सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया बोर्ड के फ़ैसले को सही ठहराया, अखबार मालिकों को झटका

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sc_pressसरकार द्वारा मजीठिया बोर्ड के निर्णय को नोटिफ़ाईड किये जाने की तारीख 11.11.2011 से सभी पत्रकार एवं गैर पत्रकारो को बकाये वेतन का मार्च 2014 तक का भुगतान दिनांक 7.02.2015 तक यानी फ़ैसले के दिन से एक वर्ष के अंदर चार किस्तों मे देने का आदेश माननीय उच्च न्यायालय ने दिया है तथा अप्रील 2014 से संशोधित वेतनमान के अनुसार वेतन देने का आदेश दिया।

यानि अप्रील 2014 मासिक वेतन की शुरुआत तथा उसके पहले के बकाये ( arrear ) का ग्यारह नंवबर 2011 से मार्च 2014 तक का भुगतान चार किस्तो मे सात फ़रवरी 2015 तक चुकाने का आदेश। 

सरकार ने 24.05.2007 को न्यायमुर्ति नारायन कुरुप की अध्यक्षता मे एक्ट के प्रावधान की धारा 9 एवं धारा 13 ( c ) के तहत दो बोर्ड का गठन किया था ।

एक प्रेस के पत्रकारों के लिये दुसरा प्रेस के गैर पत्रकार कर्मियो के लिये  जस्टिस कुरुप ने कुछ कारणवश अपना इस्तीफ़ा दे दिया जो दिनांक 31.07.2008 को मंजूर हुआ। जस्टिस कुरुप के इस्तीफ़े के बाद मुंबई उच्च न्यायालय के सेवानिवर्त न्यायमूर्ति गुरु बख्श राय मजीठिया दोनो बोर्ड के अध्यक्ष बने तथा दिनांक 04.03.2009. को पदभार ग्रहण किया।

मजीठिया बोर्ड ने अखबारो मे कार्यरत्त कर्मियो के वेतनमान की अनुशंसा की जिसके खिलाफ़ देश के तकरीबन सभी अखबारो ने दिल्ली उच्च न्यायालय मे बोर्ड के गठन के विरुद्ध रिट दाखिल किया था ।जिसे उच्च न्यायालय ने खारीज कर दिया था। मजीठिया बोर्ड की अनुशंसा के खिलाफ़ दायर इस रिट मे मालिको ने मुख्यत: चार मु्द्दे उठाये थे ।

1. ( validity of act ) वर्किंग जर्नलिस्ट एवं अदर न्यूज पेपर इंप्लाई (कंडीशन आफ़ सर्विस ) एंड मिसलेनियस एक्ट 1955 तथा संशोधित एक्ट 1974 संवाधान के प्रावधानो के विपरित है एवं संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1) (a) एवं 19(1) ( g ) का उलंघन है।

2. मजीठिया बोर्ड का अनुचित तरीके से गठन ।

3. बोर्ड की प्रक्रिया मे अनियमितता ।

4. बोर्ड द्वारा अनुशंसा करते समय संदर्भित विषय की अनदेखी तथा बाह्य तत्वो पर विचार । 

न्यायालय द्वारा बोर्ड के गठन को पूर्णत: नियमानुकूल माना गया । बोर्ड की प्रक्रिया मे भी कोई कमी न्यायालय ने नही पाया तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उलंघन को भी न्यायालय ने गलत पाया। कुछ अजीब बाते जो उभर कर सामने आइ उनका उल्लेख आज के संदर्भ मे बहुत आवश्यक है।

सबसे आश्चर्य की बात तो यह तर्क था जो मालिको द्वारा दिया गया कि बदलते आर्थिक परिदर्श्य यानि ग्लोबलाईजेशन के इस दौर मे वेतन बोर्ड की कोई जरुरत नही है। यह बहुत चिंता का विषय है और उनलोगों की नजर खोलने के लिये काफ़ी है जो ग्लोबलाइजेशन एवं निजीकरण को सही ठहराने का प्रयास करते है।

दुसरा तर्क कि पत्रकारो को अच्छा खासा वेतन मिल रहा है इसलिये वेतनमान को रेगुलेट करने वाले किसी बोर्ड की जरुरत नही है ।

एक्ट संविधान के प्रावधान के प्रतिकूल है इसका जवाब देते हुये न्यायालय ने पूर्व के एक निर्णय जो Express Newspaper (P) Ltd. vs. Union of India AIR 1958 SC 578 का हवाला दिया जिसमे इस एक्ट को पूर्णत : संविधान के प्रावधानो के अनुकूल बताया गया है ।

मजीठिया बोर्ड के गठन को गलत बताने के मालिको के तर्क को भी न्यायालय ने यह कहकर खारिज कर दिया कि पूर्व मे बोर्ड के गठन को मालिको ने दिल्ली उच्च न्यायालय मे चुनौती दी थी, जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया था उस आदेश के खिलाफ़ मालिक कही नही गये अत: इस स्टेज पर इसे उठाने की अनुमति नही दी जा सकती।

अंत में मालिको का यह कहना था कि बोर्ड ने बाह्य कारको पर ज्यादा ध्यान दिया एवं क्षेत्रियता यानी अखबारों के प्रकाशन क्षेत्र को ध्यान मे नही रखा और उसके आधार पर अनुशंसा नही की । न्यायालय ने उनकी इस दलील को भी खारिज कर दिया।

न्यायालय ने स्पष्ट शब्दो मे कहा कि रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि तीन स्तर पर क्षेत्रों को बांटा गया है तथा उसके आधार पर एच आर ए एवं ट्रांसपोर्ट अलाउंस का निर्धारण किया है। क्षेत्रो का निर्धारण एक्स वाई, जेड श्रेणी मे किया गया है। हालांकि सरकार ने सभी अनुशंसा को नही माना है तथा सेवानिवृति की उम्र, पेंशन , मातर्त्व लाभ जैसे अनेको मुद्दे छुट गये है फ़िर भी एक शुरुआत तो हुई।

यह फ़ैसला जहां अच्छे , काबिल पत्रकारो के पक्ष में है वहीं सडक छाप, खिसक खिसक कर मैट्रिक पास वालों के लिये नुकसानदेह है अब नौकरी योग्य पत्रकार को ही मिलेगी।

न्यायालय ने भी अपने फ़ैसले मे पत्रकारो का कुशल होना महत्वपूर्ण माना है। तीन जजो की बेंच ने यह फ़ैसला दिया है जिसमे मुख्य न्यायाधिश पी सदाशिवम, रंजन गोगई तथा बिहार से गये शिव क्रिति सिंह शामिल है।

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