मीडिया पर सरेआम हमला, फिर भी नहीं छपी रांची के किसी अखबार में एक लाइन खबर

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रांची (मुकेश भारतीय)। रांची वुमेंस कॉलेज की प्रिंसीपल मंजू सिन्हा ने Znews पुरबईया के रिपोर्टर कामरान के साथ जो किया, वह पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। इस तरह के कुकृत्य को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन सबसे गंभीर पहलु है कि रांची के किसी भी अखबार ने इस मामले को लेकर एक लाईन की खबर भी नहीं बनाई। हो सकता है कि कॉलेज कि प्राचार्या रसुखदार हों लेकिन, मैं नहीं मानता कि वह इतनी पहुंच रखती होगीं कि सभी लीडिंग अखबारों पर भारी पड़ जाये।

कामरान एक उभरता युवा टीवी जर्नलिस्ट हैं। वह अपने चैनल के लिये लाइव रिपोर्टिंग कर रहे थे। इसी बीच अचानक कॉलेज की प्राचार्या पिछे से दस्तक देती है और अनाप-शनाप बकते हुये लाइव रिपोर्टिंग को खुद छीना-झपटी कर बंद कर जाती है। यह माजरा सब देखते हैं। रांची का शायद कोई ऐसा रिपोर्टर या संपादक होगें जो इससे अनभिज्ञ होगें। फिर भी किसी ने कोई एक लाइन भी न लिखा और न छापा।

जबकि रांची की पत्रकारिता में एक बड़ी उभरती सच्चाई है कि आज कामरान है तो कल कोई और होगा। क्योंकि कल जागरण का फोटोग्राफर मनोरंजन सिंह भी था। और लोग भी थे।

यहां पर झारखंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष शहनवाज जी और संगठन मंत्री अरविन्द प्रताप सहरानीयता के पात्र हैं कि घटना की सूचना मिलते ही उन्होंने गंभीरता से संज्ञान लिया और समाचार लेखन तक गंभीर नजर आ रहे हैं।

झारखंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष शहनवाज करते हैं कि दुर्भाग्य है, हम दूसरों के दर्द को उजागर करते हैं,पर हमारे  दर्द पर मरहम लगाने वाला कोई नहीं होता। इस भयावह स्थिति से मुकाबला करना एक बड़ी चुनौती है।

बहरहाल, रांची की मीडिया के स्वंयभू रिपोर्टर-एडिटर के समक्ष यक्ष सवाल है कि एक पत्रकार की वाक्य् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच कर्त्व्यों को रोकने वाली घटना को लेकर एक लाइन भी न छापना उनकी कौन सी मंशा दर्शाती है?

दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक प्रभात खबर, दैनिक खबर मंत्र, दैनिक रांची एक्सप्रेस, दैनिक आजाद सिपाही या फिर कोई भी स्थानीय अखबार हो…. किसी में भी कुछ भी देखने को नहीं मिला। क्या प्लांटेड खबरों के बीच उनकी संवेदनशीलता इस कदर मर गई है कि उनमें पत्रकारों के साथ हो रही अमानवीयता की कोई फ्रिक नहीं है?

क्या उनका अखबार या उनके घर-गृहस्थी का खर्चा मंजू सिन्हा जैसे उदंड प्राचार्या की कमाई से चलती है? क्योंकि सबाल एक टीवी न्यूज चैनल के लाइव रिपोर्टर की नहीं हैं अपितु, प्रश्न है मीडिया की आजादी की, जिसे सरेआम रौंदा जा रहा है, उस आलोक में स्वंयभूओं की खामोशी एक काला इतिहास रचेगी। निसंदेहः आने वाली पीढ़ी  उस पर शर्म महसूस करेगी।

Znews पुरबईया के रिपोर्टर कामरान के लाइव रिपोर्टिंग के दौरान रांची वुमेंस कॉलेज की प्रिंसीपल मंजू सिन्हा की घटिया हरकत की  इस वीडियो लिंक को देख कर सहज अंदाजा लग जाता है कि  मीडिया की आजादी पर यह सीधा हमला है………

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