सरकारी विज्ञापनों में अब नहीं दिखेगा पांच साल तक सिर्फ पीएम का चेहरा

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courtसरकारी विज्ञापनों में सिर्फ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का ही फोटोग्राफ होने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है।  सुप्रीम कोर्ट ने 13 मई 2015 के आदेश में संशोधन किया है।

पिछली सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से दलील देते हुए अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा था  कि सुप्रीम कोर्ट ये तय नहीं कर सकता कि सरकारी विज्ञापनों में फोटो किसकी हो। ये काम संसद का है। संसद इसके लिए बजट देता है और वो फंड रोक भी सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने उक्‍त मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

अटार्नी जनरल ने कहा था कि अगर प्रधानमंत्री की फोटो विज्ञापनों में हो सकती है तो चीफ मिनिस्टर और बाकी मंत्रियो की क्यों नहीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से देश के सभी मंत्री बिना चेहरे के हो गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पांच साल एक ही चेहरा देखने को मिलेगा जो प्रधानमंत्री का है। यह सही नहीं है। दूसरे चेहरे भी दिखाना लोकतंत्र का हिस्सा है।

समाचार एजेंसी भाषा के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापनों के प्रति अपने आदेश में शुक्रवार को एक बड़ा बदलाव किया।

अब सरकारी विज्ञापनों में राज्यपालों, केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और राज्य के मंत्रियों की फोटोज दिखाई जा सकती हैं। कोर्ट ने ऐसे विज्ञापनों के प्रकाशन को मंजूरी दे दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र एवं राज्यों की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया है। याचिका लगाने वालों में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु भी शामिल हैं जहां चुनाव होने वाले हैं।

इन याचिकाओं में विज्ञापनों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और चीफ जस्टिस के अलावा अन्य नेताओं की फोटो प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार किए जाने की मांग की गई थी। कहा गया कि यह आदेश संघीय ढांचा और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

जस्‍ट‍िस रंजन गोगोई और पी. सी. घोष की बेंच ने कहा, ‘‘हम अपने उस फैसले की समीक्षा करते हैं जिसके तहत हमने सरकारी विज्ञापनों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की फोटोज के प्रकाशन को मंजूरी दी है। अब हम राज्यपालों, संबंधित विभागों के केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और संबंधित विभागों के मंत्रियों की तस्‍वीरें प्रकाशित किए जाने की अनुमति देते हैं।’’ बेंच के मुताबिक, ‘‘शेष शर्तें एवं अपवाद पहले के जैसे ही रहेंगे।’’

इससे पहले कोर्ट ने नौ मार्च को उन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था जिनमें किया गया था कि प्रधानमंत्री के अलावा केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अन्य राज्य मंत्रियों के चित्रों को सार्वजनिक विज्ञापनों में लगाने की अनुमति दी जाए।

शीर्ष अदालत ने इससे पहले सरकारी विज्ञापनों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और चीफ जस्‍ट‍िस के अलावा किसी अन्य नेता की तस्वीर के प्रकाशन पर रोक लगा दी थी।

केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने विभिन्न आधारों पर फैसले की समीक्षा करने का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि अगर विज्ञापनों में प्रधानमंत्री की तस्वीर लगाने की अनुमति दी जाती है तो वही अधिकार उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों को भी उपलब्ध होना चाहिए।

रोहतगी ने कहा था कि सरकारी विज्ञापनों में मुख्यमंत्रियों और उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों के चित्र लगाने की भी अनुमति दी जानी चाहिए।

केंद्र के अलावा कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ ने कोर्ट के 13 मई 2015 के आदेश की समीक्षा किए जाने का अनुरोध किया था।

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