कंप्यूटर क्रांति वनाम कैशलेस इकोनॉमी की बेहतरी

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राजीव गांधी का वो जमाना याद है?  क्या आपको राजीव गांधी का वो जमाना याद है? मुझे याद है, जब राजीव गांधी ने कंप्यूटराइजेशन की बातें शुरू की थीं तब इसके विरोध में एक नारा बड़े जोर-शोर से उछला था- पहले दो हाथों को काम, फिर लो कंप्यूटर का नाम !

कंप्यूटराइजेशन के विरोध में उस वक्त जो दलीलें पेश की जाती थीं, वह बड़ी वाजिब लगती थीं। रोटी का सवाल तब सबसे अहम था ( यह सवाल कमोबेश आज भी कायम है) और वाकई यही लगता था कि कंप्यूटर की बात करनेवाला नेता देश के जमीनी हालात से मुंह चुराते हुए हवाई किले बना रहा है।

Inext ,Ranchi, Jharkhand के  Ediorial Head  शंभुनाथ चौधरी अपने फेसबुक वाल पर
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हर कोई मानेगा कि देश आज अगर टेक्नोलॉजी के साथ कदमताल कर रहा है, तो इसकी आधारशिला इसी कंप्यूटर क्रांति ने रची थी।

कैशलेस इकोनॉमी का आइडिया बुरा है ? आज जब कैशलेस इकोनॉमी का आइडिया पेश किया जा रहा है, तब इसका अंध-विरोध जायज नहीं लगता। हां, इसे तुरत-फुरत में जिस तरह थोपने की कोशिश हो रही है वह गलत है और इसका विरोध अप्रत्याशित भी नहीं।

आइडिया चाहे कितना भी अच्छा हो, उसे अचानक तुगलकी अंदाज में लागू कराने की कोशिश करेंगे तो इसका खामियाजा भुगतने को तैयार रहना पड़ेगा।

याद कीजिए कि विशाल बहुमत से बनी राजीव गांधी की सरकार को अगले ही चुनाव में खारिज होना पड़ा था, जबकि बाद में आई सरकारों ने उन्हीं के कार्यकाल में बनी योजनाओं के आधार पर आगे के रास्ते तय किए और बेहतर रिजल्ट हासिल किए।

बेहतर क्या है ? बेहतर क्या होता? यही कि कैशलेस इकोनॉमी के लिए सरकार सिस्टमैटिक प्रोग्राम पेश करती। इसके लिए लोगों को बकायदा एजुकेट करने का अभियान चलाया जाता।

लगता है कि नोटबंदी से देश में एक हद तक पैदा हुए अफरा-तफरी के हालात और कई जगहों से उठ रहे विरोध को तत्काल काउंटर करने के लिए सरकार अचानक कैशलेस इकोनॉमी के आइडिया का ढाल की तरह इस्तेमाल कर रही है।

शायद यह आइडिया अब से पहले तक सरकार की सुविचारित रणनीति का हिस्सा न रहा हो, लेकिन फ्यूचर की इकोनॉमी का रास्ता यही है। बेहतर रास्ता यही है। देर-सबेर हमें इस तरफ जाना ही होगा।

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