कुर्सी जाते ही बिखरने लगा मीडियाधारी सीएम का तिलिस्म

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mundaवेशक झारखंड में अर्जुन मुंडा ने जोड़-तोड़ (कथित खरीद-फरोख्त) कर सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया है। क्योंकि आकड़े बताते हैं कि ये सबसे अधिक बार उस समय मुख्यमंत्री बने, जब राज्य की राजनीति में धन-बल हावी हुआ।

यह जांच का विषय है कि राज्य की सबसे अधिक दुर्गति इन्हीं के शासन काल में कहीं अधिक रही। मुंडा की राजनीति की शुरुआत झारखंड मुक्ति मोर्चा के बनैर तले हुई।

 बाद में विधायक बनने के बाद इन्होंने झामुमो तोड़ते हुये सीधे भाजपा में छलांग लगा दी और अपने छल-प्रपंच का सहारा लेते हुये प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को किनारे कर दिया ।

राज्य गठन के बाद अब तक बनी किसी भी सरकारों ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के मुंडा ने मुख्यमंत्री की अपनी तीसरी अंतिम पारी में 27 माह 28 दिन तक मुख्यमंत्री रहे।

बिहार से अलग हुए झारखंड राज्य का गठन 15 नवंबर 2000 को हुआ था।

बीजेपी के नेता बाबूलाल मरांडी 15 नवंबर 2000 को राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने थे और इस पद पर 17 मार्च 2003 तक रहे थे।

इसके बाद बीजेपी के नेता अर्जुन मुंडा 18 मार्च 2003 से दो मार्च 2005 तक पहली बार मुख्यमंत्री बने। 

झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख शिबू सोरेन दो मार्च 2005 से 12 मार्च 2005 तक राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री रहे और इसके बाद एक बार फिर अर्जुन मुंडा 12 मार्च 2005 से 18 सितम्बर 2006 तक मुख्यमंत्री रहे।

राज्य के इतिहास में पहली बार एक निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को मुख्यमंत्री बनने का श्रेय मिला। कोड़ा 18 सितम्बर 2006 से 27 अगस्त 2008 तक राज्य के पांचवें मुख्यमंत्री रहे।

इसके बाद एक बार फिर शिबू सोरेन 27 अगस्त 2008 से 18 जनवरी 2009 तक राज्य के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद फिर प्रदेश मे राष्ट्रपति शासन लगा। 

राष्ट्रपति शासन 19 जनवरी 2009 से तीस दिसम्बर 2009 तक रहा और फिर तीस दिसम्बर 2009 को शिबू सोरेन तीसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और तीस मई 2010 तक इस पद पर रहे।

 सोरेन तीस मई 2010 की रात से एक जून 2010 तक राज्य की कार्यवाहक मुख्यमंत्री भी रहे।

 राज्य में एक जून 2010 से दस सितम्बर 2010 तक एक बार फिर राष्ट्रपति शासन लगा और इसके बाद 11 सितम्बर 2010 को अर्जुन मुंडा राज्य में तीसरी बार मुख्यमंत्री की कमान संभाले।

हालांकि, राजनीतिक विश्लेष्क अब अर्जुन मुंडा की अंतिम सत्ता यात्रा मान कर चल रहे हैं। क्योंकि पहली बार इन्होंने झामुमो के शिबू सोरेन से टकराव किया है, जो इनके राजनीतिक उत्थान एवं सत्तासीन होने में परोक्ष-अपरोक्ष रुप से सिर हाथ रखते आये हैं।  

भाजपा में भी अब अर्जुन मुंडा की स्थिति पहले जैसी नहीं देखने को मिल रही है। अभी उनकी जो भी छवि दिख रही है, वह मीडिया जनित है- क्योंकि उन्होंने अपने कार्यकाल में मीडिया के पीछे राजकोष खूब लुटाया है।  

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