पत्रकारिता मिशन नहीं, अब कमीशन का खेल है

पत्रकार के कलम की स्याही और खून में जब तलक पाक़ीज़गी रहती है तब तलक पत्रकार कि लेखनी दमकती है और चेहरा चमकता है. न तो उसकी निगाह किसी से सच पूछने पर झुकती है और न ही उसकी कलम सच लिखने से चूकती है. पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन यह भी कड़वी सच्चाई है के मौजूदा दौर बाजारवाद के हाथों कि कठपुतली है और पूरा नियंत्रण बाजारवाद के पास है. जिसका काम है खरीद-फरोख्त यानी वह हर चीज कि कीमत तय कर बाजार में ला खड़ा कर देता है,जहां आपकी […]

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गलत तस्वीर पेश कर रही है बिहार की मीडिया

सरकार की अच्छाई और बुराई को उजागर करनेकी भूमिका निभाने वाले बिहार के हिन्दी और अंग्रेजी भाषाई आइना इन दिनों चूर-चूर हो गयाहै। मीडिया में बिहार की गलत तस्वीर पेश की जा रहीहै। बिहार की राजधानी पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को खुश करने के लिए प्रथम पृष्ठ पर कुछ उत्साहवर्द्धक और जीवंत खबरें छप जरूर  रही हैं ,परन्तु बिहार के 38 जिलों में जिलाबार छपनेवाले हिन्दी अखबारों में जो खबरें इनदिनों छप रहीं हैं,वह खबरें सरकार के प्रशासनिक और पुलिस पदाधिकारियों के मनोबल को तोड़ने के लिए छापी जा रहीहै । बिहार के जिलों में वितरित होर हे जिलावार […]

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पत्रकारिता की आड़ में राष्ट्रव्यापी दलाली का नमुना

 अखबार निकालने वाले लोग दलाली करके कोयला खदानों के मालिक बनने लगे हैं. ऐसे लोगों से क्या उम्मीद करेंगे कि वे जनता के पक्ष में अखबार चलायेंगे? ये लोग खुलेआम अपने रसूख का इस्तेमाल ठेका पाने, दलाली पाने में करने लगे हैं. और, रातोंरात सैकड़ों करोड़ रुपये कमाने में सफल हो जाते हैं. दर्डा खानदान इसका साक्षात उदाहरण है. महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री जवाहरलाल दर्डा के 61 वर्षीय पुत्र विजय दर्डा लोकमत ग्रुप के चेयरमैन हैं. यह ग्रुप लोकमत मराठी दैनिक, लोकमत समाचार हिंदी दैनिक और लोकमत टाइम्स अंग्रेजी दैनिक का महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों से प्रकाशन करता है. विजय दर्डा […]

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पत्रकारों के शोषण का अड्डा बना सन्मार्ग मीडिया हाउस !

झारखंड की राजधानी रांची का एक मीडिया समूह प्रसार संख्या का फर्जी आंकड़ा दिखाकर सरकारी विज्ञापन तो बड़े अख़बारों के समकक्ष उठा रहा है,लेकिन कर्मियों को तयशुदा वेतन और सुविधाएं देने में भी टाल-मटोल का रवैया अपना रहा है। कहते हैं कि रांची से प्रकाशित दैनिक सन्मार्ग समाचार पत्र का फ्रेंचाइजी होने के नाते इस बैनर के नाम पर आने वाले विज्ञापन का एक तयशुदा प्रतिशत मूल प्रकाशक को देना पड़ता है। इसलिए इसके डाइरेक्टर प्रेम ने एक उर्दू और एक अंग्रेजी दैनिक का प्रकाशन भी शुरू किया। उर्दू दैनिक आवामी न्यूज़ का डीएवीपी और आईपीआरडी हो चूका है लेकिन, अंग्रेजी अखबार मॉर्निंग […]

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अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे भेजें

कृप्या अपनी खबरें, सूचनाएं या फिर शिकायतें सीधे raznama.com@gmail.com  या nidhinews1@gmail.com  पर भेजें।  www.raznama.com  मीडिया एवं अन्य संवेदलशील मुद्दों से जुड़े हर पहलू को आवाम के समक्ष प्रस्तुत करने का खुला सार्वजनिक मंच है। आप चाहे समाचारों / आलेखों से सहमत हों या असहमत, किसी भी लेख पर टिप्पणी करने को स्वतंत्र हैं।  हम उन टिप्पणियों को बिना किसी भेद-भाव के निडरता से प्रकाशित भी करते हैं, चाहे वह हमारी आलोचना ही क्यों न हो।  आपसे अनुरोध है कि टिप्पणियों की भाषा संयत एवं शालीन रखें ….. :संपादक

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झारखंड जागरण: तीन राज्यों से उड़ा रहा सरकारी विज्ञापन

आज रांची, पटना, लखनऊ जैसे शहरों में सैकड़ों ऐसे समाचार पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित हो रही है ,जिसका मूल मकसद प्रति माह लाखों के विज्ञापन लूटना मात्र है। इसी की एक कड़ी में ताजा उदाहरण बन कर सामने आया है एक हिन्दी दैनिक झारखंड जागरण का नाम। प्राप्त सूचना के अनुसार  रांची से झारखंड जागरण नाम का एक दैनिक अखबार पिछले कई वर्षों से प्रकाशित हो रहा है, जिसे झारखंड,बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों के लाखों के विज्ञापन  प्रतिमाह मिलते हैं। यह अखबार सिर्फ सरकारी दफ्तरों के लिए छपता है। वह भी बमुश्किल डेढ़-दो हज़ार। क्योंकि  तीनो राज्यों समेत केंद्र सरकार के सूचना-प्रसारण मंत्रालय […]

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पत्रिका खोल रही पोलः भास्कर ने खाया 765 करोड़ का कोयला

कोयला ब्लाक आवंटन पर भले ही मीडिया में हड़कंप मचा हो लेकिन एक बड़ा मीडिया घराना ऐसा भी है जो इस कोयला घोटाले में 765 करोड़ के घपले का जिम्मेदार है. दैनिक भास्कर समूह से जुड़ी बिजली कंपनी ने अवैध तरीके से दो कोयला ब्लाक लिये और बिजली उत्पादन करने बजाय कोयले का कारोबार किया. यह सब करने के लिए उसने अपने अखबार दैनिक भास्कर के प्रभाव का भी इस्तेमाल किया. और जानते हैं यह खबर कौन सामने ला रहा है? छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में पैर जमाने की कोशिश कर रहे पत्रिका समूह………………… भारत के नियंत्रक व लेखा महापरीक्षक (सीएजी) […]

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सन्मार्ग में वापसी के बाद बावरे हो रहे हैं बैजू बाबा

सन्मार्ग रांची में बैजनाथ मिश्र की वापसी के चंद रोज भी नहीं बीते कि डायरेक्टर प्रेमके साथ उनका शीतयुद्ध शुरू हो गया है. कारण है सूचना आयुक्त का मनोनयन. बैजनाथ मिश्र सूचना आयुक्त रह चुके हैं और इस पद पर अपने किसी चहेते का मनोनयन चाह रहे हैं. लेकिन जिन चार लोगों पर सहमति बनी है उनमें उनका चहेता शामिल नहीं हो पाया है. उनमें एक राजेश श्रीवास्तव हैं जो डायरेक्टर प्रेमके घनिष्ट मित्र और राज्य में विपक्ष के नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह के करीबी हैं. बैजू बाबा उनका नाम विवादित बनाकर कटवाना और अपने करीबी को उस पद पर लाना चाह रहे […]

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बिहार में 12 वर्षों तक दैनिक जागरण का अवैध प्रकाशन

देश का नम्‍बर वन बताने वाला अखबार फर्जीवाड़ा करके करोड़ों रुपये का सरकारी विज्ञापन डकार चुका है. इस बात का खुलासा एक आरटीआई के माध्‍यम से हुआ है. यह अखबार भी हिंदुस्‍तान की तरह एक रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर पर कई यूनिट लांच करके नियम कानून की धज्जियां उड़ा चुका है. मुजफ्फरपुर में जागरण के पूर्व कर्मचारी रमन कुमार यादव द्वारा मांगी गई जानकारी के आधार पर आरएनआई ने स्‍पष्‍ट किया है कि जागरण ने सिर्फ पटना के लिए अखबार का रजिस्‍ट्रेशन कराया था. इसके अलावा अन्‍य यूनिटों के लिए उसका कोई रजिस्‍ट्रेशन नहीं है. इस आरटीआई के आधार पर यह तय हो […]

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सुदेश महतो को उप मूर्खमंत्री बनाने के बाद शिबू सोरेन को उप मुख्यमंत्री बनाया

सन्मार्ग के २४ जुलाई २०१२ के अंक में झारखण्ड सरकार के तीन विज्ञापन छपे हैं उनमें एक में सुदेश महतो को उप मुख्यमंत्री से प्रमोट कर मुख्यमंत्री बना दिया गया है. शिबू सोरेन को डिमोट कर उपमुख्यमंत्री बना दिया गया जबकि, वे वर्तमान में राज्य समन्वय समिति के अध्यक्ष हैं।  विदित हो कि  आईपीआरडी के विज्ञापन विभाग से ही डिजाइन कर मीडिया को जारी किये जाते हैं। लगता है उसे और बेहतर बनाने के लिए यह कलाकारी की गयी है।  दूसरे अख़बारों में ये विज्ञापन सही छपे हैं। उनहोंने किसी को प्रमोट या डिमोट नहीं किया है। सन्मार्ग में एक बार […]

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अखबारों को पाठक नहीं,सिर्फ ग्राहक चाहिये

क्या देश के तमाम राष्ट्रीय अख़बारों को अब पाठकों की जरुरत नहीं रह गई है और क्या वे ग्राहकों को ही पाठक मानने लगे हैं? क्या अब समाचार पत्र वाकई मिशन को भूलकर मुनाफे को मूलमंत्र मान बैठे हैं? क्या पाठकों की प्रतिक्रियाएं या फीडबैक अब अख़बारों के लिए कोई मायने नहीं रखता? कम से कम मौजूदा दौर के अधिकतर समाचार पत्रों की स्थिति देखकर तो यही लगता है. इन दिनों समाचार पत्रों में पाठकों की भागीदारी धीरे-धीरे न केवल कम हो रही है बल्कि कई अख़बारों में तो सिमटने की कगार पर है. यहाँ बात समाचार पत्रों में प्रकाशित संपादक […]

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