सन ऑफ सरदार: मनभावन हंसी-ठिठोली

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प्रेम कहानियों में कई बार असफलता हाथ लगती आई है और कई बार सफलता। ‘सन ऑफ सरदार’ की प्रेम कहानी में कुछ खास नहीं है, लेकिन यह हंसी-ठिठोली से लोगों का मनोरंजन करते हुए आगे बढ़ती है और अंत में प्रेम की जीत होती है, जैसा कि फिल्मी कहानियों में अक्सर होता है।
कहानी लंदन से शुरू होती है, लेकिन यह क्षणिक है। यहीं जसविंदर सिंह रंधावा यानी जस्सी [अजय देवगन] को संजय मिश्रा से पता चलता है कि उसके गांव, जो फगवाड़ा के पास है, में उसकी पुश्तैनी जमीन है, जिसकी कीमत पचास लाख है, लेकिन तभी उसे पता चलता है कि गांव के ही बलविंदर सिंह संधू यानी बिल्लू [संजय दत्त] के परिवार से खानदानी दुश्मनी है। जस्सी के पिता और बिल्लू के भाई दोनों की मौत आपस में लड़कर होती है। जस्सी को लेकर उसकी मां लंदन चली जाती है और उसे सीखा देती है कि नफरत से दूर रहो, वहीं दूसरी ओर बिल्लू का घराना यह कसम खाए बैठा है कि जब तक जस्सी की हत्या नहीं करेगा, वह बहुत से काम नहीं करेगा, जैसे वह शादी उस काम के होने के बाद ही करेगा आदि। बिल्लू के घराने में एक और बात है कि उनके घर में जो भी व्यक्ति आता है, वे सब उन्हें घर में नहीं मारते। जब घर से निकलता है, तब उसकी हत्या करते हैं।

लंदन में जब यह बात जस्सी को पता चलती है, तो वह उस जमीन को बेचने के लिए अपने गांव आता है। जब वह दिल्ली से ट्रेन के जरिए फगवाड़ा आ रहा होता है, ट्रेन में ही सुखमीत यानी सुख [सोनाक्षी सिन्हा] मिलती है। इन दोनों में बातचीत होती है। फिर दोनों गांव में मिलते हैं, तब पता चलता है कि सुख बिल्लू की भतीजी है। फिर जस्सी सुख के ही घर में आ जाता है, उसके बाद जस्सी को पता चलता है कि बिल्लू का परिवार घर से निकलते ही उसकी हत्या कर देगा। वह बहाने बनाते हुए उसी घर में रहता है और एक दिन वह भी आता है जब सुख की सगाई के दिन जस्सी और बिल्लू के परिवार के बीच लड़ाई होती है और पता चलता है कि जस्सी और सुख के बीच प्यार है। इस झगड़े को मिटाने में अहम भूमिका निभाती है पम्मी यानी जूही चावला। वह बिल्लू को समझाती है जिससे उसकी शादी होनी है उससे दुश्मनी ठीक नहीं।

फिल्म की कहानी बहुत अलग नहीं है, लेकिन दिल्ली और पंजाब में युवाओं की जो बोली है, उसी बक-बक के साथ कहानी आगे बढ़ती है और ये संवाद लोगों को हंसाते हैं। जैसे कदी हंस भी लिया करो.., मैं और तू समझदार बाकी सब बेकार.. आदि। अश्विनी धीर का निर्देशन सही है। वे ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ और सीरियल ‘लापतागंज’ के बाद इस फिल्म को भी वैसे ही लेकर आए हैं। बस फिल्म में जस्सी का घर से न निकलने के लिए बहाने बनाने वाला हिस्सा थोड़ा सुस्त करता है। वे इसे एडिट करते, तो फिल्म और अच्छी होती। फिल्म में एनिमेशन का काम ऐसा हुआ है, जिसे देखकर अच्छा फील नहीं होता।

अभिनय की बात करें, तो अजय देवगन ने जस्सी की भूमिका को सही जिया है। सोनाक्षी ने भी अपना काम बखूबी किया है। वे पंजाबी कुड़ी की भूमिका में एकदम सही लगी हैं। बाकी कलाकारों में संजय दत्त, विंदू दारा सिंह, मुकुल देव, जूही चावला, तनुजा आदि का काम भी बढि़या है। गेस्ट रोल में सलमान खान, संजय मिश्रा, मुकेश तिवारी और पुनीत इस्सर अच्छे लगे हैं।

फिल्म का गीत-संगीत सुरीला है। एक गीत ‘ये जो हल्की हल्की खुमारियां..’ को साजिद-वाजिद ने बहुत सुरीला बनाया है। शेष गीतों को हिमेश रेशमिया ने अपनी धुन से अच्छा बनाया है जैसे ‘सन ऑफ सरदार..’, ‘रानी मैं तू राजा..’, ‘तू कमाल दी कौड़ी..’, ‘बिछड़े तो जी ना पाएंगे..’ आदि सुरीले हैं। गीतों का फिल्मांकन भी अच्छा हुआ है। जिस गीत का दर्शक फिल्म में इंतजार करते हैं, वह गीत ‘पों पों पो..’ अंत में है, जब लोग हॉल से निकलते होते हैं।

निर्माता : अजय देवगन, एन आर पचीसिया और प्रवीण तलरेजा, निर्देशक : अश्विनी धीर, संगीत : हिमेश रेशमिया, साजिद-वाजिद, कलाकार : अजय देवगन, सोनाक्षी सिन्हा, संजय दत्त, जूही चावला, अर्जन बाजवा, तनुजा, मुकुल देव, विंदू दारा सिंह, राजेश विवेक, अवधि : 140 मिनट

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