सरकारी भोंपू बनता आज की मेनस्ट्रीम मीडिया

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12 अप्रैल, 1947 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने प्रार्थना सभा में अखबारों को लेकर एक बात कही थी,” आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें।कुछ खबर सुननी हो तो एक दूसरे से पूछ लें।अगर पढ़ना हो तो सोच-समझकर अखबार चुन लें,जो हिन्दुस्तानियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों……. “

जयप्रकाश नवीन

राजनामा.कॉम। पत्रकारिता शुरुआती दौर में एक मिशन के रूप में सामने आयी थी लेकिन आज बदलते बाजारवाद संस्कृति के बीच यह शुद्ध रूप से व्यवसाय बन चुका है।

तब और अब की पत्रकारिता में काफी बदलाव आ चुका है। फिर भी पत्रकारिता की ताकत को कोई चुनौती नहीं दे सकता है। इसकी भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता है।

पत्रकार, साहित्यिकार, राजनेता, समाज सुधारक या यों कहे कि अभिव्यक्ति की लड़ाई में शरीक सभी ने इसे हथियार बना कर अपनी आवाज बुलंद की।

आजादी के बाद पत्रकारिता को अपना रास्ता पता था लेकिन अब मीडिया का रास्ता पत्रकारिता की सड़क पर नही बल्कि सत्ता की गलियों से गुजरता है।

आज मीडिया ने नई मर्यादाएं स्थापित की है। मुख्यधारा की मीडिया और एकतरफा राजनीति का संपूर्ण विलय हो गया है। एक पार्टी की विचारधारा का चादर हर चैनल और हर एकंर ने ओढ लिया है।

एक समय था, जब अंग्रेज़ी और हिंदी मीडिया में वाकई एक फर्क होता था। जो अब मिट चुका है। 70 करोड़ दर्शकों तक अपनी पहुँच का दावा करने वाले चैनल अब सिर्फ़ सरकार की वफादारी में लगें हुए हैं।

तभी तो पिछले कुछ सालों से  देश में जो कुछ भी चल रहा है।उन सब के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैसे लोकप्रिय बने हुए हैं?

देश में मंदी की आहट, नोटबंदी और जीएसटी से उधोग धंधे की कमर टूट चुकी है।देश की कई कंपनियाँ बिकने के कगार पर है,रेलवे के निजीकरण की खबरें, करोड़ों युवाओं को रोजगार नहीं मिलना,मंहगाई चरम पर है। बावजूद मीडिया में इसकी चर्चा नहीं होती है।

प्याज और टमाटर की कीमतों पर कभी रूदाली करने वाले निजी चैनल आज नागरिकता कानून पर सरकार की तरफदारी और सरकार को बचाने में अहम् भूमिका निभाती चली जा रही है। चैनलों के एकंर पूरी तरह सरकारी पीआर मशीनरी के एक हिस्से के रूप में सरकारी एजेंडे को बेचने में लगे हुए हैं।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और उसके सबसे बड़े प्रतीक मंच मीडिया में विपक्ष को क्यों गायब किया जा रहा है?एक तरफा न्यूज कवरेज और सता से सवाल के बजाय विपक्ष से सवाल क्यूँ कर रही है मीडिया। जनता और विपक्ष की आवाज  कहलाने वाली मुख्यधारा की मीडिया आज सता के साथ चली गई है।

शायद  आज  जनता भी उन चैनलों को बगैर किसी सवाल के देखते हैं जिनके यहां सरकार से कोई सवाल नहीं होता है। प्रेस प्रोपेगैंडा तंत्र में बदलता जा रहा है। प्रेस की आजादी के मामले में भारत 180 देशों की सूची में 140 वें स्थान पर है।

ऐसा सिर्फ सरकार की वजह से नहीं हुआ है।दर्शकों और पाठकों की वजह से भी  हुआ है। तभी तो जो चैनल या अखबार जितना दरबारी है,वह रेटिंग और प्रसार की होड़ में उतने ही बेहतर नंबर पर है।

आज मेनस्ट्रीम मीडिया पढ़े -लिखे लोगों को दिन-रात पोस्ट -इलिटरेट करने में लगा हुआ है। वह अंधविश्वास और अंधकार में घिरे नागरिकों को सचेत और समर्थ नागरिक बनाने का प्रयास छोड़ चुका है। अंध राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता उसके डिबेट का हिस्सा बन चुका है। जो आज मेनस्ट्रीम पत्रकारिता का चेहरा बनें हुए हैं।

उनकी जवाबदेही समाप्त हो चुकी है। हर बात में सता का गुणगान करना और अपने डिबेट में हिन्दू-मुस्लिम-पाकिस्तान के नाम पर दो प्रवक्ताओ को आपस में लड़ा  देना है और बहुत ही चालाकी से असली खबर को दबा देना है। पत्रकार के वेश में न्यूज एकंर सिर्फ़ चीखने -चिल्लाने के लिए ही रह गए हैं। मीडिया विपक्ष द्वारा सरकार की आलोचना को देश की आलोचना बता देता है।

मेनस्ट्रीम मीडिया आज पूरी तरह राग दरबारी बन चुका है। आप याद करिए देश का एक प्रमुख न्यूज चैनल बताता है कि 2019 का वर्ल्ड कप भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किस्मत के कारण जीतनेवाला है। न्यूज एकंर की चीख लाखों घरों में गूँज रही थी।

जब भारत का चंद्रयान चांद पर जाने को बेताब था। तब एक और सता भक्त  न्यूज चैनल की हेडलाइन थी ‘चांद मोदी की मुट्ठी में’,’चांद पर मोदी-मोदी’। शायद चांद का जितना गुणगान जितना कवियों और शायरों ने नहीं किया उतना न्यूज चैनलों ने चांद के बहाने पीएम मोदी का कर डाला।

आपको याद होगा कि कैसे एक न्यूज चैनल ने जेएनयू प्रकरण को लेकर  एक महीने तक शो किया था और ईमानदार पत्रकारों को अफजल गैंग का तमगा दिया। उन्हें देश विरोधी, धर्म विरोधी और एंटी मोदी बताया जाने लगा। तमाम एकंर,पत्रकार सता की गोद में बैठकर सरकार का भोंपू बनते चले गए।

इधर नागरिकता कानून,जामिया मिलिया इस्लामिया और जेएनयू प्रकरण ने भी मीडिया के दोहरे चरित्र को उजागर किया है। जब देश में बड़े पैमाने पर नागरिकता कानून के संशोधन को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहा था।

तब मेनस्ट्रीम मीडिया का एक बड़ा वर्ग चौबीस घंटे सरकार के बचाव में लगा था।इन आंदोलनों के दौरान पुलिस की बर्बरता की गवाही दे रहे ऐसे तमाम वीडियो सामने आ रहे थे। जामिया हो या जेएनयू सब जगह वही तस्वीरें दिखाई दें रही थी जो मीडिया दिखा रहा था।

न्यूज चैनलों ने विरोध प्रदर्शन के वही वीडियो दिखाये जिसमें बसों पर हमला होते दिख रहा था,ताकि इस प्रदर्शन को वो हिंसा और दंगे के रूप में दिखा सकें।उसने छात्रों के खिलाफ पुलिस की बर्बरता के वीडियो को बड़ी चालाकी से गायब कर दिया।जब सरकार के नुमाइंदे  इन न्यूज चैनलों पर आकर कहते हैं।

स्थिति नियंत्रित है।तब ये न्यूज चैनल सरकार को वह वीडियो फूटेज दिखाकर सवाल करते हैं कि छात्रों और प्रदर्शनकारी बसों को जला रहे हैं, पुलिस को पीट रहे हैं?

कैसे न्यूज चैनल अपने प्राइम टाइम में बताता है कि जिस तरह हर शहर में एक इलाका ऐसा होता है जहाँ पुलिस जाने से डरती है,ठीक उसी तरह ये छात्र देश के कुछ विश्वविद्यालयों में भी वैसा ही माहौल चाहते हैं।

जब मेनस्ट्रीम मीडिया में विपक्ष और असहमति गाली बन जाएँ, तब असली संकट जनता पर ही आता है। दुर्भाग्य से इस काम में न्यूज चैनलों की आवाज सबसे कर्कश और उंची है।

एकंर अब बोलता नहीं चीखता है,दौड़ते हुए स्टूडियो में घुसता है।देश के लोगों में लोकतंत्र का जज्बा बहुत खूब है,लेकिन न्यूज चैनलों का मीडिया उस जज्बे को हर शाम -रात कुचल देता है।

कहा जाता है कि किसी भी लोकतंत्र में सरकार का मूल्यांकन आप बिके हुए प्रेस से नहीं कर सकते हैं, लेकिन इस सरकार में किया जा रहा है। इस सवाल का जवाब अभी बाकी है। प्रेस की आजादी का सवाल किसका है? दो-चार पत्रकारों का या पूरे समाज की।

महात्मा गांधी का वह कथन ‘यदि अखबार दुरूस्त नहीं रहेंगे तो फिर हिन्दुस्तान की आजादी किस काम की’ कितना यथार्थ लगता था। जिसका गला आज की मुख्यधारा की मीडिया घोंटने पर तूली है।

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