वाह मुलायम! बिना धृतराष्ट्र बने बेटे को बना दिया सुल्तान

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-मुकेश भारतीय-

लोग समझ रहे हैं कि चुनाव आयोग ने अखिलेश को सपा और साइकिल दी है। लेकिन इसका दूसरा पहलु यह है कि एक बाप ने अपनी पूरी राजनीतिक विरासत चहेते बेटे के हवाले कर दी। क्योंकि मुलायम जिस तरह से परिवार के अनेकानेक महत्वाकांक्षी लोगों को साथ लेकर पार्टी चला रहे थे, उनके न रहने के बाद अखिलेश के लिए राह आसान न था।

हालांकि परिवार के तथाकथित ‘अनेकानेक’ महत्वाकांक्षी लोग मुलायम सिंह के ही बनाए हुए थे। इन लोगों ने यह मुगालता पाल लिया था कि पार्टी को बनाने और बढ़ाने में उनका योगदान अखिलेश से ज़्यादा है, इसलिए उनका हक भी अखिलेश से ज़्यादा है।

मुलायम सिंह समझदार निकले। उन्होंने एक ही धोबीपाट में अपने परिवार और पार्टी के सारे महत्वाकांक्षी लोगों को ऐसे चित कर दिया कि वे अखिलेश के सामने कभी उठ न सके।

सबसे बाड़ी बात कि मुलायम धृतराष्ट्र बनने से भी बच गए और बेटे को एकछत्र राज और पार्टी भी सौप दी। वे तो अपनी पत्नी, भाई, दोस्त सबसे यही कहेंगे कि देखो, तुम लोगों के लिए मैंने बेटे को भी छोड़ दिया। लेकिन इसके साथ अपनी चाल की कामयाबी पर मन ही मन मुस्कुरा भी रहे होंगे- “मूर्खों, तुम लोगों को मैंने ही बनाया और मैंने ही मिटा दिया।

मुलायम सिंह का क्या है?  वे सपा के मार्गदर्शक रहेंगे ही। इसके संकेत अखिलिश ने पहले ही दे डाले हैं। पार्टी से बाहर हो गए वे लोग, जिन्हें अखिलेश का नेतृ्त्व स्वीकार करने में परेशानी थी। जो उनकी राह में कांटे बिछाना चाहते थे। उनसे सत्ता झपटना चाहते थे। मुलायम सिंह के समधी लालू यादव जी ने तो पहले ही कह दिया था कि विरासत पर हक तो बेटे-बेटी का ही होता है। जो इतनी छोटी-सी बात नहीं समझ पाए, उनके पास बैठकर छाती पीटेने के सिवाय कोई चारा नहीं है।

वेशक मुलायम ने न सिर्फ़ अपने बेटे को अपनी सपा और साइकिल सौंप दी है, बल्कि उसका रास्ता भी निष्कंटक कर डाला है। अब अखिलेश एक साफ़-सुथरे नेता हैं। विकास-पुरुष हैं। समाजवादी सरकार से जो ग़लतियां हुईं, उनकी ज़िम्मेदारियों से अब वे मुक्त हो गए। उन ग़लतियों का ठीकरा अन्य लोगों के सिर पर फोड़ दिया गया है। वे सपाई खलनायक की छवि से बाहर हो नायक बन कर उभरे हैं। यह नायक अब नए विश्वास, नई ताकत और नए वोट बैंक के साथ चुनाव में जाएगा। जोकि विरोधियों के लिये एक बड़ी चुनौती होगी।

दीगर बात यह कि मुलायम के इस मास्टर-स्ट्रोक और अखिलेश के इस मेक ओवर से सबसे ज़्यादा मुश्किल भाजपा को होने वाली है, जो यूपी फ़तह करने का सपना देख रही है। यद्यपि बदली हुई परिस्थितियों का सामना करने के लिए बीजेपी के आला नेता भी कुछ न कुछ योजना ज़रूर बना रहे होंगे।  लेकिन मेरा ख्याल से उसकी एक बड़ी ग़लती यह रही है कि वह अखिलेश के मुक़ाबले कोई चेहरा तैयार नहीं कर पाई।

हर राज्य की राजनीतिक परिस्थितियां अलग होती हैं। यूपी और बिहार वैसे भी अन्य राज्यों से अलग है। इन राज्यों के ताले आप महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड की चाभी से नहीं खोल सकते। दूसरी बात कि इन राज्यो में जनता के सामने पहले से ऐसे भरोसेमंद चेहरे हैं, जिन्हें बस समीकरणों का सहारा चाहिए। बिहार में नीतीश कुमार थे। यूपी में अखिलेश यादव हैं।

अब चुनाव की तारीखों का एलान हो चुका है।  इसलिए बीजेपी दिल्ली जैसी ग़लती करने की स्थिति में भी नहीं है, जहां उसने चुनाव से 20 दिन पहले हर्षवर्द्धन जैसे अच्छे नेता को ध्वस्त करके किरण बेदी को खड़ा कर दिया था और अपना सर्वस्त्र गंवा बैठे। हालांकि भाजपा गोवा की तरह संकेत दे सकती है कि केंद्र से भी कोई नेता यूपी का मुख्यमंत्री बन सकता है और इसके तहत राजनाथ सिंह का नाम प्रोजेक्ट करे।

राजनाथ सिंह यूपी के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार उन्होंने ही बनाया। इन दिनों केंद्र में गृह मंत्री हैं। नक्सलवाद और माओवाद पर लगाम लगाने में काफी हद तक सफल रहे हैं। जब वे यूपी के मुख्यमंत्री थे, तब से अब तक उनके अनुभवों का खजाना काफी समृद्ध हो चुका है और राष्ट्रीय फलक पर निश्चित तौर पर वे अखिलेश और मायावती से बेहतर नेता के तौर पर स्थापित हो चुके हैं।

बहरहाल, बीजेपी क्या करेगी, यह उसे तय करना है।  लेकिन मुलायम ने न सिर्फ़ अखिलेश को झाड़-पोंछकर चमका दिया है, बल्कि समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और आरएलडी के गठबंधन की स्क्रिप्ट भी तैयार कर दी है। इसमें जेडीयू और आरजेडी जैसी बिहारी पार्टियां भी बिहार से सटे इलाकों में असर डालने के लिए शामिल की जा सकती हैं। यह गठबंधन भाजपा के लिए घातक हो सकता है। ठीक बिहार की तरह, जहां जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस ने मिलकर मोदी लहर पर कहर बरपा चस्पा डाला था।

मेरी राय में, नोटबंदी अगर सफल हुई होती तो भाजपा के सामने कोई गठबंधन नहीं टिकता। लेकिन इसकी विफलता या अल्प सफलता के बाद पार्टी को इसका कोई बहुत बड़ा फायदा होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता। अपना मुख्यमंत्री चुनते समय लोग मोदी के नाम पर वोट डालेंगे, इसकी संभावना भी कम ही है। मुस्लिम-यादव-जाट समीकरण प्रभावशाली प्रतीत हो रहा है। सत्ता की रेस में आगे दीखने पर अन्य वोट भी इसमें जुड़ सकते हैं।

जहां तक मायावती का सवाल है, वह इस चुनाव में तीसरे नंबर की लड़ाई लड़ रही हैं। जातियों और संप्रदायों को ललचाने की उनकी कोशिश कामयाब होती नहीं दीख रही। मुस्लिम उन्हें वोट देंगे नहीं। अगर दलितों को भी लग गया कि बहन जी कमज़ोर हो गई हैं तो अखिलेश को हराने के लिए उनका एक हिस्सा बीजेपी की तरफ़ जा सकता है।

कुल मिलाकर  मुलायम न सिर्फ़ अखिलेश के ही बाप नहीं, अपितु बड़े-बड़े सियासी सूरमाओं के बाप साबित हुए हैं। लेकिन वोटिंग और चुनावी नतीजे आने से पहले इसे सिर्फ़ एक तात्कालिक और त्वरित विश्लेषण के तौर पर ही समझना उचित होगा।

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