सच को दबाने की वैधानिक साज़िश

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deepakराजनामा।  टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने जब इंडिया संवाद पर मुकदमा किया तो मुझे ज्यादा आश्चर्य नही था. अगर आप देश के सबसे ताकतवर मीडिया मुग़ल विनीत जैन के सच को लिखेंगे तो एक मुकदमा तो आप पर दर्ज होना ही चाहिये. विनीत जैन का मुकदमा इस बात का गवाह है कि इंडिया संवाद जैसे जन स्वामित्व वाले मीडिया का कुछ प्रभाव होने लगा है ..या यूँ कहें की चींटी सीधे हाथी की सूंड में घुसने लगी है. जिस देश में लठ्ठ खाकर नेता और गोली खाकर शहीद बनने का रिवाज हो वहां मानहानि का मुकदमा झेले बिना पत्रकार कहलाना कैसे उचित हो सकता है.

लेकिन मित्रों बात टाइम्स आफ इंडिया या टाइम्स नाउ की नही है. हमने अपनी अगली खोज खबर जो नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी NSE में हो रहे कथित घपले पर छापी तो इंडिया संवाद पर 100 करोड़ का आपराधिक मान हानि का मुकदमा ठोका गया.

NSE ने इसी खबर पर 100 करोड़ का एक मुकदमा मुंबई की पत्रकार सुचेता दलाल पर भी दर्ज करवाया.

मित्रों 100 करोड़ के इस मुक़दमे से भी हम विचलित नही है लेकिन मानहानि के मुकदमो का ये ट्रेंड, ये शुरुआत और ये तरीका सच को दबाने की वैधानिक साज़िश है. इस साज़िश को समझने की ज़रुरत है.

घपले की खबर छपने के बाद सबसे पहले NSE के एक वरिष्ठ अधिकारी ने हमे फोन करके वेबसाइट से खबर हटाने को कहा. इस अधिकारी ने कहा की अगर हम खबर नही हटाएंगे तो हम पर सुचेता दलाल की तरह मुकदमा दर्ज किया जायेगा. हमने उनसे आग्रह किया कि पहले आप घपले की जाँच कराये और अगर जांच करा ली गयी है तो उसकी रिपोर्ट हमे दें ..हम रिपोर्ट छापेंगे …लेकिन बिना कोई जवाब दिए फोन काट दिया गया और दो दिन बाद मुंबई की एक बड़ी लीगल फर्म ने हमे 10 करोड़ का नोटिस थमा दिया.

इस बीच संसद की वित्तीय सलाहकार समिति ने इस घपले के जांच की मांग उठाई. लेकिन हैरत है की संसदिये समिति के बैठक के दो दिन बाद 10 करोड़ की जगह 100 करोड़ के मुक़दमे का नोटिस इंडिया संवाद को मिला. मानहानि की रकम 10 करोड़ से 100 करोड़ बढ़ाने के पीछे उदेश्य मुक़दमे को आपराधिक मामले में तब्दील करके उसे हाई कोर्ट ले जाने का था.

बहरहाल हम शुक्रिया अदा करते हैं सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता और उनके सह्योगियाँ का जो हमारी तरफ से निशुल्क मुकदमा लड़ना चाहते हैं …पर हमारी एक गुजारिश NSE से है जो देश की जनता के पैसे से चलने वाली संस्था है . वो हमे RTI में ये जानकारी दे कि सुचेता दलाल और इंडिया संवाद पर दो अलग अलग मुक़दमे ठोंकने लिए NSE ने मुंबई के एक बड़ी लीगल कम्पनी को कुल कितने लाख रूपए की रकम दी है

NSE सच दबाने के लिए 10 लाख रूपए कोर्ट कचेहरी पर खर्च कर सकती है लेकिन 10 रूपए के कोरिएर से वो सच का जवाब नही दे सकती है. ये है इस देश में सरकारी और ऑटोनोमस संस्थाओं की पारदर्शिता. ये है हमारे सूचना के अधिकार की हकीकत.

……अपने फेसबुक वाल पर टीवी पत्रकार दीपक शर्मा ।

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