सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस की कविताः एक गीत समाज के अंतिम के लिए

तोड़के तारे लाया हूँ तुम गुमसुम गुमसुम बैठे हो एक बार ही बोलो ना तेरे लिए लाऊँ क्या। माना बहुत सताये हो दुनिया से ठुकराये हो हंसी ख़ुशी मुस्कान दिल्लगी सब कुछ गवां के आये हो पर इतना ही क्या कम है कितना सुंदर जीवन है मैं भी इस पर रीझ गया अपनी दुनिया भूल गया आशा ढूंढ़ के लाया हूँ तुम उलझे उलझे बैठे हो एक बार ही बोलो ना.. चलो तो हम भी चलते हैं तूफानों से लड़ते हैं अँधेरे के इस जंगल में एक दिया बन जलते हैं उठो तो वादा करते है बात पते की करते है […]

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विज्ञापन से सब नपे, नपे चैनल-अखबार

ग्लोबल इनवेस्टर्स समिट की, चर्चा है चहुंओर। नेता – अधिकारी बने, देखो माखनचोर।। विज्ञापन से सब नपे, नपे चैनल-अखबार। गिफ्ट-रुपये से नपे, नपे संपादक-पत्रकार।। सागर पवित्र स्नान को, जब मन करे ललचाय। पूंजीपति-राजनीतिबाज को, चले सब माथ नवाय।। कनफूंकवों की चल बनी, ईमानदार बौराए। रघुवर के अरे राज में, अर्जुन तीर चलाए।। सीएस के आगे डायरेक्टर, पीआरडी शीश नवाए। जैसे-जैसे वे कहे, वैसे ही वह करते जाये।। किसी की भी ना सुने, सिर्फ सुने वह कान लगाये। सीएस की ही चाकरी, दिन-रात करत बिताये।। सीएस की ही ब्रांडिंग, हो रही अखबार में आज। पीछे हो गये सीएम, अब सीएस चलाये राज।। […]

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लुआठी’ के सम्पादक ‘आकाश खूंटी’ को मिला ‘श्रीनिवास पानुरी स्मृति सम्मान’

धनबाद। खोरठा साहित्य में उल्लेखनीय योगदान केलिए खोरठा पत्रिका ‘लुआठी’ के सम्पादक गिरिधारी गोस्वामी ‘आकाश खूंटी’ को खोरठा कवि श्रीनिवास पानुरी की 96वीं जयंती पर धनबाद की साहित्यिक संस्था ‘खोरठा साहित्य विकास मंच’ एवं ‘उमा फिल्म प्रोड्क्शन’ कतरास के सौजन्य से ‘श्रीनिवास पानुरी स्मृति सम्मान’ से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान पानुरी जयंती पर कल बरवा अड्डा में आयोजित भव्य साहित्यक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि पूर्व मंत्री मथुरा प्रसाद महतो के हाथों दिया गया। इन्होने चालीस पृष्ठों की ‘लुआठी’ का ‘पानुरी स्मृति अंक’ के साथ उनके प्रतिनिधि कविताओं का सम्पादन कर ‘सबले बीस’ एवं उनकी चालीस साल पुरानी नाटक ‘चाबी […]

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काले धन की काली लड़ाई, राम दुहाई राम दुहाई

विचाराधीन या बेचारा अधीन ? इस बार भी हुआ जेल ब्रेक / भागे कैदी पर उन्हें महज कैदी कहा गया. दाढ़ी थी इनके भी, उनसे थोड़ी लम्बी भी मगर नहीं कहे गये, इस बार ये आतंकी. थोड़े सांस्कृतिक राष्ट्रवादी टाईप के थे. इसलिये पकड़ लिये गये जिन्दा वर्ना मारे जाते भोपालवालों की तरह. वैसे तो आतंक का कोई धर्म नहीं होता. धर्म का जरूर आतंक हो सकता है.   एनकाउन्टर  जेल से उठाओ भगाओ और भून दो फिर फैंक आओ लो गया एनकाउन्टर ! कुछ सिरफिरे कहेंगे इसको फेक उठायेंगे सवाल मांगेंगे तो दे देना प्लेटों के खंजर और लकड़ी की चाबी […]

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