‘मुंशिया के पापा’

दो औरतें आपस में अपने घर के सामने खड़ी होकर बतिया रही थीं। शाम को धुंधलका था- शक्ल तो नहीं देख सका अलबत्ता उनके मुख उच्चारण उपरान्त निकले शब्दों का श्रवण स्वान सदृश तीव्र कर्णों से किया था। बड़ा आनन्द आया। मुझे लगा कि इनसे बड़ा कोई आलोचक नहीं हो सकता। वह क्या कह रही थी जब आप पढ़ेंगे तो आप को भी आनन्द की अनुभूति होगी। वह जो आदमी जा रहा है, उसे मैं अपने मोहल्ले में पिछले 40 सालों से देख रही हूँ। इस मोहल्ले में यह ऐसा आदमी है जिसने हमारी बहू-बेटियों की तरफ मुँह करके नहीं देखा […]

Read more