हिन्दी के ही एफएम चैनल कर रहे हैं हिन्दी का बेड़ा गर्क :राहुल देव

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rahul‘वर्तमान में मीडिया में हिंदी की जो स्थिति है, वह लंगड़ी, लूली और अपाहिज भाषा सी है। इसका असर यह होगा कि जो लोग भाषाई अपाहिज हैं, वे आगे चलकर बौद्धिक अपाहिज हो जाएंगे। यह हिंदी की दैनिक हत्या जैसा है। कोई भी स्वाभिमान समाज ऐसा नहीं करता, जैसा हमारे यहां हो रहा है।’

यह कहना है वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव का।

वे हाल ही में भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग द्वारा आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के तौर पर बोल रहे थे, जिसका विषय था ‘मीडिया की भूमिका: भाषा सीखना या सिखाना’।

अपने संबोधन में राहुल ने कहा कि मीडिया की सिखाने की भूमिका, सीखने की भूमिका से ज्यादा बढ़ी है। उन्होंने कहा कि हिंदी के एफएम चैनल हिंदी को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। दुर्भाग्य से हिंदी समाज में इसका कोई संगठित विरोध भी नहीं हो रहा है। इसके विपरीत अंग्रेजी के एफएम चैनल इतना घालमेल नहीं करते।

हालांकि उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि अंग्रेजी भाषा भी सीखना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं होगा तो हम एक ही भाषा में सीमित रहेंगे, लेकिन इतना ध्यान रखना होगा कि हिंदी भाषा हमारी जमीन है।

वहीं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी.के. कुठियाला ने कहा कि मीडिया की भूमिका भाषा को सिखाने की ज्यादा है। उन्होंने कहा कि हिंदी मीडिया में इंडिया शब्द का प्रयोग होता है लेकिन अंग्रजी मीडिया में भारत शब्द का नहीं। इस गुत्थी को सुलझाना होगा।

उन्होंने कहा कि जब सहिष्णुता शब्द चल सकता है तो हिंदी मीडिया में हिंदी का कोई भी शब्द चल सकता है। उन्होंने जानकारी दी कि विश्वविद्यालय मीडिया की भाषा पर जल्द ही राष्ट्रीय संगोष्ठी करने जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार आनंद पांडे ने कहा कि भाषा का संक्रमणकाल चल रहा है। जीवन में जड़ता से अस्तित्व पर खतरा पैदा हो जाता है। यही चीज भाषा के साथ भी है। अत: भाषा को ताकत से अधिक लचीलेपन की आवश्यकता है। अखबार का मुख्य कार्य संवाद है, और इसके लिए भाषा में समझौता करना होता है। पर यह ध्यान देने वाली बात है कि समझौता कितना करना।

वरिष्ठ पत्रकार विनोद पुरोहित ने कहा कि मीडिया में बोलचाल की भाषा के प्रयोग की बात कही। भाषा पर अधिकार और स्वाभिमान होना चाहिए। और किसी भाषा को सीखने से गुरेज नहीं होना चाहिए।

समाज पोषित मीडिया पर आधारित तीसरे सत्र में वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय ने बताया कि मीडिया समाज को स्थायित्व नहीं दे रहा। बल्कि ओर अस्थायी ही कर रहा है। लोकतंत्र को अधिक टिकाऊ होना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार उमेश त्रिवेदी ने बताया कि समाज की तरह सारी व्यवस्थाएं भी जीर्ण-शीर्ण हो चुकी हैं। अत: समाज मीडिया को पोषित नहीं कर सकता। समाज में परिपक्वता, समझ, साहस के बिना कोई भी धारा ठीक से नहीं चलेगी। दृष्टिकोण खड़े करना मीडिया के साथ ही समाज की भी जिम्मेदारी है।

संगोष्ठी में पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों के साथ ही विभाग के सभी शिक्षकों ने भी भाग लिया|  

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