अनेक चर्चाओं-आशंकाओं के बीच यूं बोले ‘द रांची प्रेस क्लब’ के नव निर्वाचित सचिव शंभुनाथ चौधरी

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राजनामा.कॉम। “अजीब मंजर है यहां, हर हाथ में खंजर है यहां। सूखे रेत बताने वाले, दिखाते समंदर वहां। ”  जी हां। द रांची प्रेस क्लब कहिये, रांची प्रेस क्लब कहिये या फिर प्रेस क्लब रांची। इसकी बुनियाद काल से ही विवादास्पद चर्चाओं का ग्रहण थमने का नाम नहीं ले रहा। इसे लेकर नित्य नये आशंकाओं के बीच तरह-तरह की चर्चाएं जारी है।

उन्हीं आशंकओं-चर्चाओं के बीच राजनामा.कॉम के प्रधान संपादक मुकेश भारतीय ने ‘द रांची प्रेस क्लब’ के नव निर्वाचित सचिव शंभुनाथ चौधरी से दो टूक बात की।

इस क्रम में कई नये रोचक तथ्त उभरकर सामने आये। सबाल-जबाब के दौरान श्री चौधरी कभी एक पत्रकार की भूमिका में आये तो कभी राजनेता के रुप में।

चुनाव पूर्व रांची के पत्रकारों की क्या आकांक्षाएं रही और चुनाव बाद भारी मतों से जीतने के बाद उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है, बहुत हद तक स्पष्ट समझा जा सकता है।

प्रस्तुत है श्री चौधरी के साथ हुई स्पष्ट बातचीत के सबालवार प्रमुख अंशः

…..सोशल साइट पर प्रेस क्लब, रांची को लेकर तरह तरह के सबाल उठाये जा रहे हैं। पूर्व की बैठक में कई अहम फैसले लिये जा चुके हैं। फिर भी आगामी 17 जनवरी को नव निर्वाचित पदाधिकारियों और सदस्यों के शपथ ग्रहण का औचित्य क्या है, वह भी निवेदक रांची प्रेस क्लब के आमंत्रण पत्र पर झारखंड सरकार के लोगो के साथ। जबकि प्रेस क्लब का अपना लोगो क्रियेट है?

शंभुनाथ चौधरीः  देखिये आगामी 17 जनवरी को सिर्फ शपथ कार्यक्रम नहीं है। उस दिन प्रेस क्लब भवन को हैंडओवर करने की भी बात है। अभी तक वह भवन झारखंड सरकार की प्रॉपर्टी है और झारखंड सरकार इसका आयोजन कर रही है। दूसरी बात अगर भविष्य में भी कोई कार्यक्रम हम सरकार के सहयोग से करेगें तो सरकार के लोगों का इस्तेमाल हो सकता है। जैसा कि किसी भी नीजि संस्था के कार्यक्रमों के आयोजन में सरकार के लोगो का उपयोग होता है सरकार की सहमति से। इससे गरिमा बढ़ती है।

कोई पत्रकार का आप उदाहरण दे सकते हैं कि ऐसे पत्रकार, जिसका एक्लडीरियेशन कार्ड है, सरकार उसको पत्रकार नहीं बनाती है, पत्रकार उसे किसी संस्था ने बनाया है, उसके मीडिया हाउस ने बनाया है। फिर भी उसके एक्लडरिशन कार्ड पर सरकार का लोगो होता है। उसके लिये पत्रकार लोग लालायित रहते हैं। इसका मतलब थोड़े है कि वो सरकारी पत्रकार हो गया। चूकि सरकार ने उसी तरह से मान्यता दिया है प्रेस क्लब को, इसलिये उसके लोगो का इस्तेमाल किया गया है।

….आखिर जब नव निर्वाचित सदस्यों ने शपथ नहीं लिये थे तो फिर उसने पूर्व में बैठक कर अहम निर्णय कैसे लिये?

शंभुनाथ चौधरीः किसी भी संस्था और किसी भी संविधान में ये होता है कि चुने जाने के बाद उसे नैतिक तौर पर फैसले लेने का अधिकार होता है और वे फैसले अगली बैठक में संपुष्ट करा ली जाती है। जो भी फैसले लिये गये हैं, उसे अगली बैठकों में हम संपुष्ट करा लेगें। इसमें कहीं कोई संवैधानिक संकट नहीं है। उदाहरण के तौर पर आप के सकते हैं कि मोदी जी ने भी जब पीएम पद का शपथ ग्रहण लिया था, तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भी आमंत्रित किया था। खुले में शपथ समारोह करने का फैसला हुआ था। ये फैसले किसने लिये थे? मोदी जी ही ने लिये हुये थे। और कब लिये थे, शपथ ग्रहण करने के पहले लिये हुये थे। शपथ ग्रहण तो बाद में हुआ। और बुलाने का फैसला पहले हो गया।

…… एक ही संस्था के तीन उभरते नाम रांची प्रेस क्लब, द रांची प्रेस क्लब या फिर प्रेस क्लब, रांची को आप किस रुप में लेते हैं?

शंभुनाथ चौधरीः  इसका निराकरण कर लिया जायेगा। बायोलॉज के अनुसार न जाकर इसकी भावना पर जाइये कि इंडिया और भारत एक ही है। वे अलग-अलग नहीं है। संविधान में लिखा हुआ है इंडिया लेकिन लोग भारत वर्ष भी कहते हैं। आप प्रस क्लब की भावना पर जायें। उसकी टेक्निकल पहलु पर न जायें। इसमें मीन-मेख निकालने का कोई मतलब नहीं है। कमिटि में एक प्रस्ताव लाकर रांची प्रेस क्लब और द रांची प्रेस क्लब को एक ही कर दिया जायेगा।

…..मतदान प्रक्रिया के तहत नव निर्वाचित प्रेस क्लब के पदाधिकारी-सदस्यों के द्वारा पद्मश्री बलबीर दत को क्लब का मुख्य संरक्षक बनाये जाने के पीछे क्या सोच है?

शंभुनाथ चौधरीः  बलबीर दत्त जी सबके सम्मानीय हैं और इसलिये उन्हें मुख्य संरक्षक बनाने का फैसला लिया गया। अगर इस फैसले पर किसी को भी आपत्ति होगी तो अगली बैठक में वो बात आ जायेगी। अगर अगली बैठक में यह फैसला संपुष्ट नहीं हुआ तो फैसला बदल जायेगा। क्योंकि प्रक्रिया यही है कि किसी भी बैठक के फैसले की संपुष्टि अगली बैठक में कर ली जाये। और जब बायोलॉज या संविधान से जुड़ा मामला हो तो उसका फैसला आम सभा में किये जाते हैं।

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