राष्ट्रीय-पर्व एवं कवि-सम्मलेनी ठेकेदारी

कुछ दिनों पूर्व एक निजी चैनल के कवि-सम्मेलन की प्रस्तुति पर पाठकों की टिप्पणियां पढ़ने को मिलीं। अत: इस मुद्दे पर विचारणीय तथ्य यह है कि निजी चैनल का प्रसारण निजी हाथों म्रें होता है। उनके प्रसारणों में सीधे तौर पर जनता का धन व्यय नहीं होता है। यदि वहाँ किसी […]

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एसपी राजेश मीणा तो एक बहाना है

पिछले दिनों राजस्थान के अजमेर जिले के पुलिस अधीक्षक पद पर तैनात राजेश मीणा को कथित रूप से अपने ही थानेदारों से वसूली करते हुए राजस्थान के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने दलाल के साथ रंगे हाथ पकड़ा गया | यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसमें किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते […]

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पत्रकारिता मिशन नहीं, अब कमीशन का खेल है

पत्रकार के कलम की स्याही और खून में जब तलक पाक़ीज़गी रहती है तब तलक पत्रकार कि लेखनी दमकती है और चेहरा चमकता है. न तो उसकी निगाह किसी से सच पूछने पर झुकती है और न ही उसकी कलम सच लिखने से चूकती है. पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है […]

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हिन्दी न्यूज चैनल की पत्रकारिता

जंतर-मंतर की आवाज 10 जनपथ या 7 रेसकोर्स तक पहुंचेगी। देखिये इस बार भीड़ है ही नहीं। लोग गायब हैं। पहले वाला समां नहीं है। तो जंतर-मंतर की आवाज या यहां हो रहे अनशन का मतलब ही क्या है। तो क्या यह कहा जा सकता है कि अन्ना आंदोलन सोलह महीने […]

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मीडिया का यह कौन सा चेहरा है भाय

गणेश शंकर विद्यार्थी जैसों की आहुति, शहादत क्या इन्हीं दिनों के लिए थी? ऐसा ही समाज रचने के लिए थी? कि काले धन की गोद में बैठ कर अपने सरोकार भूल जाएं? बताइए कि फ़ाइनेंशियल मामलों के दर्जनों चैनल और अखबार हैं। पर कंपनियां देश का कैसे और कितना गुड़-गोबर कर […]

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बेलगाम मीडिया की कोई तो लक्ष्मण रेखा हो

कोर्ट के भीतर सुनवाई चल रही है, अचानक किसी ने कहा सुनवाई पूरी हो गई। कोर्ट से बाहर निकलते आरोपी को धर दबोचने के लिए घात लगाए बैठे कैमरामेन और मीडिया क्रू उस गुलाबी शर्ट पहने व्यक्ति की ओर लपके, सवालों की बौछार। कोर्ट ने आपको सजा सुनाई है, आपका क्या […]

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