वैदिक-सईद प्रसंगःएक आत्ममुग्ध चुटकुला !

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 -: कनक तिवारी :-

MEDIA LAKSHMANत्रासदी के विश्व प्रसिद्ध नाटककार विलियम शेक्सपियर ने कुछ हास्य-नाटक भी लिखे. इनमें ‘ट्वेल्थ नाइट‘ अर्थात ‘बारहवीं रात‘ में एक उपकथा का विन्यास भी है. उसका चरित नायक मलवेलियो दिलचस्प किरदार है. वह विद्वान लगता, पीछे पड़ने वाला, वार्तालाप में निपुण और जानकारीयुक्त है. उसका आत्ममुग्ध रहना उसे अंततः हास्यास्पद बना देता है. भारतीय राजनीति भी महंगाई, नेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार, उद्योगपतियों द्वारा लूट, बलात्कार, विदेशी पूंजी निवेश के दुशासननुमा हमले, आतंकवादी, नक्सलवादी हिंसा, लोकतंत्र के खंडित स्वप्न, मीडिया की स्वायत्तता पर नकबजनी जैसे कारणों से त्रासद होती है. मानसून की हल्की बौछार की तरह त्रासदी पर अस्थायी हास्य का छिड़काव करते मनोरंजक चरित्र जनता को मुस्कराने के लिए थोड़ा अवसर दे देते हैं.

नागिन फेम के उत्तरप्रदेश भाजपाध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी, सांसद गिरिराज सिंह द्वारा अव्यक्त राशि की चोरी की रिपोर्ट पर पुलिस द्वारा करोड़ रुपए से ज़्यादा कथित चोरों से बरामदगी, स्वास्थ्य मंत्री द्वारा कंडोम के उपयोग की मनाही, संस्कृति मंत्री द्वारा पब संस्कृति को चुनौती, गृह मंत्री को सचिव तक नियुक्त करने की छूट का नहीं होना, पत्रकार सहराजनीतिज्ञ वेदप्रताप वैदिक का पाकिस्तान जाकर दुर्दांन्त आतंकवादी हाफिज़ सईद से दोस्ताना अंदाज़ में मुलाकात कर टी.वी. चैनलों पर छा जाना-ये सब घटनाएं बार बार शेक्सपियर के चरित्र की अमरता से ज़िन्दगी को सराबोर करती रहती हैं.

किसी मित्र समूह के साथ वैदिक पाकिस्तान गए. बाकी सदस्य लौट आए. वे तीन सप्ताह रुक गए. उनके अनुसार किसी पत्रकार ने सुझाया और वे मान गए कि हाफिज़ सईद से मिल लेना चाहिए. व्यवस्था हुई. तत्काल मुलाकात हुई. दैनिक सक्रिय लेखक होने के बावजूद एकमेवो द्वितीयो नास्ति इस घटना पर उन्होंने नहीं लिखा. लौटकर टी.वी. चैनलों पर मुलाकात का खुलासा हुआ. कांग्रेस सहित विपक्ष, कुछ पत्रकार और रक्षा विशेषज्ञ वैदिक-हाफ़िज मुलाकात को लेकर आक्रामक हैं. खुद को राष्ट्रवादी होने का खिताब देती भाजपा की हालत में है. टी.वी. चैनलों पर वैदिक व्यंग्य, कटाक्ष, मासूमियत, अतीत, प्रेम, आत्मप्रचार, विशेषज्ञ आदि उत्तरोत्तर मुद्राओं में मुखरित हो रहे हैं.

स्थायी आक्रामक मुखमुद्रा के रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने पहले ठर्र तरीके से एक वाक्य में कह दिया कि वैदिक की यात्रा का सरकार से प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या दूरस्थ कुछ भी लेना देना नहीं है. यदि पाकिस्तान का पत्रकार भारत आकर किसी हिन्दू आतंकवादी आरोपी असीमानन्द या साध्वी प्रज्ञा या इंडियन मुजाह्दिीन के किसी सरगना से मिल ले. तब भी क्या भारत के रक्षा मंत्री यही कहेंगे कि पत्रकार किसी से मिले इससे हमारी सरकार का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या दूरस्थ कोई संबंध नहीं है? पत्रकार को निजी प्रसिद्धि को सोपान पर ले जाने के ऐसे दुःसाहसिक एडवेंचर को अभिव्यक्ति की आज़ादी का आसमान कहते हैं?

संविधान में पत्रकार को साधारण नागरिक से ज़्यादा अभिव्यक्ति तथा वाक् स्वातंत्र्य की आज़ादी नहीं है. पत्रकार खुद को चैथा स्तंभ कहते अपनी विशेष श्रेणी बना लेते हैं. वैदिक और समर्थकों का मासूम कथन है कि पत्रकार किसी भी व्यक्ति से कहीं भी मिल सकता है. यह नैसर्गिक स्वतंत्रता अप्रतिबंधित और उच्श्रृंखल नहीं हो सकती. एक कुख्यात आतंकवादी और एक पत्रकार सहराजनीतिक प्राणी की मुलाकात निश्छल हो सकती है, यदि वह देश पर प्रतिकूल असर नहीं डाले.

भारत के 125 करोड़ नागरिकों का घोषित और लगभग सबसे बड़ा प्रचारित शत्रु हाफिज़ सईद है. उसके भी कारण करगिल युद्ध हुआ. हज़ारों भारतीय सैनिकों की बलि चढ़ती रहती है. पाक सैनिकों ने सरहद में घुसकर हमारे सैनिकों के सिर काटे हैं. माताओं बहनों को विधवा और बच्चों को यतीम किया है. देश का अरबों रुपया सुरक्षा में खर्च होता है. वह हर नागरिक की जेब से जाता है. ऐसे व्यक्ति से मिलने को लालायित हो उठने से सवाल उठता है कि पत्रकार की आज़ादी बड़ी है या देश की सुरक्षा?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कई लोकतांत्रिक मर्यादाओं से हटने के लिए आलोचना हो रही है. लेकिन एक काम उन्होंने अच्छा किया. उनके शपथग्रहण समारोह में टी.वी. चैनलों पर बाबा रामदेव और उनके सहयोगी नहीं दिखे. देश को अच्छा लगा. योग गुरु मसखरापन और मासूमियत का घालमेल कर कहते हैं कि संभवतः वैदिक की मेल मुलाकात से हाफिज़ सईद का हृदय परिवर्तन करने की संभावना तलाशी गई हो. यह फतवा भारतीय सैनिकों के साथ क्रूर मज़ाक है. हाफिज़ सईद, अलबगदादी, कू क्लक्स क्लान और तालिबान वगैरह के पास हृदय कहां है?

यह सरकार नक्सलवादियों को चीटी, मच्छर और मक्खियों की तरह मसल देने का आह्वान करती है. उसके सम्पर्क हाफिज़ सईद की देह में हृदय टटोलते हैं. हिंसक नक्सलवादी भारतीय हैं. वे अंगरेज़परस्त वेस्टमिन्स्टर प्रणाली की सरकार को बूर्जुआ और प्रतिगामी कहते हुए हिंसक साम्यवादी क्रांति के पक्षधर हैं. उनसे विचारों का मतभेद और हिंसा का घालमेल भी है. सरहद पार के आतंकवादी भारत की प्रभुसत्ता, लोकतंत्र और उसके अस्तित्व को ही मिटा देना चाहते हैं.

हाफिज़ सईद रक्षा, गृह और विदेश विभाग की चिंता, सरोकार और कर्तव्य के केंद्र में है. अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों की ओर से खूंखार आतंकवादी करार दिया जाकर उसके सिर के लिए करोड़ों रुपए का इनाम है. वह सम्पर्क के लिए एक तरह से प्रतिबंधित है. उससे मिलने से भारत की रक्षा, विदेश और गृह नीति पर असर पड़ता है. पाकिस्तान जाने वाला हर भारतीय हाफिज़ जैसे आतंकवादियों से भी मिले तब देश का क्या होगा.

यदि उससे मिलना इतना सरल है तो गोपाल सुब्रमण्यम और स्वैच्छिक संस्थाओं की जासूसी करती सरकारी एजेन्सियां उससे क्यों नहीं मिल आईं जिससे सुरक्षा व्यवस्था हो सकती. अन्य किसी पत्रकार को भी अब तक यह क्यों नहीं सूझा. उनके लिए पाकिस्तानी पत्रकारों ने इतनी हिकमत क्यों नहीं जुटाई? खुशवंत सिंह और कुलदीप नैयर जैसे बड़े पत्रकार तथा कई प्रतिष्ठित कूटनीतिज्ञ भी तो इतनी ही आसानी से आतंकवादियों से देशहित में मिल जुल सकते थे.

हाफिज़ सईद से आनन फानन में मिलना कैसे हो गया? कथित इंटरव्यू क्या रिकॉर्ड किया गया? वह लेखी में है जिस पर हाफिज़ सईद ने हस्ताक्षर किए हों? वैदिक को लगता होगा कि वे जोखिम उठाऊ पत्रकार की तरह मशहूर हो जाएंगे. इस मुलाकात के प्रचार से तो हाफिज़ सईद का चेहरा उजला होने की कोशिश झलकती है कि वह डेमोक्रैट आदमी है. लाहौर के साधारण से मकान में रहता है. मेहमान के लिए मामूली फाइबर की कुर्सियां हैं. मेहमान को मोटर गाड़ी तक छोड़ने आता है. कार का दरवाज़ा भी खोलता है. ऐसे बेचारे हाफिज़ सईद पर अमेरिका और भारत ने करोड़ों रुपयों का दांव क्यों लगा रखा है जो खूंखार आतंकवादी एक पत्रकार की निगाह में इतना निरीह है.

रमज़ान के कारण हाफिज़ के रोज़े चल रहे हैं. इसलिए वेद प्रताप वैदिक भी इस्लामी परंपरा का सम्मान करते हुए उसके यहां पानी तक नहीं पीते. क्या हाफिज़ सईद इससे भी अभिभूत हुआ होगा? यदि इतने से ही अभिभूत हो गया होगा, तो खूंखार आतंकवादी कैसे हो सकता है?

फिलहाल पाकिस्तान में लोकतंत्र है. सेना सरकार पर भारी है. वहां के सुप्रीम कोर्ट ने ही राष्ट्रपति मुशर्रफ को ठिकाने लगाया. आई.एस.आई. अग्रणी संस्था है. वह लश्करे तैयबा, हाफिज़ सईद, दाउद इब्राहिम, तालिबान, आई.एस.आई.एस. हुर्रियत, इंडियन मुजाहिदीन, 26/11 वगैरह शब्दों का कामनिकाल अर्थ ज़्यादा समझती है. हाफिज़ सईद को मौजूदा प्रधानमंत्री के राजनीतिक कुनबे से वैदिक की प्रचारित निकटता के बावजूद मिलने में कोई परहेज़ नहीं हुआ. नरेन्द्र मोदी इस्लामी आतंकवादियों की हिटलिस्ट में हैं.

गुजरात के 2002 के अल्पसंख्यक कत्लेआम के बाद अमेरिका ने मानव अधिकार प्रवक्ताओं के दबाव के कारण मोदी को आने का विसा नहीं दिया. कट्टर हिन्दुओं के नज़दीकी व्यक्ति को हाफिज़ सईद ने एक दिन की नोटिस पर बाहें खोलकर आने का न्यौता दे दिया.

वेद प्रताप वैदिक के ज्ञान, लेखन, व्यक्तित्व और प्रभाव के प्रशंसकों में हाफिज़ सईद का नाम ऊपर होना चाहिए. उसने कहा भी है कि मेरी और वैदिक की मुलाकात को लेकर भारत में कुछ लोग वितंडावाद खड़ा कर रहे हैं. परस्पर प्रमाणपत्र का यह आयोजन तो सफल रहा.

पत्रकारों और अद्र्ध पत्रकारों को गुरूर होता है कि वे अभिव्यक्ति की आज़ादी के उड़नखटोले पर बैठकर आसमान के तारे तोड़ सकते हैं. प्रतिपरीक्षण करने वाले पिद्दी हैं. 125 करोड़ सवाल पूछे जा सकते हैं कि क्या हर नागरिक को सीमा पार के हर दुश्मन से मिलने की आज़ादी की इतनी ही सुविधाएं और क्या गारंटी है? यही आज़ादी नक्सलवादियों को मिलनी चाहिए कि विदेशी आतंककारियों से मिल जाएं? नक्सलियों के दर्जी, इलाज करने वाले डॉक्टर, कभीकभार मिलने जुलने वाले मानव अधिकार कार्यकर्ता, उनका गैरप्रतिबंधित साहित्य पढ़ने वाले बुद्धिजीवी वगैरह संबंधित कानूनों के तहत पकड़े जाते हैं. ज़मानत तक नहीं होती. हाफिज़ सईद वह पारस पत्थर है जिससे मिलने वाला पत्रकार सोने की तरह मूल्यवान हो जाता है.

वैदिक कहते हैं कि पिछले पचास वर्षों से पाकिस्तान और दक्षिण एशिया को लेकर इतना कुछ लिख पढ़ रहे हैं कि उन्हें लोग स्कॉलर समझते हैं. एक समारोह में उन्होंने यह भी कहा था कि मुक्तिबोध और वैदिक दो ऐसे बड़े साहित्यिक पत्रकार हैं जिनकी पत्रकारिता की ओर समीक्षकों ने संवेदनशील होकर ध्यान नहीं दिया. खुद कहते हैं कि सबसे पहले उन्होंने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही थी. यह भी कि नरसिंह राव के प्रधानमंत्री काल में लोग विनोद में उन्हें उपप्रधानमंत्री कहते थे.

इन्दिरा गांधी उनसे विदेशी मामलों पर सलाह लेती थीं. राजनीतिक अनुकूलता के लिए उनका स्वप्रमाणित लचीला व्यक्तित्व अब अंतर्राष्ट्रीय पहचान मांगने पाकिस्तान से इब्तिदा कर चुका है. हाफिज़ सईद पहला प्रस्तावक होगा. भारत की विदेश नीति के कांच घर पर पत्थर मारना कठिन नहीं है. सीमा पार के आतंकवादी और देश यही तो कर रहे हैं. कुछ वरिष्ठ पत्रकार चंदन दस्यु वीरप्पन और श्रीलंका के प्रभाकरन से पत्रकारों के मिलने को हाफिज़ सईद-वैदिक मिलन का समानान्तर बताते हैं.

जान को जोखिम में डालकर युद्धस्थल की रिपोर्टिंग करना, किसी बड़े साम्प्रदायिक दंगे की विभीषिका के बावजूद मौका-ए-वारदात पर पत्रकार का पहुंचना वगैरह रोमांचकारी अनुभव होते हैं. जतन करने के बाद स्वयमेव एक खूंखार आतंककारी से उसके घर पर मिलने जाना निजी पेशेवर उपलब्धियों का परिच्छेद खोलता होगा. क्या ऐसा करना मुनासिब, देशहित में और नैतिक भी है? यह बताना नहीं भूलना कि मेरे करोड़ों पाठक हैं-ठीक इशारा नहीं करता. हाफिज़ सईद से समय लेकर मिलने जाना उपलब्धि है या हाफिज़ सईद मिलना चाहे और मिलने से पत्रकार इंकार कर दे-यह बड़ी उपलब्धि है?

वैदिक यदि लिखेंगे तो उससे यह झरेगा कि उन्होंने साहस, साफगोई और स्पष्टता से बात की लेकिन वह हाफिज़ सईद से अभिप्रमाणन मिलने पर ही विश्वसनीय माना जाएगा. यदि वह हां कहता है तो कैसा हाफिज़ सईद है जो अपने विरुद्ध अपने घर पर बैठकर अपनी सियासत की आलोचना बर्दाश्त करता रहा? यदि नहीं कहता है तो लाहौर जाने का क्या तुक था?   (साभारः रविवार)

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