मार्टफोन भी बहुत उपयोगी हो सकता है जिसमें नोट्स लेने की सुविधा हो और आप ईमेल से अपनी सामग्री अपने अखबार तक भेज सकते हों। चूकि प्रिंट में तस्वीरों की भी अहमियत है, तो कैमरा जितना बेहतर क्वालिटी का हो, उतना बढ़िया।

    आमतौर पर सभी स्मार्टफोन इंटरनेट के इस्तेमाल की सुविधा देते हैं, लिहाजा खबर और उससे जुड़ी सामग्री अखबार या प्रकाशन-प्रसारण संस्था तक भेजना बेहद आसान है, बशर्ते इंटरनेट का नेटवर्क और कनेक्टिविटी ठीक हो। अगर नेटवर्क समय पर नहीं मिले, तो आपकी मोबाइल आपको रुला भी सकता है।

    आपको मोबाइल पर हिंदी या अंग्रेजी या जिस भाषा में भी आप काम करते हैं, उसमें टाइपिंग में दक्षता होनी चाहिए, तभी आप अपने तरीके से अपनी खबर लिखकर प्रकाशन या प्रसारण के लिए भेज सकेंगे, अन्यथा सिर्फ फोन पर खबर के बारे में बता भर देने के बाद आपको अपनी संस्था के कॉपीराइटर, संपादकीय सहयोगी या फिर स्क्रिप्ट राइटर

    पर निर्भर रहना पड़ेगा और आधी-अधूरी जानकारी, अपूर्ण तथ्यों के अलावा सही एंगल के अभाव में आपकी खबर मारी भी जा सकती है।

    हालांकि अक्सर ऐसा होता है कि फील्ड से रिपोर्टर सिर्फ खबर से संबंधित सूचनाएं और सामग्रियां भेजते हैं, खबर बनाने का काम संपादकीय विभाग के लोगों के जिम्मे होता है। लेकिन अच्छे रिपोर्टर के लिए जरूरी है कि वो अपनी खबर, अपनी स्क्रिप्ट खुद लिखे।

    पहले यह काम मुश्किल था, लेकिन स्मार्टफोन ने इसे आसान कर दिया है। अब आप मोबाइल फोन से ही ईमेल पर अपनी पूरी स्टोरी लिखकर छपने के लिए भेज सकते हैं। इसके बाद संपादकीय विभाग का दायित्व उसे अपडेट करने, उसमें कुछ जोड़ने या आवश्यकतानुसार कुछ घटाने का रहता है, जो संपादकीय नीतियों और बुलेटिनों की तात्कालिक जरूरतों के हिसाब से ही तय होता है।

    बात टीवी की करें, तो टीवी के रिपोर्टर के लिए मोबाइल आजकल और भी ज्यादा उपयोगी हो गया है, क्योंकि इस हैंडहेल्ड डिवाइस में बड़े-बड़े ओबी वैन तक की छुट्टी कर देने की क्षमता है। लेकिन इसके लिए मोबाइल सेट भी इतना ताकतवर होना चाहिए जिसमें अच्छी क्वालिटी (4K, HD/UHD/FHD) के वीडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा हो और उसकी लाइवस्ट्रीमिंग (आगे विस्तार से) की सुविधा हो।

    टीवी पत्रकारिता के लिए मोबाइल के इस्तेमाल या टीवी पर मोबाइल पत्रकारिता का चलन काफी तेजी से बढ़ा है, क्योंकि टीवी पत्रकारिता के पारंपरिक संसाधनों के मुकाबले इसके उपयोग में खर्च काफी कम है।

    टीवी पत्रकार एक ही साथ खबरों की कवरेज के दौरान विजुअल्स की शूटिंग कर सकते हैं, संबंधित व्यक्तियों के बाइट और ऑडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं, अपने पीस टु कैमरा (PTC) रिकॉर्ड कर सकते हैं, उन्हें टीवी चैनल के पास समाचार फीड के तौर पर भेज सकते हैं, अपनी खबर की स्क्रिप्ट भी खुद लिखकर टीवी के न्यूज़डेस्क को भेज सकते हैं और आवश्कता पड़े तो खबरों के लाइव प्रसारण के दौरान लाइव चैट भी दे सकते हैं (यह कैसे संभव है, इसके बारे में आगे के चैप्टर्स में बताएंगे)।

    इन सारी पत्रकारीय गतिविधियों को पूरा करने लिए पत्रकार के पास अच्छी क्वालिटी के और शानदार रेजोल्यूशन के कैमरे वाले स्मार्टफोन होने चाहिए जिनमें ब्रॉडकास्टिंग क्वालिटी (4K/HD/UHD/FHD) का वीडियो रिकॉर्ड किया जा सके। वैसे अब तो कई ऐसे मोबाइल एप भी मौजूद हैं, जो सामान्य मोबाइल कैमरे से भी इस तरह की रिकॉर्डिंग की सुविधा देते हैं।

    ओपन कैमरा, सिनेमा4K, लैप्स इट, सिनेमा FV-5, प्रो कैमरा, स्नैपसीड, प्रोशॉट कुछ ऐसे कैमरा एप हैं जिनके जरिए बेहतरीन तस्वीरें ली जा सकती हैं और वीडियो रिकॉर्डिंग की जा सकती है। यह टीवी-स्टाइल मोबाइल पत्रकारिता हुई।

    मोबाइल पत्रकारिता के लिए मोबाइल हैंडसेट भी उन्नत प्रोसेसर वाला और कम से कम 4 से 6 जीबी रैम और 64 से 128 जीबी तक स्टोरेज क्षमता वाला होना चाहिए, ताकि आप आवश्यकतानुसार वीडियो शूट कर सकें। मोबाइल का प्रोसेसर मजबूत और रैम अधिक होने से वह तेज़ गति से काम करता है और हैंग नहीं करता।

    इसके साथ ही मोबाइल की बैटरी भी कम से कम 4000mAh (मिलीएंपियर) या उससे ज्यादा क्षमता की होनी चाहिए, ताकि बैटरी जल्द डिस्चार्ज न हो और आपका काम बाधित न हो। साथ ही एक पॉवर बैंक भी आपके साथ जरूर रहना चाहिए ताकि मोबाइल की बैटरी को चार्ज करने में दिक्कत न हो।

    मोबाइल पत्रकारिता के लिए आदर्श माने जानेवाले आईफोन के कैमरे तो बेमिसाल माने जाते हैं, लेकिन उसमें बैटरी बेहद कमजोर पाई जाती रही है, जो जल्द ही डिस्चार्ज होती है। हालांकि मोबाइल फोन की दुनिया में निरंतर नवीनता आ रही है।

    टेक्नॉलॉजी में लगातार हो रही प्रगति पत्रकारों जैसे प्रोफेशनल मोबाइल उपयोगकर्ताओं को नई-नई सुविधाएं उपलब्ध करा रही है जिससे उनका काम आसान हो रहा है। टीवी के मोबाइल पत्रकार के पास मोबाइल सेल्फी स्टिक, एक ट्राइपॉड और मोबाइल से जुड़नेवाला लैपल या क्लिप माइक और हेडफोन या इयरफोन भी होने चाहिए, जिनकी जरूरत कई बार बाइट लेने या इंटरव्यू के लिए पड़ती ही है।

    आजकल आमतौर पर सभी मोबाइल कैमरे फ्लैशलाइट से लैस होते हैं जिनके सहारे कम रोशनी में भी बेहतरीन तस्वीरें ली जा सकती हैं। मोबाइल का उपयोग करनेवाले पत्रकार इसका आवश्यकतानुसार उपयोग कर कर सकते हैं।

    अगर आप फालतू विजुअल रिकॉर्ड करेंगे तो वो आपके मोबाइल की सीमित स्टोरेज को भी जाया करेगा और उसे फीड के रूप में इंटरनेट से भेजने में भी समय लगेगा। क्योंकि इमेज के मुकाबले वीडियो ज्यादा जगह लेता है, और उसे अपलोड या डाउनलोड करने में भी अधिक समय लगता है।

    आपको यह जानना जरूरी है कि आपकी स्टोरी का सबसे दमदार विजुअल कौन सा हो सकता है, और उसे शूट करना आपको नहीं भूलना चाहिए।

    यही बात पीस टु कैमरा (PTC) की रिकॉर्डिंग में भी लागू होती है। आपके मोबाइल की सीमित क्षमता आपको बढ़िया पीटीसी के लिए टेक पर टेक लेने का मौका नहीं दे सकती। तो पीटीसी में जो भी बोलना हो, पहले से तय करके और पुख्ता बोलें, ताकि कई बार टेक लेने से मोबाइल का स्टोरेज न घटे।

    देश में फिलहाल 4जी का जमाना है और 5जी मोबाइल कनेक्टिविटी भी आनेवाली है, लिहाजा मोबाइल से पत्रकारिता में बिजली की सी तेजी आने के आसार हैं। हालांकि, अभी भी देश में बहुत-सी जगहें ऐसी हैं, जहां 3जी कनेक्टिविटी मिलना भी मुश्किल होता है।

    ऐसी स्थिति में आप मोबाइल पर स्टोरी कवर तो कर सकते हैं, लेकिन उसे प्रसारण और प्रकाशन के लिए न्यूज़-सेंटर पर भेजना संभव नहीं होता। तो पत्रकार को इस बात का भी ध्यान रहना चाहिए कि वह जहां कवरेज के लिए जा रहा है, वहां मोबाइल कनेक्टिविटी कैसी है, क्या वहां इंटरनेट का नेटवर्क मिलेगा या नहीं या इससे जुड़ी क्या दिक्कतें आ सकती हैं और उनसे वो कैसे पार पा सकते हैं।

    इसके अलावा कवरेज के दौरान अप्रिय हालात का सामना करने पर वो खुद को और अपने मोबाइल को कैसे बचा सकते हैं, कवरेज की गई सामग्री को कैसे बचा सकते हैं, इसका भी ध्यान रखना चाहिए।

    आजकल ऐसे एप भी मौजूद हैं जिनके सहारे आप मोबाइल पर अच्छी ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग भी कर सकते हैं। मसलन सिनमा FV5 के पेड वर्जन में फुल एचडी और 4K क्वालिटी की शूटिंग की सुविधा है। एप के सहारे ही आप अपनी स्टोरी एडिट भी कर सकते हैं। तो उनका भी उपयोग जानना चाहिए और उन्हें भी अपनी स्टोरी मुकम्मल बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।

    एडोबी प्रीमियर, किनेमास्टर, ल्युमाफ्यूज़न, आईमूवी, पॉवर डायरेक्टर और एलाइट मोशन कुछ ऐसे एडिटिंग एप हैं जिनका इस्तेमाल एंड्राइड और आईओएस वाले आईफोन में विजुअल स्टोरी एडिटिंग के लिए होता है।

    इनके अलावा मूवीमेकर, वीडियोशॉप, क्यूट कट, क्विक, एनिमोटो भी कुछ ऐसे एप हैं जो मोबाइल पर वीडियो एडिटिंग के लिए इस्तेमाल होते हैं। इनके अलावा गूगल स्ट्रीटव्यू एक ऐसा एप है जो 360 डिग्री फोटोग्राफी के लिए है और मोबाइल पत्रकारिता में फीचर स्टोरीज़ के लिए इस्तेमाल हो सकता है। ऑडियो रिकॉर्डिंग के लिए भी ढेर सारे एप उपलब्ध हैं, जो आपकी पत्रकारिता संबंधी जरूरतें पूरी कर सकते हैं।

    इस बात का जरूर ध्यान रखें कि अगर आप एंड्राइड मोबाइल पर काम कर रहे हैं तो एक गूगल प्लेस्टोर से ही डाउनलोड करें और आईफोन पर एपल के आईट्यून्स से ही। अन्यथा थर्ड पार्टी एप कई बार मोबाइल के लिए काल भी बन जाते हैं। तो  इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखने पर मोबाइल आपकी पत्रकारिता का सबसे उपयोगी और धारदार हथियार बन सकता है।

    मोबाइल पत्रकारिता करने के इच्छुक व्यक्तियों को यह समझना चाहिए कि खबर कहां है और उसे किस तरह से वो कवर कर सकते हैं।साथ ही उस तस्वीर की भी पहचान‌ होनी चाहिए जिसमे खबर छुपी हो।फोटो खींचने का बुनियादी ज्ञान और सलीका होना चाहिए

    मोबाइल पर पत्रकारिता एक प्रोफेशनल(पेशेवर) काम है, लेकिन काफी लोग शौकिया तौर पर भी इसे अपना रहे हैं। इसका मकसद है अपने आसपास घट रही तमाम ऐसी घटनाओं और स्टोरीज़ को कवर करना जिनको शायद मेनस्ट्रीम मीडिया में जगह मिलना मुमकिन नहीं है।

    स्टोरीज़ दिखाने की नई शैली विकसित की जा रही है जिसमें प्रयोगों की बहुत गुंजाइश है। 10 सेकेंड से 2 मिनट तक की अवधि में बगैर वॉयस ओवर के, सिर्फ वीडियो और ग्राफिक्स-टेक्स्ट के जरिए, या सिर्फ वीडियो के जरिए कहानियां कहने का अंदाज बहुत से लोगों को शायद पसंद ना भी आए, लेकिन, ये तो मानना ही होगा कि बहुत-कुछ नया हो रहा है।

    इस क्षेत्र में जो शायद सबसे अलग है। जो बात 2 मिनट के वीडियो के जरिए कही जा सकती है, उसे 30 सेकेंड के ग्राफिक्स आधारित पैकेज के जरिए भी कहा जा सकता है क्या, यह भी देखना पड़ेगा और समझना पड़ेगा। यह भी समझना बेहद जरूरी है कि मोबाइल पत्रकारिता के लिए खबर पर फोकस होना जरूरी है।

    वैसे तो मोबाइल पत्रकारिता चलते-फिरते कहीं भी हो सकती है, जहां खबर मिल जाए, और यही इसका ध्येय भी होना चाहिए, लेकिन अगर पत्रकार को पहले से पता हो कि अमुक जगह कोई खबर बन सकती है, तो वह उसके लिए पहले से तैयारी कर सकता है। और यह चीज सिर्फ मोबाइल पत्रकारिता के लिए ही नहीं, किसी भी तरह की पत्रकारिता के लिए जरूरी है।

    अगर मुद्दा पहले से पता हो, तो रिसर्च करके बैकग्राउंडर जुटाना मुश्किल नहीं होता और उससे स्टोरी मजबूत ही होती है। लिहाजा, प्लान करके चलें, तो मोबाइल पर भी बेहतरीन स्टोरी की जा सकती है।

    किसी घटना की वीडियो कवरेज के दौरान भी इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि वीडियो खबर पर केंद्रित हो, न कि फालतू चीजों पर। तेज़ रफ्तार जिंदगी में मोबाइल का इस्तेमाल करनेवाले लोगों के पास समय कम होता है और क्रिकेट मैच जैसी अगर कोई बहुत ज्यादा आकर्षक या दिलचस्प घटना न हो, तो लोग सोशल मीडिया पर भी उस पर ज्यादा समय नहीं दे सकते।

    लिहाजा, मोबाइल पत्रकार को अपने ऑडिएंस की दिलचस्पी का ध्यान रखते हुए कम से कम समय और शब्दों में खबर देने की सलाहियत होनी चाहिए- यही मोबाइल पत्रकारिता का मूल मंत्र है।

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