सड़क पर गजराज, समझिये इनके गुस्से

Share Button

: मुकेश भारतीय :

रांची।  भारतीय वेद, पुरान, रामायण, महाभारत आदि धार्मिक ग्रंथों में गजराज को मानव समुदाय से सीधा जोड़ा गया है। हिन्दू धर्म में कोई भी मांगलिक कार्य जयश्री गणेश यानि लंबोदर महाराज से ही होती है। लेकिन सांस्कारिक शुरुआत के अस्तिव पर ही प्रहार होने लगे तो परिणाम भयावह तो होगें हीं।

झारखंड की प्रकृति और जीवन का मूल तत्व जल, जंगल और जमीन है। बढ़ती आबादी और औधोगिकीकरण ने पहले ही यहां की जमीने हड़प ली है। अब उनकी नजर पहाड़ और जंगल पर है। तेजी से जंगल काटे जा रहे हैं। विस्फोटों से पहाड़-पर्वत कांप रहे है। इसका कुप्रभाव जल संचय पर भी पड़ा है। आज पूरे प्रदेश में जल संकट है। सरकार को डोभा और तालाब की योजनाओं पर करोड़ो-अरबो रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।

सबाल उठता है कि आखिर झारखंड जैसे मनोरम प्रांत में गजराज इतने गुस्से में क्यों हैं। खासकर राजधानी रांची के आसपास स्थिति इतनी भयावह कैसे हो गई है ? इसे हम हाथियों के आतंक दर्शा अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं। वे हरित वन के गवाह होते हैं। उनका आशियाना भी वही होता है। अब कोई किसी के घर गृहस्थी को लूटेगा, उसे तंगो-तबाह करेगा, उसे विध्वंस करेगा तो वह कहां जायेगा।

यहां गजराज के गुस्से को सब अपने तरीके से आंक रहे हैं। उसकी व्याख्या कर रहे हैं। किसी का कहना है कि गांव वाले हड़िया-दारु बनाते हैं, उसकी महक उन्हें गांवों की खींच लाती है। कोई कहता है कि मादा जब किसी बच्चे को जन्म देती है तो वे झूंड में मदमस्त हो उठते हैं। लकिन क्या महज एक दशक पहले इतने गंभीर हालात क्यों नहीं थे ? क्या गांवों में तब हड़िया दारु नहीं बनते थे। तब कोई मादा बच्चे को जन्म नहीं देती थी। क्या तब खेतों और खलिहानों में फसलें नहीं होती थी।

राजधानी रांची की प्रसिद्धि पहाड़ों और उसकी खूबसूरत वादियों के बीच खिलता गुलाब सी रही है। यहुदियों, मुगलों, अंग्रेजों जैसे आक्रांताओं को भी यह शहर खूब भाया है। यहां के खुशमिजाज मौसम के कारण ही यह बिहार की पुरातन काल से ग्रीष्मकालीन राजधानी मानी जाती रही है। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है। अब हमारे शहर में केन्द्रीय गृह मंत्री, सांसद, मुख्यमंत्री, नगर विकास मंत्री सरीखों को सिर पर रुमाल रख कर हरित पर्यावरण का देना पड़ रहा है।

रांची के चारो ओर बात चाहे ओरमांझी, सिकीदिरी, अनगड़ा, सोनाहातु, बुंडु, तमाड़ आदि की हो या फिर पतरातु सटे हलकों की। क्रेशर की बाढ़ और उसके अवैध उत्खनन से पहाड़ तेजी से ध्वस्त हो रहे हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से वन मृदा क्षेत्र में तब्दील दिखाई देने लगा है। आखिर मानव जीवन की सुरक्षा देने वाले वन्य प्राणी जाएं तो कहां ?

 यह भी नहीं भूलनी चाहिए कि झारखंड पहला राज्य है जहां देश का पहला हाथी सफारी बनाया गया। जब अलग झारखंड राज्य का गठन हुआ तब राज्य सरकार ने हाथियों के संरक्षण के लिए एक प्रोजेक्ट का प्रस्ताव बनाकर केंद्र सरकार को भेजा, जिसे केंद्र सरकार ने तुरंत स्वीकृत कर लिया।

इस परियोजना के लिये केंद्र सरकार ने 6.25 करोड़ रुपए स्वीकृत किये। परियोजना के तहत रांची, सिंहभूम, गुमला, हजारीबाग चतरा लातेहार एवं डालटनगंज में हाथियों के लिए शरण स्थल बनाने का निर्णय लिया गया।

केंद्र सरकार ने इस परियोजना के लिए एक करोड़ रुपये तत्कालीन बिहार सरकार को दिए थे परन्तु परियोजना को मूर्त रूप नहीं दिया गया। उसके बाद भी कई योजनाएं धरातल पर नहीं उतर पाई।

नतीजतन, कई इलाकों में हाथियों का उत्पात जारी है। संताल परगना में तो कई हाथियों के उत्पात से बचने के लिए पेड़ों पर रात गुजारते हैं। लोग मारे जाते हैं तथा सरकार द्वारा मुआवजे की औपचारिकता पूरी कर दी जाती है, परन्तु हाथियों के लिये कोरिडोर को सुरक्षित नहीं रखा जा रहा है। हाथियों का कोरिडोर आज ध्वस्त हो चुका है। उनके कोरिडोर में मानव की दखलअंदाजी बढ़ गई है। गजराज के लिए जंगल से निकल कर आबादी वाले इलाकों में आकर उत्पात मचाने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया है। उन्हें जंगल में भोजन नहीं मिल पाता है। पीने को पानी नहीं मिल पाता है। उन्हें सुनाई देता है तो सिर्फ वृक्षों के रुदन और पहाड़ों के विस्फोट की कर्कश ध्वनि। जिसे कम करने में पूरा वन महकमा निकम्मा प्रतीत हो रहा है।

अब जरुरी है कि यहां गजराज की सुरक्षा और संरक्षण के साथ-साथ उनमें तथा मानव में टकराव खत्म करने की दिशा में सार्थक पहल की जाए। अन्यथा लोग और भी आक्रामक प्रकोप के लिए तैयार रहें।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...