शुक्रिया रघु’राज, आपकी जय हो!

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ragurajमुकेश भारतीय

लीक छोड़ कर तीन चले सूरमा, शायर और सपूत। सीएम रघुवर दास सूरमा या शायर हैं या नहीं लेकिन, उन्होंने देर सबेर ही सही स्थानीय नीति को परिभाषित कर यह प्रमाणित कर दिया है कि वे झारखंड के सच्चे सपूत हैं।

सरकार के अंदर या बाहर, उनके विरोधी जनमानस के बीच जो भी कहें, बोलें या बरगलाएं….. आवाम के तीर उल्टा ही घुमेगी।

वर्ष 2000 में झारखंड राज्य का गठन हुआ। बाबूलाल मरांडी प्रथम मुख्यमंत्री बने। उनके डोमिसाईल की नीयत में खोट थी। उनकी राजनीति औऱ रणनीति का नतीजा सामने है। इसके आगे अर्जुन मुंडा, मधु कोड़ा, शिबू सोरेन या फिर उनके सुपुत्र हेमंत सोरेन को भी सरकार चलाने के मौके मिले। परन्तु बात तो सभी करते रहे लेकिन मधुमक्खी के खोथा से सबको डर लगता था। सब शहद चखते रहे और डंक से दूर भागते।

स्थानीय नीति को लेकर कोई सरकार बहुमत का रोना नहीं रो सकता है। अगर रोता है तो वह कायर बहानेबाज से इतर कुछ नहीं है। प्रचुर खनिज संपदा एवं श्रम शक्ति वाले झारखंड प्रदेश में जितनी सरकारें बनी और बिगड़ी, किसी की तह में स्थानीयता का मुद्दा कभी न रहा। सिर्फ मलाई चाटने-चटाने का खेल ही हुआ।

रघुबर सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले की कुछ आलोचना की जा सकती है, मगर विरोध करने वाला या तो मूर्ख है या फिर झारखंड के पक्के विरोधी।

कितनी बिडंबना की बात है कि 16 साल तक झारखंड बिना स्थानीय नीति के ही चलता रहा। जरा कल्पना कीजिए, जिस बेरोजगार की उम्र 25-35 रही, वह आज 35-45 हो गई। वे प्रतिभाशाली होते हुए भी सरकारी नौकरियों और नियोजनों से बंचित रह गए। यानि कि एक पूरा जेनेरेशन गैप। इसकी कीमत कौन चुकाएगा ?

यह बात कुछ वैसा ही है, जैसा बिहार में लालू-राबड़ी राज के 15 साल के दौरान हुए। न कोई वैकेंसी और न ही कोई नौकरी। बाद में नीतिश सरकार आई और सारे बंद दरवाजे खोल दिए। आज वहां शायद कोई ऐसा घर होगा, जहां के बेटा, बेटी या बहू इंटर-मैट्रिक पास हों और वे कहीं नियोजित न हुए होगें।

वेशक फैसला का हौसला होनी चाहिए। जो कल सिर्फ रघुवर दास और उनके कैबिनेट में दिखा। उन्होंने सारे पक्षों को संतुष्ट करने हर संभव प्रयास किया है।

सबाल यह नहीं है कि उनके स्थानीय नीति के पांच सूत्र में क्या जुड़ा और क्या छूटा है। सबसे अहम बात यह है कि उनमें हार्ड डिसीजन लेने का दम है, जो हर किसी में नहीं होता। बिहार में नीतिश जी की शराब बंदी और झारखंड में रघुबर जी की स्थानीय नीति को लेकर उठाए गए कदम यह साफ इंगित करता है कि इनके काम करने में अनावश्यक टोका-टाकी करने से बचनी चाहिए।

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