‘वेब जर्नलिज्म’ से अखबारों तथा मठाधीश पत्रकारों को खतरा

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ऑनलाइन मीडिया ने देश में वैसे तो डेढ़ दशक पूर्व ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी। लेकिन आज इसका दायरा बढ़ता जा रहा है। हाल के वर्षों में डिजिटल मीडिया प्लेटफार्म का तेजी से विस्तार हुआ है। इसका प्रभाव समाचार पत्रों पर ज्यादा दिखता है। मतलब अखबारों के लिए खतरों की घंटी बनता जा रहा है वेब जर्नलिज्म….

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क के बिहार ब्यूरो चीफ जयप्रकाश नवीन की दो टूक विश्लेषण….

दूसरी तरफ सरकार और मीडिया कर्मियों को लगता है कि वेबसाइट उनके लिए खतरा है।उनके अस्तित्व को खत्म करने पर तूला है। इसलिए लगातार वेबसाइट पर सरकार और मीडिया कर्मियों की भुकुटि टेढ़ी रहती है।

इंटरनेट के सहारे संचालित ऐसी जर्नलिज्म जिसकी पहुँच किसी एक खास पाठक, एक गाँव-कस्बे, एक प्रदेश या देश तक ही नहीं, बल्कि दुनिया तक है। जो डिजिटल तरंगों के माध्यम से प्रसारित होती है।

प्रिंट मीडिया से यह इस रूप में भी भिन्न है, क्योंकि इसके पाठकों की संख्या को परिसीमित नहीं किया जा सकता है। इसकी उपलब्धता सार्वत्रिक है।

इंटरनेट के व्यापक प्रसार की वजह से जर्नलिज्म का भविष्य अब वेब पर आ गया है। जर्नलिज्म का एक नया स्वरूप जिसे ‘भविष्य का मीडिया’ कहा जाता है।

इंटरनेट के माध्यम से वेब-मीडिया सर्वव्यापकता को भी चरितार्थ करती है। जिसमें खबरें दिन के 24 घंटे और हफ़्ते के सातों दिन उपलब्ध रहती है।

वेब-मीडिया अर्थात ऑनलाइन जर्नलिज्म परंपरागत जर्नलिज्म से इन अर्थों में भिन्न है कि उसका संचालन प्रसारण ऑनलाइन होता है। इसमें समाचार और सूचनाएँ या पाठ्य सामग्री निरंतर अपडेट रहती है।

कल के अखबार का बिना इंतजार किए दिन भर की खबरें कहीं भी पढ़ा जा सकता है। इंटरनेट के माध्यम से की जाने वाली वेब-जर्नलिज्म बहुत हद तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मेल खाती है।

लेकिन इसकी व्यापकता और पुरानी खबरों को दोबारा देख सकने की सुविधा के कारण आज इसका अपना एक अलग स्थान है। आज के पत्रकारों का भी मानना है कि वर्तमान और आने वाला समय वेब जर्नलिज्म का ही है।

इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन की एक हालिया सर्वे में  वर्ष 2020 तक देश में डिजिटल मीडिया करीब 35 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया गया है। जबकि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक और रेडियो की ऐड ग्रोथ क्रमशः 8.6 प्रतिशत, 15 और 16.9 तक ही रहने का अनुमान है।

यही कारण है कि वेब जर्नलिज्म के भविष्य को देखते आज हर समाचार पत्र और न्यूज चैनल उन सभी का अपना एक वेब एडिशन काम कर रहा है।

देखा जाए तो वेब जर्नलिज्म अखबारों के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। वेब जर्नलिज्म समाचार माध्यमों के लिए जबरदस्त चुनौती के रूप में आज उभरा है। खास कर मुद्रित माध्यमों के लिए।

हो सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम, मुद्रित माध्यमों को बहुत अधिक नुकसान न पहुंचा पाए। लेकिन यह माध्यम कई मायनों में मुद्रित और इलेक्ट्रॉनिक दोनों माध्यमों के लिए चुनौती साबित हो रहा है।

जिस तरह से वेब जर्नलिज्म में राष्ट्रीय व बहुराष्ट्रीय कंपनियां निवेश कर रही है और वेब जर्नलिज्म जिस तरह अपने शुरुआती दौर में ही अपनी खबरों व साक्षात्कारों आदि को अनन्य और विशिष्ट रुप देना प्रारम्भ कर दिया है, वह परंपरागत माध्यमों के लिए खतरे की घंटी है। इसका उदाहरण तहलका डॉट कॉम की मैच फिक्सिंग और रक्षा सौदों में घूसखोरी की कवरेज को कहा जा सकता है।

अभी तक अनन्य समाचारों के लिए इलेक्ट्रॉनिक माध्यम भी अखबारों आदि पर निर्भर थे। लेकिन अब विशिष्ट खबरों के लिए आम पाठक वर्ग तथा परंपरागत माध्यम वेब जर्नलिज्म के मोहताज हो जाएंगे।

अधिकतर मीडिया विशेषज्ञ मानने लगे है कि इंटरनेट इक्कीसवीं सदी का प्रमुख मीडिया बनने जा रहा है। लेकिन कुछ मीडिया कर्मी इसे सही नहीं मानते। इनका कहना है कि वेबजर्नलिज्म की ओर लोगों का झुकाव ठीक वैसा ही है, जैसा कुछ समय पहले प्रिंट से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरफ लोगों का झुकाव हुआ था।

यह सच है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिंट मीडिया का स्थान लेने में असफल रहा, लेकिन वेब जर्नलिज्म इन दोनों के लिए खतरा बन गई है। क्योंकि इसका स्वरुप इन दोनों से सर्वथा भिन्न है।

आखिर सरकार या मीडियाकर्मियों को क्यों नहीं भाते हैं पोर्टल्स और उनके रिपोर्टर?

इसका मुख्य कारण है कि पोर्टल अखबारों या चैनलों की तरह विज्ञापन पर निर्भर नहीं होते, इसलिए पोर्टलों खबरें निर्भीकता से आ रहे हैं।

पोर्टल को किसी सर्कुलेशन ऑथरिटी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। पोर्टल की खबरें आज की तारीख में ज्यादा सटीक साबित हो रहे हैं।बड़े- बड़े हाउसों के रिपोर्टर आरामतलबी हो गए, जिससे पोर्टल धमाकेदार खबरों पर पकड़ बना लगातार उन्हें चुनौती दे रहें हैं।

देखा जाए तो आज की तारीख में पोर्टल की खबरों पर लोगों का भरोसा ज्यादा बढ़ा है। खबरों की प्रतीक्षा अब खत्म हो चुकी है। सरकारी विज्ञापन पर पलने वाले अखबार और चैनल सरकार की दुकानदारी का साधन बन बैठे हैं। और उनके मालिक-मैनेजर पत्रकार लक्जरी जीवनशैली जी रहे, जबकि उनके रिपोर्टर फटेहाली की जिंदगी जी रहे हैं।

ऐसे में उन्होंने भी अपनी कलम की धार को गिरवी रखते हुए सिस्टम की दुकानदारी का हिस्सा बनना ही बेहतर समझा है।

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