सीएम नीतिश को मुंह चिढ़ाता जैविक उर्वरक संयंत्र का यह शिलापट्ट

Share Button

12 साल पहले हुआ था शिलान्यास, अब स्थल दिखता है जंगल

नालंदा (जयप्रकाश नवीन )।  “मसला यह नहीं की मेरा दर्द कितना है, मुद्दा ये है कि तुम्हें परवाह कितनी है “

किसी गजल कार की यह पंक्ति हमारे हुक्मरानों के गाल पर तमाचे की तरह है ।जो किसी योजना का शिलान्यास कर उसे भूल जाते है। यह दर्द है उस परियोजना की, जो राजनीतिक झंझावतो में फंसा दम तोड़ने को मजबूर है।

हमारे हुक्मरानों के लिए भले ही शिलापट्ट हंसी खेल हो। मगर आम लोग पत्थर पर खींची लकीर को दिल पर ले बैठते हैं। जब काम नही हो और शिलापट्ट ढहने लगे तो दिल टूटने का एहसास होता है।

nitish-chandi-1शिलापट्ट के बहाने विकास की उम्मीद बढ़ती है ,हसीन ख्वाब बनते है। लेकिन जब यही पत्थर बेजुबान जस का तस  लोगों को मुँह चिढाए दिख जाए तो जनमानस ढगा सा महसूस करता है। कुछ यही ढगापन पिछले 12 साल से चंडी की जनता महसूस कर रही है ।

केन्द्र की एनडीए सरकार सूबे के सीएम नीतीश कुमार द्वारा धरातल पर उतारे गए केन्द्रीय परियोजनाओं का उद्घाटन कर अपनी पीठ भले  थप -थपा रही है,लेकिन उसी एनडीए के शासन में नालंदा के चंडी में इफको द्वारा एक करोड़ की राशि की लागत से प्रस्तावित जैविक उर्वरक संयंत्र का शिलान्यास हुआ था।

आज 12 साल बाद केन्द्र में उसी एनडीए की सरकार है। तुक्का उस पर बिहार से राधामोहन सिंह केंद्रीय कृषि मंत्री। पिछले एक साल से एनडीए के कई मंत्री और नेता जिले को रौंद रहे हैं। बावजूद उन्हें अपने कार्यकाल में हुए जैविक उर्वरक कारखाने की शिलान्यास याद नहीं है।

यह अलग बात है कि तत्कालीन रेलमंत्री नीतिश कुमार के प्रयास से उन्हीं के हाथों इसका शिलान्यास हुआ था। 12 साल से यह उर्वरक संयंत्र राजनीतिक उपेक्षा का शिकार बना हुआ है ।

nitish-chandi-314 जनवरी 2004 नालंदा जिला का  राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 30ए पर स्थित जैतीपुर एक ऐतिहासिक पल का गवाह बनने जा रहा था। शिलान्यास स्थल को दुल्हन की तरह सजाया गया था। किसानों का रेलम पेल, राजनीतिक नेताओं का जमावड़ा, मीडिया का हुजूम, जनता में उत्साह थमने का नाम नही ले रहा था।

कारण था कि देश का सबसे बड़ा खुला जैविक उर्वरक संयंत्र प्रथम प्रधानमंत्री स्व. नेहरू के संसदीय क्षेत्र फूलपुर के बाद चंडी में अस्तित्व में आने बाला था। आधारशिला की नींव जैसे ही रखी गई पूरा वातावरण नारों से गूँज उठा था। शिलान्यास के बाद किसानों को आश्वासन मिला था कि 40 दिन के अंदर जैविक उर्वरक संयंत्र कार्य करने लगेगा। लोगों में आशा का एक संचार जगा था कि खाद के लिए अब भटकना नही पड़ेगा। जैविक खाद से उनकी फसलें अच्छी होगी।सब्जी का उत्पादन बढ़ेगा। लेकिन किसानों के सपने अधूरे ही रह गए। शिलान्यास के कुछ दिन बाद ही 14वीं लोकसभा चुनाव की बिगुल बज गई। चुनाव के बाद एनडीए सरकार की जगह यूपीए की सरकार बन गई ।दस साल तक यूपीए की ही सरकार रही। जैविक कारखाने का मामला ठंडे बस्ते में चला गया। संयंत्र राजनीतिक उपेक्षा का शिकार बन गया। किसान मायूस होने लगे। शिलान्यास स्थल पर लगा बोर्ड कोई ले भागा।

शिलापट्ट पर अंकित नीतीश कुमार, केन्द्रीय रेलमंत्री, उदयशंकर अवस्थी प्रबंध निदेशक इफको, अजीत सिंह अध्यक्ष नेफेड, सांसद राजीव रंजन सिंह आदि के नाम अब तो बामुश्किल से पढ़ा जाता है। शिलान्यास स्थल अब जंगल का रूप ले चुका है ।इसका अस्तित्व कब का समाप्त हो चुका।

शिलान्यास के 12 साल बाद भी कार्य एक इंच नही बढ़ा। अधिकारियों को पता  तक नहीं कि चंडी में कोई जैविक उर्वरक संयंत्र भी है। 12 साल बाद भी इसके जमीन पर मालिकाना हक किसका है, किसी को जानकारी नहीं। स्वीकृत दस लाख रूपये किसने डकारे कोई नहीं जानता।

अब केन्द्र में भाजपा की सरकार है। बिहार से ही कृषि मंत्री है। फिर भी इसका अहल्या उद्गार नही हो पा रहा है। इनके शासन में  जैविक उर्वरक संयंत्र को शुभ मुहूर्त का इंतजार कब तक रहता है, यह तो समय बताएगा, लेकिन यह भी हकीकत है कि उर्वरक संयंत्र अब अपने निर्माण की  उम्मीद छोड़ चुका है, दम तोड़ चुका है।

Share Button

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.