वेशर्मी की चादर के अंदर से झांकती संवेदनाएं

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print_mediaराजनामा.कॉम। वेशक आज की पत्रकारिता काफी बनावटी दौर से गुजर रही है। ‘जो दिखता है, वही बिकता है’ की तर्ज पर खबरें गढ़ी जा रही है या फिर कहिए कि इस बाजारु परिवेश में लोग गढ़ने को बाध्य हो गए हैं।

इसे लेकर रांची से टीवी रिपोर्टर सन्नी शरद ने अपने फेसबुक वाल पर एक पोस्ट की है। इस पोस्ट में यह पीड़ा साफ झलकती है कि मीडिया की चकाचौंध मानवीय संवेदनाओं को अंदर से कुचल रही है। भूखे कुत्ते के पेट पर रोटी के टुकड़े अपनी खीसें निपोड़ रही है।

sunnyसन्नी शरद लिखते हैं…  कुछ दिनों पहले की बात है। अपोलो अस्पताल में इलाज कराने प्रदेश के बाहर का एक परिवार आया हुआ था। किसी दबंग घराने के एक व्यक्ति ने उस पर गाड़ी चढ़ा दी थी। मैं परिवार वाले का बाइट और शॉट्स लेने गया था।

पत्रकारिता में भले कुछ साल हो गया हो लेकिन ऐसे माहौल में अभी भी खुद को नार्मल नहीं रख पाता। अपोलो पहुँचने के बाद परिवार वालों से मुलाकात किया। मामला समझा। फिर हिचकते हुए बाइट देने के लिए कहा। परिवार के जेंट्स तो तैयार नहीं हुए लेकिन एक महिला बोली हम बोलेंगे।

जहाँ हमलोग थे वहां लाइट कम थी। मेरा हैंडीकैम माहौल में मेरी तरह एडजस्ट नहीं हो पा रहा था। फिर किसी तरह हिम्मत करके निचे रौशनी में चलने को कहा। निचे पहुंचा बाइट हो गई। तब पता चला ये उस शख्स की बहन है जो ICU में वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत से लड़ रहा था।

तबतक एक और महिला आ चुकी थी। देखकर ही लग रहा था यह उस शख्स की बीबी होगी। बाइट के बाद जब शॉट्स बना रहा था तो उसकी बहन ने मुझे बुलाया और कहा हम रोयेंगे तब फोटो खींचना।

मैं भी किसी शादी या फिर फिल्म की सूटिंग के कैमरामेन की तरह रेडी हो गया। मेरे सर हिलाते ही महिला छाती पिट पिट कर दहाड़ कर रोने लगी। मैं आश्चर्यचकित था। फिर भी कैमरा रोल था। वो लगातार दहाड़ मारकर रोये जा रही थी। कैमरा हटाते ही वो शांत हो गई। मतलब इन्सान इतना संवेदन शून्य हो सकता है। मैं उसी दिन जाना।

दरअसल कैमरे के आगे रोना, धरना प्रदर्शन करना कैमरे के बंद होते ही सब समेट लेना राजनीति कर रहे लोगों के लिए आम सी बात है। लेकिन जब आम लोग की संवेदना भी ऐसी हो जाए तो शायद समाज को सोचना चाहिए कि कैमरे के गलैमरस के आगे इंसानियत क्यूँ दम तोड़ रही है।

मामला आज प्रासांगिक इसलिए है क्यूंकि देश की राजधानी में एक व्यक्ति ने आत्महत्या की धमकी देते देते सचमुच चल बसा। लोग देखते रहे। और वो मुआवजा के फंदे पर झूल गया। कोई कुछ भी नहीं कर सका क्यूंकि सभी इसे एक छोटी खबर से ज्यादा कुछ नहीं समझ रहे थे।

ठीक वैसे ही जैसे रांची के एल्बर्ट एक्का चौक पर कोई खुद पर मिट्टी तेल छिड़कता है। और हम सभी कैमरे की फ़्लैश चमकाते हैं।

ठीक वैसे ही जैसे कोई पटना के डाकबंगला चौराहा पर पेट्रोल छिडकता है। अब किसी और को दोषी ठहराए उससे बेहतर है कि खुद सोंचे कि क्या हमलोग सही थे।

सन्नी शरद के इस पोस्ट पर कईयों ने टिप्पणी की है।

manoj srivastavसीनियर टीवी रिपोर्टर  मनोज श्रीवास्तव दो टूक लिखते हैं….  व्यवहारिक ज्ञान तो यही कहता है कि फ़ायदा उठाना चाहिए और व्यवहारिक लोग करते भी यही हैं। हम भी तुम भी। लेकिन एक बारिक सी चादर होती है बेशर्मी की, जिसके भीतर से संवेदना झाँक रही होती है। वही तकलीफ़ देती है।

वही आपको लोगों से जोड़ने में सहायक भी होती है। चाहे आम आदमी या ख़ास आदमी या फिर रिपोर्टर सब मिलके ही तो ड्रामा रचते हैं। ख़बर बनने के चक्कर बड़ी ख़बर बन जाती है, ख़बर बनाते बनाते आदमी बिगड़ जाता है  (मुकेश भारतीय)

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