उपभोक्ता अदालतें भी करती हैं भेदभाव

एक साधारण व्यक्ति की मौत की कीमत मात्र बावन हजार रुपये है, जबकि ब्रिटिश एयरवेज में यात्रा करने में सक्षम व्यक्ति का थैला गुम हो जाने के कारण थैला धारक हो हुई परेशानी की कीमत एक लाख रुपये। विलम्ब से खाना परोसने और तीन घण्टे विलम्ब से गन्तव्य पर पहुँचने की कीमत 70 हजार रुपये। इससे ये बात स्वत: ही प्रमाणित होती है कि उपभोक्ता अदालतें, उपभोक्ता कानून के अनुसार नहीं, बल्कि उपभोक्ता अदालत के समक्ष न्याय प्राप्ति हेतु उपस्थित होने वाले पीड़ित व्यक्ति की हैसियत देखकर फैसला सुनाती हैं।   …..डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ उपभोक्ता अदालतों के फैसलों पर यदि गौर […]

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सच से क्यों डरती है भाजपा

लगता है संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करके अपने कुकर्मों पर परदा डालना भारतीय जनता पार्टी की आदत में शुमार हो गया है। यह बुरी आदत है और इसी आदत से लाचार होकर भाजपा नेता अरुण जेटली भारतीय प्रेस परिषद् के चेयरमैन जस्टिस मार्कण्डेय काटजू पर ज़ुबानी हमला कर बैठे हैं। लेकिन वह यह भूल गये कि उनके इस प्रयास से भाजपा के काले कारनामों पर परदा नहीं पड़ जायेगा बल्कि यह कारनामे और ज्यादा उजागर हो जायेंगे। दरअसल ताज़ा विवाद कुछ दिन पूर्व जस्टिस काटजू के एक अंग्रेज़ी दैनिक ‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक लेख पर उठा है जिसमें उन्होंने गुजरात […]

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अंग्रेजी की शोभा बढ़ाती हमारी सरकारी वेबसाइटें

हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ। लेकिन हमारी जनता आजाद गुलाम की मानिंद जिन्दगी बसर करने मजबूर है। और यह सब हमारी सरकार की कुनीतियों एवं अनदेखी का परिणाम है। हमारे थाने अंग्रेजों के समय के थानों से भी खतरनाक है वो इसलिए क्योंकि अंग्रेजों की लाठी खाने पर कम से कम अपने लोगों की सहानुभूती और मदद तो मिलती थी। लेकिन वर्तमान में तो हमारे थानों में हमारे ही लोग है जो हुबहू अंग्रेजों जैसी ही लाठियां भांजते नजर आते है। क्योंकी इंडियन पुलिस एक्ट अभी भी वहीं का वहीं है। अगर कोई शासनतंत्र गुलामों पर शासन करने […]

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न्यायपालिका की बेहतरी के लिए ज़रुरी

हमारी वर्तमान न्यायिक व्यवस्था में मात्र व्यावहारिक वकील जो न्यायाधीश , पुलिस, सरकारी वकील व न्यायालय के मंत्रालयिक कर्मचारियों से बेहतर तालमेल बनाये रख सके, उनकी मांगों की पूर्ति करता रहे और उनकी किसी बात का विरोध नहीं करे वही सफल वकील कहलाता है तथा वांच्छित निर्णय प्राप्त कर अच्छी आमदनी करने के साथ साथ कालांतर में वही उच्च न्यायिक पद प्राप्त कर सकता है . बी एम डब्लू मामले में प्रसिद्ध वकीलों क्रमशः आर के आनंद तथा आई यू खान द्वारा अपने मुवक्किल के लिए गवाह की खरीद फरोख्त के प्रकरण से यह तथ्य पुष्ट होता है कि नामी व […]

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देश का माहौल बिगाड़ने वाले तथाकथित बड़े लोग

यदि हम इतिहास उठाकर देखें तो पायेंगे कि हर क्षेत्र में हर बार भारत का सौहार्द बिगाड़ने का काम भारत के तथाकथित बड़े कहलाने वाले लोगों ने ही किया है। इसकी शुरूआत कभी भी भारत के आम आदमी ने नहीं की है। चाहे बात अखण्ड भारत के स्वतन्त्रता सेनानी और पाकिस्तान के जनक मुहम्मत अली जिन्ना से शुरू की जाये या भारत के बहुसंख्यक शूद्रों (दलित, आदिवासियों और पिछड़ों) के सेपरेट इलेक्ट्रोल के अधिकार को छीनने के लिये अनशन को हथियार बनाने वाले मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी की करें या अहिंसा के  पुजारी मो. क. गॉंधी के हत्यारे और कट्टरपंथी हिन्दू नाथूराम गोडसे की […]

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राष्ट्रीय-पर्व एवं कवि-सम्मलेनी ठेकेदारी

कुछ दिनों पूर्व एक निजी चैनल के कवि-सम्मेलन की प्रस्तुति पर पाठकों की टिप्पणियां पढ़ने को मिलीं। अत: इस मुद्दे पर विचारणीय तथ्य यह है कि निजी चैनल का प्रसारण निजी हाथों म्रें होता है। उनके प्रसारणों में सीधे तौर पर जनता का धन व्यय नहीं होता है। यदि वहाँ किसी प्रकार का रोटेशन लागू नहीं है…. तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है| किन्तु अनेक सरकारी संगठनों में होने वाले कवि-सम्म्मेलनों में जनता का धन व्यय होता है| अत: इस अवसर पर हर वर्ग के श्रेष्ठ कवियों की भागीदारी रोटेशन द्वारा सुनिश्चित की जानी चाहिए| प्राय: देखने में आता है […]

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एसपी राजेश मीणा तो एक बहाना है

पिछले दिनों राजस्थान के अजमेर जिले के पुलिस अधीक्षक पद पर तैनात राजेश मीणा को कथित रूप से अपने ही थानेदारों से वसूली करते हुए राजस्थान के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने दलाल के साथ रंगे हाथ पकड़ा गया | यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसमें किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते हुए पकड़ा गया हो! हर दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी लोक सेवक को रिश्‍वत लेते पकड़ा ही जाता रहता है| ऐसे में किसी को रिश्‍वत लेते पकड़े जाने पर, किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये| सरकार और प्रशासन अपने-अपने काम करते ही रहते हैं| इसी दिशा में हर एक […]

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पत्रकारिता मिशन नहीं, अब कमीशन का खेल है

पत्रकार के कलम की स्याही और खून में जब तलक पाक़ीज़गी रहती है तब तलक पत्रकार कि लेखनी दमकती है और चेहरा चमकता है. न तो उसकी निगाह किसी से सच पूछने पर झुकती है और न ही उसकी कलम सच लिखने से चूकती है. पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन यह भी कड़वी सच्चाई है के मौजूदा दौर बाजारवाद के हाथों कि कठपुतली है और पूरा नियंत्रण बाजारवाद के पास है. जिसका काम है खरीद-फरोख्त यानी वह हर चीज कि कीमत तय कर बाजार में ला खड़ा कर देता है,जहां आपकी […]

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हिन्दी न्यूज चैनल की पत्रकारिता

जंतर-मंतर की आवाज 10 जनपथ या 7 रेसकोर्स तक पहुंचेगी। देखिये इस बार भीड़ है ही नहीं। लोग गायब हैं। पहले वाला समां नहीं है। तो जंतर-मंतर की आवाज या यहां हो रहे अनशन का मतलब ही क्या है। तो क्या यह कहा जा सकता है कि अन्ना आंदोलन सोलह महीने में ही फेल हो गया। थोड़ा इंतजार करना है। यह अन्ना टीम के अनशन की शुरुआत पर न्यूज चैनल में संवाद का हिस्सा है। और चार दिन बाद जब अन्ना हजारे खुद अनशन पर बैठे तो…जंतर-मंतर पर आज क्या हाल है। देखिये लोग जुट रहे हैं। लेकिन वह समां अब […]

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मीडिया का यह कौन सा चेहरा है भाय

गणेश शंकर विद्यार्थी जैसों की आहुति, शहादत क्या इन्हीं दिनों के लिए थी? ऐसा ही समाज रचने के लिए थी? कि काले धन की गोद में बैठ कर अपने सरोकार भूल जाएं? बताइए कि फ़ाइनेंशियल मामलों के दर्जनों चैनल और अखबार हैं। पर कंपनियां देश का कैसे और कितना गुड़-गोबर कर रही हैं है किसी के पास इस का हिसाब या रिपोर्ट? किस लिए छपते हैं यह फ़ाइनेंशियल अखबार और किस लिए चलते हैं यह फ़ाइनेंशियल चैनल? सिर्फ़ कंपनियों का गुड-गुड दिखाने के लिए? गरीब जनता का पैसा कंपनियों के शेयर और म्युचुअल फंड में डुबोने भर के लिए? क्या ये […]

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बेलगाम मीडिया की कोई तो लक्ष्मण रेखा हो

कोर्ट के भीतर सुनवाई चल रही है, अचानक किसी ने कहा सुनवाई पूरी हो गई। कोर्ट से बाहर निकलते आरोपी को धर दबोचने के लिए घात लगाए बैठे कैमरामेन और मीडिया क्रू उस गुलाबी शर्ट पहने व्यक्ति की ओर लपके, सवालों की बौछार। कोर्ट ने आपको सजा सुनाई है, आपका क्या कहना है? व्यक्ति तमतमा गया, क्या बेहूदगी है ये। यह किसी फिल्म या टीवी सीरियल का द्रश्य नहीं बल्कि 14 मई को भोपाल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के प्रांगण में घटा वाकया है। भ्रष्टाचार के आरोपी जिस असिस्टेंट कमिश्नर सुरेश सोनी की बाइट लेने दो दर्जन से ज्यादा मीडिया क्रू ने शर्ट […]

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