संदर्भ नालंदा गैंगरेप: पुलिस, न्याय, खानापूर्ति और खामोशी!

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“पानी के बुलबुले सी एक लड़की थी,

होंठों पर मुस्कान लिए घर से निकली थी

कि नजर पड़ गई शैतानों की

और डूब गई नाव इंसानियत की,

ओढ ली थी काली चादर आसमान ने

चीखे गूंजती रही मासूम सी जान की

बन गई शिकार वो शैतानों के हवस की ….. अंजली अग्रवाल की यह कविता बलात्कार पीड़ित लड़कियों की एक भयानक दर्द उनकी पीड़ा और वेदना को दर्शाती है।

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क ब्यूरो। बलात्कर हमें तभी चुभता है, जब वह एक क्रूर कर्म की तरह हमारे बीच आता है। एक सामाजिक-राजनैतिक व्यवस्था के भीतर घट रहे अन्याय के तौर पर रेप पर हमारी नज़र नहीं पड़ती।

अगर पड़ती भी है तो इससे हमारा क्या लेना देना। यह सोचकर शांत हो जाते है। देश में कोई रेप की बड़ी घटना होती है तो राष्ट्रीय स्तर पर उसकी आवाज उठती है। हम इसकी निंदा करते हैं।  आक्रोश दिखाते हैं, न्याय दिलाने के लिए कैंडल मार्च निकालकर अगली घटना का इंतजार करते हैं।

सीएम नीतीश कुमार के गृह जिला नालंदा के जिला मुख्यालय बिहारशरीफ में बलात्कार की ऐसी ही एक घटना सामने आई है।

एक छात्रा के साथ पिस्तौल की नोक पर पर पांच लोगों ने एक सुनसान स्थान पर ले जाकर उसके साथ बारी-बारी से बलात्कार किया। इतना ही नहीं एक बलात्कारी ने छात्रा का अश्लील वीडियो भी बनाता रहा।

नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ के खंदकपर स्थित एक एक गैस गोदाम के पास उक्त छात्रा के साथ पिस्तौल दिखाकर बलात्कार की घटना को अंजाम दिया।

गुरूवार की शाम उक्त छात्रा सब्जी लाने नालंदा कॉलेज मोड़ के पास गई हुई थी। इसी बीच एक बाइक सवार दो लड़कों ने उसे रूमाल से उसका मुँह ढक कर बाइक पर बिठाकर ले भागे।

गैस गोदाम के पास एक सुनसान स्थान पर पहले से मौजूद तीन अन्य लोगों ने उसके साथ इस घृणित कुकृत्य को अंजाम दिया।

इससे भी शर्मनाक बलात्कारियों ने उसका अश्लील वीडियो भी बना लिया। इस वारदात के बाद पीड़िता ने महिला थाने में न्याय की गुहार लगाई। लेकिन तीन दिन तक उसने कोई सुध नहीं ली। फिर मामला तूल पकड़ता देख पुलिस ने आनन-फानन में एक आरोपित को धर दबोचा है। अन्य की तलाश चल रही है।

सोचिए!  बलात्कार, क्या ध्वनित करता है? यह शब्द हमारे मानस के भीतर? एक स्त्री के प्रति किसी पुरुष का जबरन शारीरिक अत्याचार या इससे भी ‘कहीं ज्यादा’ कुछ ऐसा, जिस पर देर तक और दूर तक सोचने की जरूरत है। ना यह शब्द नया है ना यह कृत्य नया है। हर बार बस ‘पीड़िता’ नई होती है और पशुता की सीमाओं को लांघने वाला पुरुष नया होता है।

पिछले दिनों लगातार बलात्कार की घटनाए प्रकाश में आ रही है… उन खबरों ने क्या सचमुच हमारे मन-मस्तिष्क को विचलित किया है?

इससे पहले भी नालंदा के चंडी, हरनौत और हिलसा में भी मनचलों ने लड़कियों के साथ छेड़छाड़ के बाद उनका वीडियो बनाकर वायरल कर दिया गया।

आएं दिन कई ऐसी घटनाएँ समाज मेंघटित होती है। बलात्कार के कुछ मामले थाने आते हैं तो कुछ समाज में बदनामी के डर से दबा दिए जाते हैं।

देखा जाएँ तो गांव -जेवार से लेकर देश के विभिन्न इलाकों से  बलात्कार के आंकड़ों की घृणित ‘प्रगति’ बताती है कि हजारों औरतों की अनगिनत अव्यक्त जाने कैसी-कैसी करूण कथाएं हैं, अबाध-अनवरत बहती अश्रुओं की ऐसी-ऐसी गाथाएं हैं कि देख-सुन कर कलेजा फटकर बाहर आ जाए। लेकिन इस मामले में आखिर कब तक पुलिस प्रशासन तमाशाई बनी रहेंगी।

‘बलात्कार’ यह शब्द लिखते हुए एक दर्द रिसता है मन के अंदर। एक चीत्कार उठती है आत्मा की कंदराओं से।

कहां है स्वतंत्र आज की स्त्री? कितनी स्वतंत्र है? मंचों से महिला-स्वतंत्रता का जब ढोल पीटा जाता है तब मासूम बच्चियों से लेकर तमाम पीड़िताओं की आवाज कहां दब जाती है, कौन जानता है? जाने कितने वर्गों और ‘दर्दों’ में बंटी औरतों की जाने कितनी-कितनी पीड़ाएं हैं, क्या वे किसी एक आलेख या किसी एक भाषण की मोहताज है?

देखा जाए तो प्रकृति ने स्त्री को कितना खूबसूरत वरदान दिया है, जन्म देने का, लेकिन बलात्कार पी‍ड़िताओं के लिए यही वरदान अभिशाप बनकर उनकी सारी जिंदगी को डस लेता है।

ना सिर्फ वह स्त्री लांछित की जाती है बल्कि ‘बलात’ इस दुनिया में लाया गया वह नन्हा जीव भी अपमानजनक जीवन जीने को मजबूर हो जाता है। इंसानियत की यह कैसी वीभत्स परीक्षा देनी होती है।

एक स्त्री को ‍कि इंसान के नाम पर पशु बना व्यभिचारी कुछ सजा के बाद समाज में सहज स्वीकृत हो जाता है; और वह बिना ‍किसी गुनाह के सारी उम्र की गुनाहगार बना दी जाती है।

मात्र इसलिए कि उसे भोग्या मानकर चंद दरिंदों ने अपनी हवस का शिकार बनाया है? अगर वह प्रतिकार करने में सक्षम नहीं है तो भी दोष उसका और अगर वह ऐसा करती है तो भी दोष उसका?

पुरुष प्रधान समाज ने सारी व्यवस्था कर रखी है उसके लिए। दामिनी केस में ना जाने कितने बयान ऐसे आए हैं कि उसने बचाव की कोशिश करके गलती की, समर्पण कर देती तो यह हश्र ना होता…।

सवाल यही उठता है कि हर बार बलात्कार के मामलों में एक सख्त कानून बनाने की मांग उठती है। न्याय के लिए वर्षों अदालत का चक्कर लगाने के बाद भी जब बलात्कार पीड़ित को न्याय नहीं मिल पाता है तो प्रश्न भी वही खड़ा है कि आखिर आरोपियों की  सजा कब तक?  क्या यही कानून का न्याय है या फिर सिर्फ़ खानापूर्ति !प्रश्न हमेशा सुलगता है लेकिन उतर हमेशा बर्फ ?

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