जय मां भारती। तुझे सलाम।

आज साल-2012 का अंतिम दिन है। यह मेरे लिये आत्म-चिंतन का दिन है। 2012 मानसिक-शारीरिक तौर पर बड़ा पीड़ादायक रहा, फिर भी चेहरे पर मायूसी को फटकने न दिया। 2012 में व्यवस्था के प्रति मन में अविश्वास उत्पन्न हुआ। सत्ता-माफिया-पुलिस के धुरंधरों ने जबरन 15 लाख का रंगदार बना कर जेल भिजवाया। क्या ये लोग किसी को कभी भी कुछ भी बना सकते सकते हैं ? मलाल की बात है कि रांची की मीडिया ने अपना काम ईमानदारी से नहीं किया। उसने सच की परिभाषा ही बदल दी। दारोगा से लेकर आईपीएस अफसर भी माफियाओं के आदेशपाल बने दिखे। तब सब कुछ […]

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अंतरात्मा झांकिये साहब

जब रोम जल रहा था तो नीरो संग उसके साथी भी बंशी बजा रहे थे। लेकिन माफ कीजियेगा झारखंड के सीएम अर्जुन मुंडा जी,  बात उस समय की है- जब आप हैलीकॉप्टर हादसे के बाद प्रायः विस्तर पर पड़े रहते थे और कभी-कभार व्हील चेयर या बैशाखी के सहारे आवासीय परिसर में ही कुछ घुम-फिर भी लेते थे। आपके खबरिया समाचार पत्रों और चैनलों से ज्ञात होता था कि आप राज्य की शासन व्यवस्था की बागडोर वखूबी संभाल रहे थे । जाहिर भी है कि प्रायः शारीरिक रुप से घायल इंसान मानसिक रुप से चोटिल थोड़े होता है। ऐसे मैं भी एक हादसे […]

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अविश्वास और उत्पीड़न का पर्याय है झारखंड पुलिस

जब किसी भी सिस्टम का फिल्टर खराब हो जाये, तब अविश्वास और उत्पीड़न जन्म लेता है। आज हम बात करते हैं पुलिस फिल्टर सिस्टम की। इसमें कोई शक नहीं कि पुलिस नेताओं खास कर सत्ता पर कुंडली मार कर बैठे व्यूरोकेट्स के इशारे पर नाचती है। एक आम आदमी के दुःख-दर्द और उसकी सच्चाई कोई मायने नहीं रखती। एक चौकीदार-कांस्टेवल से लेकर पुलिस सिस्टम का हर महकमा अधिक से अधिक काली कमाई करने पर उतारु है। हम यह नहीं कहते कि इस सिस्टम से जुड़े हर लोग निकम्मे और भ्रष्ट हैं। लेकिन इतना तो सत्य है कि इस सिस्टम में अगर […]

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लो भाई, देख लो आयना

तुझे मान गये भाई। तू है असली झारखंडी मीडिया का एक ऐसा बड़ा वर्ग, जिसके चश्में के गर्द साफ करने की कला राजनामा डॉट कॉम  में नहीं है। तू  कुछ भी छाप-दिखा सकते हो। आखिर वाक्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तेरी जागीर जो ठहरी। भला तू भाई लोग राजनामा डॉट कॉम को ये आजादी क्यों दोगे ! ऐसी भी बात नहीं है कि तू सब राजनामा डॉट कॉम या उसके संचालक-संपादक मुकेश भारतीय को नहीं जानते हो। सब जानते हो। लेकिन,सबाल है कि तू लोग एक बड़े समाचार पत्र को छोड़ मेरा साथ क्यों दोगे। वह भी व्यूरोकेट्स और कॉरपोरेटस् मीडिया की […]

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सरकारी मनमानी और निकम्मी मीडिया

अक्सर लोग मुझसे पुछते हैं कि आप मीडिया के खिलाफ इतने आक्रोशित क्यों रहते हैं… आखिर क्या मलाल है मीडिया से। सच पुछिये तो मेरे अंदर न तो मीडिया के प्रति कोई व्यक्तिगत आक्रोश है और न ही कोई मलाल। हां, जब एक आम भारतीय के रुप में आंखों के सामने उसकी वेश्यावृति से भी वद्दतर हालत देखता हूं तो मन-मस्तिष्क पीड़ित हो उठता है। अब देखिये न। आज रांची के ओरमांझी में सभी अखबारों में प्रकाशित एक खबर पढ़ा। यह खबर “ ओरमांझी में प्रशासन ने चलाया बुलडोजर   ” शीर्षक से है। बात चाहे दैनिक प्रभात खबर, दैनिक हिंदुस्तान की […]

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प्रभात खबर को है हिम्मत यह लिखने की ?

झारखंड-बिहार में भ्रष्टाचार की कोख से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर के स्थानीय संपादक विजय पाठक की निर्मल बाबा से संबंधित समाचार पढा़। मैं किसी भी धर्म-आस्था पर टीका टिप्पणी नहीं करता और सब कुछ जन मानस पर छोड़ देता हूं। फिलहाल, पाठक ने जिस प्रकार के संदर्भों की चर्चा देकर समाचार लिखा है..निःसंदेह वह उनकी घटिया मासिकता को अधिक उजागर करती है। अगर वे निर्मल बाबा के आडियोलॉजी का थोड़ा सा भी जिक्र करते तो उनका यह समाचार निष्पक्ष कहला सकता था। विजय पाठक अभी झारखंड की पत्रकारिता का सबसे बड़े बागड़ बिल्ला यानि दैनिक प्रभात खबर के प्रधान संपादक  हरिवंश […]

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