राज्यपाल से थानेदार की मुलाकात को लेकर X पर पोस्ट डिलीट कर फंस गए मंत्री!

रांची दर्पण डेस्क। झारखंड की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा हो गया है, जो पुलिस की अनुशासनहीनता, राजनीतिक संगठनों की भूमिका और मंत्री की ‘बैकफुट’ वाली रणनीति को लेकर सुर्खियां बटोर रहा है।

The minister got into trouble after deleting the post on X regarding the meeting of the police station in-charge with the Governor!

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व ट्विटर) पर एक तीखा पोस्ट किया था, जिसमें उन्होंने रांची जिले के तुपुदाना ओपी प्रभारी दुलाल महतो की राज्यपाल संतोष गंगवार से मुलाकात पर सवाल उठाए। मंत्री ने इसे ‘घोर अनुशासनहीनता’ करार देते हुए डीजीपी से कार्रवाई की मांग की थी।

लेकिन कुछ ही घंटों बाद यह पोस्ट डिलीट कर दिया गया, जिसने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी। क्या मंत्री पर दबाव था? या फिर थानेदार की ‘हैसियत’ ने मंत्री को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया? आइए इस रोचक घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।

मामला शुरू हुआ रांची के तुपुदाना इलाके से, जहां ओपी प्रभारी दुलाल महतो कथित तौर पर कुछ लोगों के साथ राज्यपाल से मिलने पहुंचे थे। सूत्रों के मुताबिक उनके साथ बजरंग दल के कुछ नेता भी थे, जो इस मुलाकात को राजनीतिक रंग दे रहा है।

स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी कांग्रेस विधायक हैं और राज्य सरकार में स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा, परिवार कल्याण, खाद्य एवं आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभालते हैं, उन्होंने इस पर तुरंत प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, ‘रांची जिला के तुपुदाना के ओपी प्रभारी दुलाल महतो किस हैसियत से सीधे महामहिम राज्यपाल से मिलने चले गए। क्या इन्होंने विभागीय अनुमति ली थी? उनके साथ बजरंग दल के नेता क्या कर रहे हैं? घोर अनुशासनहीनता। डीजीपी साहब उचित कार्रवाई करें।’

इस पोस्ट में उन्होंने झारखंड पुलिस, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और सीएमओ को भी टैग किया था, जो दर्शाता है कि मंत्री इसे गंभीरता से ले रहे थे।

यह पोस्ट वायरल होने लगी और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। लेकिन अचानक मंत्री ने इसे डिलीट कर दिया, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए। क्या मंत्री को ऊपर से दबाव आया? या फिर पुलिस विभाग की ओर से कोई प्रतिक्रिया आई जो उन्हें बैकट्रैक करने पर मजबूर कर गई?

वरीय पत्रकार अखिलेश सिंह, जो एक्स पर @akhileshsi1 के नाम से सक्रिय हैं, ने इस पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने लिखा, ‘मंत्री के लिखे का वजन होना चाहिए। मंत्री जी ने वाजिब पोस्ट किया था। लेकिन उन्होंने इस पोस्ट को डिलीट कर दिया। बताइए कैसे कोई थानेदार किसी राजनीतिक, सामाजिक संगठन के लोगों के साथ राज्यपाल से मिल सकता है? मंत्री जी को पोस्ट डिलीट नहीं करना चाहिए था।’

सिंह की यह पोस्ट ने मामले को और हवा दी, क्योंकि वे राज्य अपराध, ईडी, सीबीआई जैसे बीट्स कवर करते हैं और उनकी बातों का वजन माना जाता है।

सोशल मीडिया यूजर्स भी इस बहस में कूद पड़े। एक यूजर @rahulshahdeobjp ने व्यंग्य भरे अंदाज में लिखा, ‘थानेदार के ऊपर तो कार्रवाई नहीं हुआ, थानेदार ने मंत्री के ऊपर कारवाई करवा दी उन्हें ट्वीट डिलीट करना पड़ा।’ यह कमेंट दर्शाता है कि कुछ लोग इसे मंत्री की कमजोरी के रूप में देख रहे हैं।

वहीं, एक अन्य यूजर @adilsiddique84 ने और भी तल्खी दिखाते हुए लिखा, ‘एक थानेदार की हैसियत तुम क्या जानो मंत्री बाबू।’ इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि मामला सिर्फ अनुशासन का नहीं, बल्कि सत्ता और पुलिस की ‘हैसियत’ की लड़ाई का बन गया है। बजरंग दल की भूमिका ने इसे धार्मिक और राजनीतिक रंग भी दे दिया, क्योंकि संगठन अक्सर हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहता है।

इस घटना का बैकग्राउंड समझना जरूरी है। झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार गठबंधन की है, जिसमें कांग्रेस और झामुमो मुख्य साझेदार हैं। इरफान अंसारी अक्सर अपने बयानों से सुर्खियां बटोरते हैं।  चाहे वह स्वास्थ्य सुधार हों या राजनीतिक विवाद।

हाल ही में उनके बेटे कृष अंसारी का रांची के रिम्स अस्पताल का ‘निरीक्षण’ भी विवादास्पद रहा था, जहां विपक्ष ने इसे ‘भौकाल’ करार दिया और पोस्ट डिलीट होने की घटना भी घटी थी।  लेकिन इस बार का मामला ज्यादा गंभीर है, क्योंकि इसमें राज्यपाल जैसी संवैधानिक संस्था शामिल है।

क्या थानेदार ने बिना अनुमति राज्यपाल से मिलकर प्रोटोकॉल तोड़ा? या फिर बजरंग दल के साथ उनकी मौजूदगी किसी बड़े मुद्दे की ओर इशारा कर रही है, जैसे धार्मिक तनाव या स्थानीय विवाद?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना झारखंड की राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण को दिखाती है। विपक्षी भाजपा इसे सरकार की कमजोरी के रूप में भुना सकती है, जबकि सत्ता पक्ष इसे ‘अनुशासन’ का मुद्दा बताकर बचाव कर रहा है। अगर डीजीपी कार्रवाई नहीं करते तो मंत्री की पोस्ट डिलीट करने से उनकी छवि पर असर पड़ सकता है। वहीं अगर जांच हुई तो थानेदार और बजरंग दल के कनेक्शन उजागर हो सकते हैं।

फिलहाल, सोशल मीडिया पर यह बहस थमने का नाम नहीं ले क्या मंत्री फिर से बोलेंगे, या यह मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा? समय बताएगा। यदि आपके पास इस संबंध में कोई जानकारी है, तो हमें जरूर बताएं।  (संदर्भ: सोशल मीडिया पोस्ट्स और समाचार स्रोतों पर आधारित।)

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