सीएम और उनके सलाहकारों को सदबुद्धि दें भगवन

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कहावत है थोथा चना बाजे घना। जी हां, आज कल इसी कहावत को चरितार्थ कर रहे है झारखण्ड के सीएम रघुबर दास। cm_raghubar_sarhul लोगों के साथ साथ सबको बड़ी आशाएं थी रघुबर दास से।

लोग इस बात पर फूले नहीं समा रहे थे कि ये झारखण्ड की तक़दीर ओर तदवीर दोनों ही बदल डालेंगे। पर हो रहा है ठीक उसका उल्टा।

अगर तुलना झारखण्ड के पिछले सीएम हेमंत सोरेन से भी किया जाये तो उनकी तुलना में रघुवर दास की सम्पूर्ण कार्यशैली बचकानी लगती है।  

इनके सारे वायदे फीसड्डी साबित हो रहे हैं।  इनके सारे राजनैतिक सलाहकार और यहां तक की खुद सीएम रघुवर दास दिवालिया मानसिकता के लगते हैं।

आज से ठीक एक सप्ताह पहले बीजेपी के एक सीनियर नेता का कहना था कि इस बार सरहुल पर्व पर निकलने वाले जुलुस पर हेलीकाप्टर से फूलों की वर्षा की जायेगी। तब यह विश्वास नहीं हुआ था।  उस नेता की बातों को किसी मद्द्की की मद्दक्खाने की गप समझकर टाल गया था।

पर जब सही में सरहुल जुलुस पर हेलीकाप्टर से फूलों की वर्षा करते देखा तो लोग शर्म से पानी पानी नजर आए। जाहिर है कि कोई तो है, जो सरहुल जुलुस पर हेलीकाप्टर से फूलों की वर्षा करने की सलाह सीएम को दी होगी।

 cm_sarhulआखिर किस सोच के ये लोग है और झारखण्ड को किस ओर ले जाना चाहते हैं।  इस फूहड़ हरकत से किसका भला हुआ? उन आदिवासी गरीब बच्चों का, जो जुलुस के दौरान दो रुपये की चना के लिए ठेला वालों से गिडगिडाते नजर आ रहे थे  या उन हजारों बच्चें, जिनके बदन पर ढंग के कपडे और पैर में चप्पल तक नहीं थे।  या जुलुस में शामिल उन्हें, जिन्हें एक ग्लास शरबत तक नसीब नहीं हुआ?

 अगर फूल बरसाने पर औसतन ढाई से तीन लाख भी खर्च हुए होंगे तो जाहिर है ये तीन लाख पानी में बहाए गए।  सारे फूल सड़कों पर , नालियों, कूड़े-कर्कटों में तथा छतों पर बिखर गए।  इतनी राशि से जुलूस में शामिल होने वाले हजारों बच्चों के बीच चना गूड़ शरबत बांटे जा सकते थे।  हजारों बचों को कपडे खरीदकर दिये जा सकते थे। या फिर हजारों बचों के नगें पैरों में चप्पल जूते ख़रीद कर दिये जा सकते थे।

 पर यहाँ तो दिखाना है सीएम रघुवर दास को कि बल्कि वे भी आदिवासी हितों के सबसे बड़े पुरोधा हैं। भगवान इनको और इनके सलाहकारों को सदबुद्धि दे।

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