सीएम-स्पीकर के हाथ में जेपीआरडी की महालूट की बानगी

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प्रवेशांक के लोकार्पण के दौरान भी नहीं खुली आंखें कि  प्रकाशन पूर्व कैसे मिलते हैं सरकारी विज्ञापनः

झारखंड सरकार के सूचना एवं जन-संपर्क विभाग में महालूट का आलम क्या है? इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी ताजा बानगी सीएम अर्जुन मुंडा से लेकर  विधानसभा के अध्यक्ष सीपी सिंह तक के हथेली में पहुंचने के बाबजूद कहीं कोई जूं नहीं रेंगती है। इसका सीधा अर्थ यह निकाला जा सकता है कि राज्य के मुखिया तक विभाग और मीडिया के नाजायज गठजोड़ के पचड़े में पड़ने का जोखिम उठाना नहीं चाहते या फिर वे विज्ञापन नियमावली से अनभिज्ञ हैं।

बात कुछ भी हो। पिछले दिन एआईटी भवन सभागार में माननीय मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष ने  जिस मासिक समाचार पत्रिका का लोकार्पण बड़े जोशोखरोश के साथ किया। उसमें कई पेज सरकारी विज्ञापन भी प्रकाशित थे। जबकि वह पत्रिका बिना निबंधित और प्रवेशांक था। फिर भी न जाने किस आधार पर उसे सरकारी विज्ञापन प्रकाशन के पूर्व ही जारी कर दिये गये। इस सबाल पर सभागार में उपस्थित स्वंभू पत्रकारों का हुजुम भी बगले झांक रहे थे। 

कहने को तो इस विभाग में अभी तक बिहार विज्ञापन नियावली ही लागू है लेकिन, यहां कोई कायदा कानून नजर नहीं आता। यहां सब अधिकारियों के ठेगें पर चलता है।    

इसके पूर्व रांची से प्रकाशित एक उर्दु अखबार के प्रथम अंक (17 अगस्त को प्रकाशित) में  15 अगस्त के शुभ अवसर पर एक रंगीन फुल पेज का सरकारी विज्ञापन दे दिया गया है। इस अखबार की एक-दो प्रतियां सूचना एवं जन संपर्क विभाग के अधिकारियों की टेबुल के आलावे कहीं भी नजर नहीं आती है। 

आखिर इस उर्दु अखबार को एक फुल पेज रंगीन पेज का विज्ञापन कैसे दे दिया गया? इसकी पड़ताल करने के संदर्भ में जब  झारखंड सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग के कार्यालय में निदेशक से संपर्क साधा गया तो उनका जबाब चौंकाने वाला था कि यहां ऐसा हो ही नहीं सकता। जब उन्हें अखबार की प्रतियां दिखाई गई तो उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुये विभाग के एक अधिकारी  के सामने दूसरे अधिकारी को बुलवाया और मामले की जानकारी ली। पहले तो उस अधिकारी ने पिछले साल का विज्ञापन होगा-कहकर पीछा छुड़ाने की कोशिश की, और जब उनका ध्यान  प्रथम अंक  की ओर दिलाया गया तो बोल उठे कि मौखिक आदेश दिया गया होगा।

इस दौरान पड़तालकर्ता द्वारा  बातचीत के चित्र लिये, लेकिन एक कनीय अधिकारी के एकांत में ले जाकर कहने पर निदेशक  ने  कैमरे से वे सारे चित्र जबरन डिलीट कर दिये । ताकि इस राज को पर्दाफाश होने से रोका जाये। दरअसल कथित उर्दू अखबार को विज्ञापन जारी करना एक लूट का हिस्सा है, जिसका खेला बेरोक-टोक जारी ही नहीं है बल्कि उसका दायरा दिन व दिन बढ़ता जा रहा है।

सबाल है कि प्रथम अंक में सारे कायदे-कानून को ताक पर रख कर प्रांत के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री,सरकार संचालन समिति के अध्यक्ष के फोटो समेत फुल पेज का रंगीन विज्ञापन कैसे छप गये। किस अधिकारी ने आम जनता की गाढ़ी कमाई के इस खुली लूट में हिस्सेदारी बंटाई।

हालांकि झारखंड सरकार के सूचना एवं जन संपर्क विभाग द्वारा बंदरबांट का यह कोई एकला-दुकला मामला नहीं है। इस तरह के अनगिनत मामले हैं। यह एक जांच का विषय है कि फर्जी आकड़ों व कायदे-कानून को ताक पर  रख कर इस विभाग में कैसे-कैसे महालूट मची है।

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