स्कॉलर होते हैं परीक्षा माफिया के असली ब्रह्मास्त्र

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मुन्ना भाई के तरकश में कई तीर हैं, लेकिन स्कॉलर, ब्रह्मास्त्र की तरह काम करते हैं। प्रश्नपत्र लीक होने के बाद स्कॉलर ही इसे हल करते हैं, जिसे सेटर परीक्षार्थी तक पहुंचाते हैं।

इससे पहले काफी दिनों तक इंजन (स्कॉलर) बैठाकर डिब्बे (परीक्षार्थी) को स्टेशन (परीक्षा) पार कराने का काम किया जाता रहा है।

यानी स्कॉलर सेटरों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। माफिया कितना भी पहुंच वाला हो बगैर स्कॉलर के उसके सभी नेटवर्क फेल हो जाते हैं। इनका महत्व इसी से समझा जा सकता है कि जब कभी सेटर प्रश्न पत्र आउट करने में असफल होते हैं।

वैसी स्थिति में स्कॉलर आधुनिक तकनीक यानी ब्लूटुथ, आदि के जरिए हाईटेक नकल करवाते हैं। गिरोह के सदस्य इंजन, डिब्बे, स्टेशन आदि का इस्तेमाल परीक्षार्थियों के संदर्भ में करते हैं।

इंजन बैठा डिब्बे को पार कराते थे स्टेशन: माफिया समय-समय पर स्कॉलर का उपयोग बदलते रहे हैं। इंजन से इसकी शुरुआत हुई।

इसमें माफिया आवेदन करते समय परीक्षार्थी के साथ स्कॉलर का भी फार्म भरवाते थे और बड़ी चतुराई से परीक्षार्थी के मिलते-जुलते नाम का प्रयोग करते थे।

फर्जी तरीके से स्कॉलर का सर्टिफिकेट उसी नाम से बनवाकर उसकी फोटो कॉपी से फार्म भरते थे। कोई चूक न हो जाए, इसलिए परीक्षा लेने वाले आयोग के कर्मियों से सेटिंग कर रोल नंबर आगे-पीछे डलवाते थे, ताकि परीक्षा केंद्र में इंजन परीक्षार्थी की कॉपी लेकर उसमें सही-सही उत्तर भर दे।

परीक्षार्थी स्कॉलर की कॉपी लेकर गलत-सही उत्तर भरते रहता था। लेकिन इसमें कक्ष निरीक्षक द्वारा पकड़े जाने का खतरा रहता था।

बाद में अंगूठे के निशान लिए जाने के कारण परीक्षार्थी के भी पकड़े जाने का खतरा रहता था। कई इंजन और परीक्षार्थी पकड़े भी गए। तब माफिया ने स्कॉलर का उपयोग अलग रूप से करना शुरू कर दिया।

फर्जीवाड़े के खेल में सेटरों ने स्कॉलर के अंगूठे का लेमिनेशन कराकर परीक्षार्थी के अंगूठे की तरह का बनवाना शुरू कर दिया।

परीक्षा खत्म होते ही परीक्षार्थी का असली फोटो करवा दिया जाता था। इसमें शुरुआती दौर में खतरा कम रहता था। बाद में इसमें भी खतरा होने लगा।

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