विकल्प है, लेकिन अंधे हैं आप !

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लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों जनता ही होती है। इसलिए जो सवाल पूछते हैं कि विकल्प क्या है, वो या तो मूर्ख हैं या धूर्त हैं………….”

सिने-टीवी लेखकः धनंजय कुमार की फेसबुक पर दो टूक….

राजनामा.कॉम। लोकतंत्र में विकल्प ही विकल्प होते हैं। क्योंकि चुनाव लड़ने का अधिकार देश के हर नागरिक को है। विशेषकर भारत तो असीमित विकल्प हैं। यहाँ तो अनेकानेक पार्टियां हैं।

कांग्रेस नहीं पसंद है, बीजेपी चुन लो, बीजेपी नहीं पसंद है, समाजवादी पार्टी को चुन लो, कम्युनिस्ट को चुन लो, कोई पार्टी ठीक न लग रही हो, तो बिना पार्टी वाले उम्मीदवार को चुन लो, वो भी पसंद ना हो तो नोटा पर बटन दबा दो। फिर भी अगर आप बोलते हो कि विकल्प क्या है ?

भारतीय लोकतंत्र में विकल्प असीमित है, लेकिन विडम्बना ये है कि हम सामंतवाद से बाहर नहीं आ पाए, उसपर से हम बाज़ार वाद में समा गए। यानी जनता ने खुद ही विकल्प को देखना और परखना बंद कर दिया है।

ज़मींदारों और उनके परिवार के वारिसों को आप नेता मान लेते हैं, नेता के बेटे-बेटी को आप नेता मान लेते हैं, जो चुनाव में प्रचार में ज्यादा से ज़्यादा पैसे खर्च करता है, महंगी महंगी रैलियाँ करता है।

उसे आप नेता मान लेते हैं, जो जाति और धर्म की बात करता है, उसे नेता मान लेते हैं, जो सरेआम क़ानून और संविधान की अवहेलना कर आपराधिक और अनैतिक पराक्रम दिखाता है उसे आप नेता मान लेते हो। फिर ये हताशा क्यों है ? इतनी तरह के नेता तो हैं आपके पास ? और क्या चाहिए ?

नेता चुनते समय आप इसे गुण मानते हो और चुनाव के बाद कहते हो, रोड खराब है, पुलिस बदमाशी कर रही है, सरकारी कर्मचारी बिना रिश्वत काम नहीं करते, कलेक्टर आपकी बात नहीं सुनता। मंत्री मिलता नहीं आपको ?

शिक्षा और स्वास्थ्य से लेकर न्यायालय तक में गरीबों की सुनवाई नहीं है । भाई कैसे हो सुनवाई ? क्या आपने वोट देते समय इस तरह का वादा लिया था नेताओं से ?

फिर आप कहते हैं एक अकेले की बात कौन सुनता है ? भाई आप अकेले कैसे हो ? आपने यादव होने के नाते यादव को नेता चुना, आपने मुस्लिम होने के नाते नेता चुना, आपने राष्ट्रवादी होने के नाम पर नेता चुना..

फिर आप अकेले कैसे हैं ? आप यादव है तो यादव नेता को तो आपकी बात सुनना चाहिए। अप मुस्लिम हैं तो मुस्लिम नेता होने के नाते तो उसको आपकी बात सुननी चाहिये। आप राष्ट्रवादी हैं तो राष्ट्रवादी नेता को तो आपकी बात सुनना चाहिए।

फिर भी आपकी बात नहीं सुनते, ऐसा आपका कहना है। तो क्यों नहीं सुनते इस पर क्या कभी सोचा ? क्यों वो आपके बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए नहीं सुनते, क्यों वो अच्छे अस्पताल खोलने की बात नहीं करते ? क्यों वो आपको थानेदारों की लात खाने से नहीं बचाते ?

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