वो गरिया क्या दिया, कुछ मीडिया वालों की सुलग गई

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सोमनाथ भारती और केजरीवाल ने मीडिया वालों को गरिया क्या दिया, कुछ मीडिया वालों की सुलग गई.. न्यूज नेशन के अजय कुमार और एबीपी न्यूज के विजय विद्रोही लगे अपने कथित सरोकारी तेवर का प्रदर्शन करने… लगे प्रमाण मांगने और ‘आप’ को सबक सिखाने… अरे अजय और विद्रोही जी… सच्चाई आप भी जानते हैं, काहें मुंह खुलवाते हो… वैसे, मुंह खुलवाने की भी क्या जरूरत है… मुझे पता है कि आप सभी छुप छुप के भड़ास  पढ़ते हो और यहां प्रकाशित होने वाली मीडिया की अंधेर नगरी के किस्सों से खूब वाकिफ हो… न्यूज नेशन किसका चैनल है, इसमें किसका पैसा लगा है, इस चैनल के परदे के पीछे कौन है… यह अगर किसी को न पता हो तो कोई बात नहीं… लेकिन हम सब तो जानते हैं… चैनलों के जरिए कैसे ब्लैक को ह्वाइट किया जाता है, यह आपको बताने की जररूत नहीं है…

एजेंडा पत्रकारिता के इस दौर में कोई भी न्यूज चैनल यह नहीं कह सकता कि वह निष्पाप है और किसी एजेंडे के तहत नहीं बल्कि जनता के लिए पत्रकारिता करता है… न्यूज नेशन भी नहीं… जब किसी नेता के पास अकूत संपत्ति और अकूत ब्लैकमनी हो जाया करती है तो वह अपना मीडिया हाउस खोल लेता है, सीधे या छिपे नाम से.. ताकि एक तो वह अपने हिसाब से एजेंडा पत्रकारिता कर अपनी पार्टी व अपने पक्ष में जनमत तैयार कर सके, दूसरे इन चैनलों की आड़ में अपनी विशाल ब्लैक मनी को ह्वाइट कर सके…

अगर नैतिकता है तो आप लोग खुद मांग करिए कि सभी न्यूज चैनलों की आडिटिंग सीएजी यानि कैग के जरिए कराई जाए.. अगर निजी बिजली कंपनियों का आडिट सीएजी के जरिए होने पर मुहर लग चुकी है तो चौथे स्तंभ जैसे संवेदनशील खंभे का आडिट क्यों नहीं होना चाहिए… दलालों, बिल्डरों, चिटफंडियों, ब्लैकमार्केटियरों, भ्रष्ट नेताओं, करप्ट अफसरों, कारपोरेट घरानों के पैसे पर चलने वाले इन न्यूज चैनलों की असलियत जनता जानती है. कहीं अंबानी का पैसा किसी चैनल में लगा है तो कहीं बिड़ला घराना खुद ही मीडिया हाउस चला रहा है… दर्जनों कार्पोरेट घराने मीडिया मालिक बन चुके हैं और बड़े चैनलों अखबारों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संचालित कर रहे हैं.. ऐसे में अगर कोई कार्पोरेट टाइप एंकर या पत्रकार यह चिल्लाए कि मीडिया पर कैसे आरोप लगा दिया तो उसे विशुद्ध मूर्ख व बेवकूफ ही माना जा सकता है, इसके अलावा कुछ नहीं. वैसे भी, लाखों की सेलरी लेकर एंकरिंग करने वालों से यह अपेक्षा मालिक तो करता ही है कि वह जोर-जोर से बोल के, आंखें तरेर तरेर के एंकरिंग करे ताकि लोगों को भ्रम बना रहे कि यह चैनल तो बड़ा दबंग है 

एबीपी न्यूज में एक महिला ने खुलेआम यौन शोषण का आरोप लगाया लेकिन विद्रोही जी के मुंह से विद्रोह के बोल न फूटे… ऐसे सभी पत्रकार, न्यूज चैनल जब एकजुट होकर अपने मालिकों के अघोषित निर्देश पर आम आदमी पार्टी पर टूट पड़ते हैं, आम आदमी पार्टी के लोगों के हगने-मूतने से लेकर छींकने-पादने तक पर खबर, बाइट, न्यूज, पैकेज, शो, डिस्कशन करने लगते हैं तो शक तो होता ही है कि पार्टनर, आखिर आपकी पालिटिक्स क्या है..

विधानसभा चुनाव चार-पांच प्रदेशों में हुए हैं.. लेकिन मीडिया सिर्फ केजरीवाल एंड कंपनी का पोस्टमार्टम कर रहा है… शिवराज सिंह चौहानों, रमन सिंहों, वसुंधारे राजों जैसों को तो इन मीडिया वालों ने ‘एवमस्तु’ कह दिया है… अभी ओम थानवी जी ने लिखा था कि वसुंधरा राजे ने वन माफिया के पक्ष में एक पुराने कानून को यह कहकर पलट दिया कि इस पलटने से आदिवासियों को फायदा होगा.

शंकराचार्य ने पत्रकार को खुलेआम मार दिया, कहीं कुछ नहीं हुआ…. एफआईआर तक नहीं हुआ क्योंकि एक तो हिंदू धर्म के बाबा का मामला था, सो बीजेपी कुछ बोलेगी नहीं. दूसरे, बाबा के गुरु कांग्रेसी दिग्विजय सिंह थे, जिन्होंने पिट चुके पत्रकार को शराबी बता दिया और उसके मालिक को माफी मांगने के लिए सार्वजनिक रूप से चेता दिया तो भला किस मीडिया घराने की हिम्मत कि वह शंकराचार्य से पिटे व पीड़ित पत्रकार को न्याय दिलाए… सो, सब ऐसी चुप्पी साध गए जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो… सब के सब माइक आईडी लेकर केजरीवाल, सिसोदिया, भारती, राय के पीछे दौड़ते भागते रहे क्योंकि मालिकों के एजेंडे के तहत केजरीवाल एंड कंपनी को बदनाम, बेकार, घटिया, दुश्मन बताना साबित करना जो है….

हालिया चुनाव वाले भाजपाई शासित राज्यों में दर्जनों बड़े, खूंखार, गंभीर मसले हैं.. करप्शन से जुड़े, जनता पर अत्याचार से जुड़े, शासन-सिस्टम के पंगु होने से जुड़े.. पर कार्पोरेट मीडिया को केजरीवाल पर इसलिए पिलना है क्योंकि मोदी के पक्ष में खजाना खोलकर बैठे कार्पोरेट घरानों ने मीडिया की दशा-दिशा को तय कर दिया है.. यह सिर्फ संयोग नहीं है कि एक तरफ मीडिया केजरीवाल को पीट-पीट कर बेदम करने में लगा है तो दूसरी तरफ मोदी के पीएम बन जाने वाले सर्वे दिखाकर बीजेपी को फुलाने में लगा है…

मीडिया वालों, अगर तुम लोगों के पास अपनी मौलिक अकल, ओरीजनल आंख होती तो तुम्हें पहले ही पता चल गया होता कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी वालों की अंडर करंट चल रही है.. मौलिक अकल और ओरीजनल आंख न होने के कारण ही मीडिया वाले दिल्ली विधानसभा से संबंधित अपने सर्वे में केजरीवाल एंड कंपनी को इकाई-दहाई यानि 9 सीट या दस सीट के बीच समेट रहे थे..

पर जनता सच में बहुत समझदार होती है. जनता के पास एक सिक्स्थ सेंस होता है. जनता के पास कपार के पीछे एक तीसरी आंख भी होती है. वो सारी नौटंकी और निशाने को समझ रही है. लोकसभा चुनाव में अभी कई महीने बाकी हैं.. देखते रहिए, मीडिया और नेताओं के केजरीवाल विरोधी अभियान का जवाब जनता किस रूप में देती है… कहा सुनी लेनी देनी माफ के साथ आप सभी की जय जय…

……. भड़ास4मीडिया.कॉम के संपादक यशवंत सिंह अपने फेसबुक वाल पर 

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