सबकी ‘होली’ एक दिन, अपनी ‘होली’ सब दिन

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मुझे बहुत अजीब सा लगता है, जब हास्य-व्यंग्य शैली में लिखने वाले लोग अप्रासंगिक विषय-वस्तु का प्रयोग करते हैं। इन व्यंग्यकारों के गुणावगुण पर ज्यादा कुछ कहना नहीं है। मैंने महसूस किया है कि इनके कुछेक आलेख सर्वथा काल्पनिक ही होते हैं। मसलन होली या अन्य विशेष पर्व-अवसरों के बारे में जब इनकी लेखनी चलती है तो प्रतीत होता है कि ये ‘टू एनफ’ ही कर रहे हैं। मैं यह आप पर कत्तई ‘लाद’ नहीं रहा। कोई जरूरी तो नहीं कि आप किसी की बात को नसीहत ही मानें या आँख मूँद कर विश्वास ही करें।

holiखैर होली आ गई है। वैसे बसन्त का मौसम तो एक माह से ही चल रहा है। फागुन में जवानी-दीवानी होती है। हो सकता है, परन्तु मैं इससे सहमत नहीं हूँ। फागुन में बाबा देवर लागैं- इसमें कौन सा नयापन दिखता है? हाँ यह बात दीगर है कि बसन्त, फागुन और होली के नाम पर भड़ासी लेखक अपने अन्दर के गुबार निकालकर स्वयं को हल्का कर लेते हैं-ऐसा करने से मात्र उन्हें ही लाभ मिलता है, या फिर उनके जैसे लोगों को।

सिने तारिकाओं/कलाकारों, राजनेताओं और विशिष्टजनों के प्रति लगाव रखने वाले हास्य-व्यंग्यकार होली का हुल्लास अपने-अपने तरीके से लिखते हैं। मैंने भी लिखा है होली संवाद, होली का हास्यफल और पता नहीं क्या-क्या, जिसे मैं एक औपचारिक पारम्परिक लेख ही मानता हूँ, जिसका विषय-वस्तु वास्तविकता के धरातल पर न होकर कल्पना के वायुमण्डल में उड़ता है।

दशकों पूर्व की बात है जब प्रिण्ट मीडिया के होली विशेषाँकों में विपरीत और अनापेक्षित संवादों का प्रकाशन हुआ करता था, तत्समय पाठकों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती थी और न्यूज प्रिण्ट का सरकुलेशन बढ़ता था। सब्सक्राइबर्स द्वारा अपनी प्रतियाँ पहले से ही एडवान्स में बुक कराई जाती थीं। प्रिण्ट मीडिया से जुड़ा हर पत्रकार अपने-अपने तरीके से होली संवाद, आलेख एवं व्यंग्य लिखने की होड़ में रहा करता था। मेरी समझ से तब का जमाना भी कुछ वैसा ही रहा होगा, जैसे कि फागुन में बाबा देवर लागैं या फिर फागुन में जवानी-दीवानी होती है…..आदि।

प्रिण्ट में लोगों को होली उपाधियों से अलंकृत करना एक परम्परा थी, जो अब धीरे-धीरे करके विलुप्त होने लगी है। वर्ना एक दशक पूर्व तक मैं ही प्रिण्ट के अनेकों पृष्ठों का पोषण होली (विशेषाँक) के अवसर पर समस्त सुपाच्य सामग्रियों से किया करता था। अब होली हो या अन्य कोई मौजमस्ती का अवसर इस पर लेखनी चलाने का ‘मूड’ ही नहीं होता। शायद इसी को ‘राइटिंग एलर्जी’ कहते हैं। किसका गुणगान किया जाए? कौन है जिसकी तारीफ में कसीदे पढ़े जाएँ….? ‘सेलीब्रेटीज कौन है, जिसे देश की डेढ़ अरब जनसंख्या अपना आदर्श मानती है….? या कौन है वह नेता जो वायदे न करके काम पर विश्वास करता हो। आप हमें बताएँ- हम विचार कर उसको अपने लेखन का विषय-वस्तु मानकर अवश्य ही कुछ वैसा ही लिखेंगे जैसा आप चाहते हैं।

मेरी समझ से होली पर व्यंग्यादि लिखना विशुद्ध नवनीत लेपन सा कार्य है और लेखककी हैसियत विदूषकों जैसी होती है। लेखन के माध्यम से चमचागीरी करने से बेहतर है कि राजनीति में उतरकर पार्टियों के प्रमुखों, कद्दावर नेताओं के इर्द-गिर्द एच.एम.वी. के स्वान की तरह ‘फेथफुल’ कहलाया जाए। खूब मालपानी काट कर जीवन सफल बनाएँ। बंगला, गाड़ी और ऐशो आराम के संसाधन युक्त जीवन जीएँ।

कहने का यह तात्पर्य नहीं कि हर व्यंग्यकार मेरी तरह कंगाल है। अब तो लेखन और मीडिया से जुड़े लोग मालदार होते हैं, भौतिक सुख-सुविधा सम्पन्न ऐसों की कद्र हर कोई करता है। पाठक बन्धु-बान्धवों जब भी होली का अवसर आता है मुझे अजीब सा महसूस होने लगता है। समझ में नहीं आता कि क्या करूँ? अपनी इस मनःस्थिति का किससे निदान कराऊँ ताकि अच्छे ढंग से उपचार हो सके।

हेमा मालिनी से लेकर माधुरी दीक्षित, विद्या बालन, प्रियंका चोपड़ा, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना से लेकर आमिर खान तक के बारे में होली संवाद लिख चुका हूँ। सुनील गावस्कर, सचिन तेन्दुलकर, धौनी तक भी अछूते नहीं रहे। मैंने खूब लेखनी चलाई है। केजरीवाल एवं उनके समकालीन नेताओं के  पूर्व 70 के दशक से ख्यातिलब्ध हर महत्वपूर्ण हस्तियों पर लिखा है, लेकिन सिवाय वाहवाही के कुछ भी हासिल नहीं हुआ।

शायद यही वजह है कि अब बसन्त, फागुन और फिर होली मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती और खाली पाकेट, सूनी मुट्ठी, भूखे पेट इक्कसवीं सदी में भी 20वीं जैसे हालात से गुजरने वाला मुझ जैसा कलमकार पौरूषहीन हो चुका है। इसीलिए होली का कोई रंग पसन्द नहीं एक तरह से ‘एलर्जी’ हो गई है ‘होली’ से। आपकी होली मजे से बीते यही कामना है।

मैं अपनी हालत के लिए किसी को दोषी नहीं मानता। किसी प्रकाशक/सम्पादक अथवा सेलीब्रेटीज या फिर पाठकों को। मेरी अपनी आदत ही ऐसी है कि जो भी किया और करता हूँ उसे अपना क्षत्रिय धर्म समझता हूँ, उसकी एवज में किसी चीज की दरकार नहीं रखता हूँ। इस भौतिकवादी युग में मुझ जैसा व्यक्ति अभी तक जिन्दा है यही क्या किसी उपलब्धि से कम है। जाहिर सी बात है कि मैं अपनी हालत का स्वयं जिम्मेदार हूँ। इन सबके बावजूद मैं जानते हुए भी ठकुर सोहाती अस्त्र का शिकार हुआ वर्ना होली के अवसर पर अपना डिप्रेशन, एलर्जी दुखड़े के रूप में न लिखता।

मैंने यह भी महसूस किया है कि कुछेक लेखकों को होली पर लेखन के लिए सम्बन्धितों द्वारा ऑब्लाइज किया जाता है। कई लेखक जो अपने को नामचीन कहलाने में फख्र महसूस करते हैं वे सभी प्रायोजित लेखन करते हैं। वह बुद्धिजीवी नहीं अपितु मसिजीवी कहे जा सकते हैं। इनको प्रकाशक-मुद्रक, सम्पादक, सेलीब्रेटीज सभी अनुबन्धानुसार ओब्लाइज करते हैं। इन सबकी होली चियरफुल मूड में बीतती है। मैं कामना करता हूँ कि आप भीं होली हर्षोल्लास के साथ मनाएँ। इस अवसर पर बनने वाले पारम्परिक पकवानों का स्वाद ही न लें बल्कि भरपूर उदरस्थ भी करें। मुझे मेरे हाल पर छोड।

 मैं अब तक के जीवन में हर दिन पापड़ बेलता ही रहा हूँ। इस बार की होली पर भी पापड़ ही बेल रहा हूँ। होली के अवसर पर बनाए जाने वाले पकवानों में पापड़ का बड़ा महत्व होता है। एक तरह यह माना जा सकता है कि मेरे जीवन का हर दिन ‘होली’ ही है क्योंकि जीने के लिए नित्य, हर क्षण मुझे पापड़ बेलने पड़ते हैं। आप सभीं को होली की ढेरों शुभकामनाएँ। रंगोत्सव पर बधाई।

bhupendra

………… डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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