KGBV में जारी फर्जी नामांकण के गोरखधंधे में रांची फिर अव्वल

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educationऐसे तो समूचे झारखंड राज्य में सर्व शिक्षा परियोजना के हाथो संचालित हो रहे कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों  में व्यापक पैमाने पर मनमानी बरते जाने की शिकायतें मिल रही है लेकिन, राजधानी रांची जिले प्रायः सभी विद्यालयों में कुव्यवस्था चरम सीमा पर है।

बात चाहे अनगड़ा, बेरो, बुण्डु, बुढ़मु, चान्हों, कांके, लापुंग, मांडर, नामकुम, सिल्ली, सोनाहातु, तमाड़ कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों की हो या फिर ओरमांझी कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय की। कमोवेश सबकी एक ही रामकहानी नजर आती है। समाज के बंचित बिटियाओं के नाम पर हर तरफ से, हर तरह से, हर हाथ से सिर्फ लूट ही लूट।

बहरहाल, इन दिनों कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों में नामांकण का दौर चल रहा है। 

इस नामांकण में निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार का अधिनियम २००९ और इस अधिनियम के अन्तर्गत बनाए गए निःशुल्क और अनिवार्य  शिक्षा का अधिकार नियम-२०११ के तहत राज्य सरकार एवं स्थानीय निकायों का यह संवैधानिक दायित्व है कि सभी बच्चे अनिवार्य रूप से शाला में दर्ज हों, गुणवत्तायुक्त शिक्षा पूर्ण करें। इस कानून को सफलतापूर्वक क्रियान्वित करने के लिए यह आवश्यक है कि लक्षित आयु वर्ग समूह के सभी बच्चों को चिन्हित किया जाए तथा सभी बच्चों के संबंध में उपरोक्तानुसार उपलब्धि सुनिश्चित की जाए।

लेकिन, यहां सब कुछ उल्टा देखने को मिल रहा है। मुखिया, प्रमुख, विधायक, सांसद से लेकर विद्यालय प्रबंधन से जुड़े लोगों की चांदी कट रही है। कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों में बंचित बिटियाओं को नजरअंदाज कर बड़े पैमाने पर साधन सम्पन्न घरों के नवासियों का दाखिला कराया जा रहा है। यहां दलालों का एक ऐसा बड़ा नेटवर्क भी काम कर रहा है, जो लोगों से मोटी रकम लेकर असली लाभान्वितों निरंतर ढकेले जा रहे हैं।

चुकि इन विद्यालयों में आवास,  भोजन, पठन-पाठन सामग्री,  गणवेश, पाठ्यपुस्तकें,  व्यक्तिगत आवश्यकता की सामग्री, वृत्तिका, छात्रवृत्ति,  व्यावसायिक शिक्षा, स्वास्थ्य परीक्षण, खेलकूद की सामग्री, पुस्तकालय आदि की मुफ्त व्यवस्थाएं होती है, इसलिए सम्पन्नों का झुकाव इस ओर काफी बढ़ा है।

अवैध तरीके से नामांकण करने वाले कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों के प्रबंधन से जुड़े लोग इसका खूब फायदा उठाते रहे हैं। वे आवंटित सरकारी राशि का सलूट दुरुपयोग करते हैं। उनके खिलाफ न बोलने वाला कोई अभिभावक होता है और न ही कोई अधिकारी या जनप्रतिनिधि।

इनके खिलाफ स्थानीय समाचार पत्रों से जुड़े तथाकथित रिपोर्टर भी कभी मुंह नहीं खोलते दिखते हैं, क्योंकि इनके मुंह पर विशेष अवसरों पर हजार-पांच सौ का विज्ञापन मार दिया जाता रहा है।

एक सर्वेक्षण के अनुसार सिर्फ रांची जिले के विभिन्न आवासीय कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में 78 फीसदी बालिकाएं समाज के उपेछित वर्गों से नहीं आते हैं। इस अभियान के तहत जिन लोगों को इस तरह की शिक्षा का लाभ मिलनी चाहिए, वे प्रायः बाल मजदूरी करते या फिर घरों में कैद दिख रहे हैं।

यदि इस संदर्भ में गहन जांच की जाये तो भूखी दूनिया के इस महती शिक्षा योजना का एक बड़ा काला चेहरा साफ नजर आएगा।

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