सुरेन्द्र कुमार सिंह चांस की कविताः एक गीत समाज के अंतिम के लिए

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तोड़के तारे लाया हूँ

तुम गुमसुम गुमसुम बैठे हो

एक बार ही बोलो ना

तेरे लिए लाऊँ क्या।

माना बहुत सताये हो

दुनिया से ठुकराये हो

हंसी ख़ुशी मुस्कान दिल्लगी

सब कुछ गवां के आये हो

पर इतना ही क्या कम है

कितना सुंदर जीवन है

मैं भी इस पर रीझ गया

अपनी दुनिया भूल गया

आशा ढूंढ़ के लाया हूँ

तुम उलझे उलझे बैठे हो

एक बार ही बोलो ना..

चलो तो हम भी चलते हैं

तूफानों से लड़ते हैं

अँधेरे के इस जंगल में

एक दिया बन जलते हैं

उठो तो वादा करते है

बात पते की करते है

सपनों की जगमग दुनिया में

एक हकीकत बनते हैं

गागर भरके लाया हूँ

तुम प्यासे प्यासे बैठे हो

एक बार ही बोलो ना

तेरे लिए लाऊँ क्या।

यह दुनिया एक मेला है

चंचल मन का खेला है

फूल उगें है सपनो के

सपनो का ही रेला है

दिन था रातेँ आयीं हैं

आयीं है तो जाना है

ये मेरा उदघोष नही है

ये दस्तूर पुराना है

जीवन ढूंढ़ के लाया हूँ

तुम सहमे सहमे बैठे हो

एक बार ही बोलो ना

तेरे लिए लाऊँ क्या।

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