मौलिक भारत ने डी एन डी टोल कंपनी पर लगाए अनेक गंभीर आरोप

Share Button

नई दिल्ली।  डी एन डी टोल ब्रिज के घोटालों को खोलकर और इसकी मुक्ति के लिए जनांदोलन कर सुर्खियों में आयी सामाजिक  संस्था मौलिक भारत ने इलाहाबाद उच्च न्यायलय और फिर उच्चतम न्यायालय द्वारा डी एन डी ब्रिज को अंतरिम रूप से टोल मुक्त करने के बाद न्यायलय द्वारा सी ए जी ऑडिट के आदेश के बाद सी ए जी और सी वी सी को एक विस्तृत प्रतिवेदन और सबूत भेजकर कंपनी के खिलाफ गम्भीर अनियमितताओ के खिलाफ गम्भीर आरोप लगाये हैं।

आज नोयडा के अग्रसेन भवन में आयोजित प्रेस वार्ता में संस्था के डी एन डी टोल मुक्ति संघर्ष समिति के संयोजक के विकास गुप्ता,   महासचिव अनुज अग्रवाल, डा. अमर नाथ ओझा, पंकज  गोयल ने पत्रकारों के सामने भेजे गए पत्र के बिंदुओं का सिलसिलेवार ढंग से बिश्लेषण करते हुए सीधे तौर पर कई आरोप लगाये हैं।

आरोप है कि डी एन डी टोल कंपनी के वित्तीय मकड़जाल के परिणामस्वरूप डीएनडी फ्लाईवे की कुल लागत 408.17 करोड़ से बढ़कर 6000 करोड़ रूपए तक पहुँच गयी है। एक तरफ जहां डीएनडी फ्लाईवे गैरकानूनी रूप से जनता के पैसे पर खुद की जेब भर रहा है तो वहीं डीएनडी फ्लाईवे पर गैरकानूनी विज्ञापनों से भी एनटीबीसीएल भारी कमाई कर रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि एनटीबीसीएल को इन विज्ञापनों को लगाने की अनुमति अनुबंध में नहीं मिली थी। दक्षिणी दिल्ली महानगर निगम ने अक्टूबर 2015 में दिल्ली की तरफ आने वाले ऐसे 200 होर्डिंग और गैर कानूनी संरचनाओं को हटा दिया था। हालांकि ये विज्ञापन अभी भी डीएनडी फ्लाईवे पर मौजूद हैं, जो क़ानून का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। यह पता चला है कि एक सिंगल नॉन लाइटेड 40 बाई 20 इंच के आकार की होर्डिंग का किराया प्रति माह 3,50,000.00 रूपए है और इस प्रकार गैरकानूनी तरीके से होर्डिंग लगाकर एनटीबीसीएल करोड़ों रूपए प्रतिमाह कमा रहा है।

रियायत पुल के निर्माण में एक ओपन एंड दी गयी थी और अनुबंध ने न्यूनतम लागत और कुशलता के स्थान पर लागत-अधिकतम को प्रोत्साहित कर दिया। यह पाया गया कि यह अनुबंध जनता की कीमत पर एक ब्लैंक चेक देने के समान है जिसे रियायत के नाम पर  न जाने कब तक वह ढोती रहेगी।

टोल ब्रिज के निर्माण के लिए एनटीबीसीएल को तत्कालीन राज्य सरकार के द्वारा 1 रूपए/प्रतिवर्ष की दर से पट्टे पर दी गयी है। 100 एकड़ में से 66 एकड़ दिल्ली में है जबकि बाकी नॉएडा में है। उत्तर प्रदेश सरकार के साथ 34 एकड़ भूमि के लिए अनुबंध पर अक्टूबर 1998 में हस्ताक्षर किए गए। उस समय भूमि की कुल लागत मात्र 55 लाख रूपए थी। नॉएडा टोल ब्रिज कंपनी लिमिटेड की मदर कम्पनी आईएलएफएस के पास दिल्ली और उत्तर प्रदेश में वर्ष 2001 में टोल रोड के निर्माण के पूरा होने के  बाद 100 एकड़ अतिरिक्त भूमि थी। इसने डीएनडी से होकर गुजरने वाले यात्रियों से भी 2 फरवरी 2001 से टोल वसूलना शुरू कर दिया था। 2004 की शुरुआत में एनटीबीसीएल ने अपने पास बची 100 एकड़ अतिरिक्त भूमि के पुनर्मूल्यांकन का निर्णय लिया।

एनटीबीसीएल के अनुसार भूमि की कीमत 135 करोड़ आंकी गयी। फरवरी 2004 में, एनटीबीसीएल ने डीएनडी फ्लाईवे के नाम से अपनी खुद की सहायक कम्पनी शुरू कर दी।  यह कम्पनी दिल्ली और नॉएडा में बची उस अतिरिक्त भूमि पर विकास कार्यों के लिए बनाई गयी थी। इस कम्पनी के बनने के बाद ही डीएनडी फ्लाईवे की टोल संचालक कम्पनी एनटीबीसीएल ने अपनी सहायक कम्पनी डीएनडी फ्लाईवे को यह कम्पनी 103 करोड़ रूपए में बेच दी। यहाँ यह बताना जरूरी है कि उस जमीन की असली लागत 700 करोड़ रूपए है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इस लेनदेन के दौरान सहायक कम्पनी डीएनडी फ्लाईवे को इस लेनदेन में उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा आठ करोड़ रूपए की स्टैम्प ड्यूटी से भी छूट दे दी गयी। कम्पनी को 1 रूपए सालाना की दर पर पट्टे दी गयी जमीन ने कम्पनी की कुल संपत्ति में 135 करोड़ रूपए की वृद्धि कर दी, और यह अधिक भी हो सकती है।

जमीन के मूल्यांकन के बाद भी एनटीबीसीएल ने इसे अपनी परियोजना लागत में से कम नहीं किया। वसूली जाने वाली परियोजना लागत समय समय पर आगे बढ़ती रही। एनटीबीसीएल ने वर्ष 2004 और 2005 में टोल भी बढा दिया और इसके साथ ही जुलाई 2006 में उसने डीएनडी फ्लाईवे से मयूर विहार को जोड़ने के लिए एक एक्सटेंशन का भी निर्माण शुरू कर दिया। शुरू में लगा कि एनटीबीसीएल यह निर्माण टोल ब्रिज पर भीड़भाड़ वाले पूर्वी दिल्ली के यातायात को डाइवर्ट करने के लिए कर रही है। इसके साथ ही उसने दिल्ली के यातायात के सुगम संचालन के लिए दिल्ली सरकार के साथ समर्थन अनुबंध के माध्यम से आश्रम फ्लाईओवर का भी निर्माण शुरू कर दिया। बाद में इन दोनों की ही लागत कुल परियोजना लागत में जोड़ दी गयी।

आश्चर्यजनक रूप से यह टोल साल दर साल बढ़ता ही रहा, जबकि बढ़ते यातायात से इसे कम होना चाहिए था। ऑपरेटर के पास लगभग उसके निवेश की दोगुनी राशि पहुँच चुकी है। और बढ़ते यातायात के कारण डीएनडी फ्लाईवे के विज्ञापन की लागत बहुत ही अधिक है, और यह निजी कम्पनी गैर कानूनी रूप से इससे जमकर पैसा उगा रही है। अनुलग्नक 1 में दैनिक यातायात और डीएनडी की आय का ब्यौरा संलग्न है।

विभिन्न संस्थानों द्वारा लंबित आरोपों के बाद, पराग पारिख फाइनेंशियल एडवाईसरी लिमिटेड ने 21 मई 2012 को सब्स्टेंशियल एक्विजिशन ऑफ शेयर और टेक ओवर क़ानून 1997 के नियम 29 (1) के अंतर्गत एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें नॉएडा टोल ब्रिज कम्पनी लिमिटेड के द्वारा काफी मुनाफा दिखाया गया। एनटीबीसीएल डीएनडी टोल प्लाज़ा पर किसी भी तरह का कोई भी कर नहीं दे रहा है।हालांकि निर्माण उसने दिल्ली और उत्तरप्रदेश की सरकार की भूमि पर कराया है, फिर भे एनटीबीसीएल आयकर से छूट का दावा यह कहते हुए कर रही है कि फ्लाईवे उसकी खुद की व्यक्तिगत संपत्ति है। जबकि हकीकत में आयकर विभाग आयकर अधिनियम 1961के सेक्शन 147 के अंतर्गत पुन:आंकलन शुरू कर चुका है और भविष्य में आने वाले टोल और अन्य वसूलियों के आधार पर होने वाली आय के अनुसार रु 500 करोड़ की मांग भी कर चुका है। ये मुद्दे उचित प्राधिकरण के समक्ष विचाराधीन हैं।

उद्योग चलन के विपरीत, इस परियोजना की लागत को एक्स-पोस्ट निर्धारित किया गया था अर्थात  परियोजना के पूरी होने बाद ही। परियोजना के सम्बन्ध में कुल व्यय पर कोई सीमा तय नहीं की गयी थी, और आईएलएंडएफएस के द्वारा बताया गया आंकडा था 408 करोड़ रूपए। हालांकि 408 रूपए का आंकड़ा भी प्रश्नों के घेरे में है क्योंकि उसी अवधि में अक्षरधाम और निज़ामुद्दीन को जोड़ने वाले सेतु की लागत केवल 82 करोड़ थी, जो डीएनडी से केवल 4 किमी की दूरी पर है।

यहाँ तक कि योजना आयोग के द्वारा कराए गए अध्ययन ने भी यह पाया कि डीएनडी फ्लाईवे के लिए रियायती अनुबंध पूरी तरह से जनता के हित के खिलाफ है। और आईएलएंड एफएस जिसने डीएनडी फ्लाईवे का निर्माण कराया, जो 15 वर्ष के समय में 5888 करोड़ रूपए की लागत से बना सबसे छोटा ब्रिज है, जबकि इसी लागत में स्पेन में इससे चार गुना बड़ा टोल ब्रिज बना है और उतना ही बड़ा टोल ब्रिज हैदराबाद में बना है।

नॉएडा टोल ब्रिज कम्पनी लिमिटेड की वार्षिक रिपोर्ट भी कई वर्षों से कम्पनी की आय में निरंतर वृद्धि और लाभ दिखा रही हैं, जबकि यह दावा करते हुए छूट की अवधि भी 70 वर्ष करने की मांग की जा रही है कि 31.03.16 तक कुल वसूली योग्य लागत 3457.93 करोड़ रूपए है. 2009-10 से लेकर 2014-15 तक के वित्तीय वर्ष के लिए एनटीबीसीएल के सालाना लाभ को प्रदर्शित करता हुआ चार्ट अनुलग्नक 2 में दिखाया गया है।

डी एन डी टोल मुक्ति संघर्ष समिति के संयोजक के विकास गुप्ता ने पत्रकारों को बताया कि संस्था ने ही गत बर्ष लखनऊ में प्रेस वार्ता के माध्यम से इस टोल के निर्माण और संचालन में घोटाले और इससे जुड़े नोकरशाहों के सिंडीकेट का पर्दाफाश कर सरकार पर दबाब बनाया था और जन आंदोलन किया था और सारे सबूत उत्तर प्रदेश सरकार, भारत सरकार और उच्चतम न्यायलय को भेजे थे। अब पुनः जनहित में उचित कार्यवाही के अनुरोध के साथ नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) एवं मुख्य सतर्कता आयुक्त (CVC) को भेजे गए हें ताकि वो उच्चतम न्यायलय को भेजी जाने वाली अपनी रिपोर्ट में इन सभी बिंदुओं को शामिल कर लें और डी एन डी सदा के लिए तो टोल मुक्त हो ही जाए साथ ही इस घोटाले को अंजाम देंने वाले नोकरशाहों को कानून उचित सजा दे सके।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...