वार्डन की मेहरबानी, बेटी की जगह 3 साल तक पढ़ाता रहा सेवानिवृत बाप

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st eduकस्तूरबा गांधी आबासीय बालिका विद्यालय ओरमांझी में हर काम वार्डन के ठेगें पर होता है। उस पर  न तो कभी कोई लगाम विद्यालय भवन के एक कमरे में बैठने वाले प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी की रही है और न ही झारखंड शिक्षा परियोजना से जुड़े किसी कर्ता-धर्ता की।

यहां मनमानी का आलम यह है कि पहले बेटी ने अंशकालीन शिक्षक के रुप में कुछ हफ्तों तक पढ़ाया और फिर बाद में उसकी जगह उसका सेवानृवित बाप पढ़ाने लगा। वह करीब तीन साल तक पढ़ाता रहा। और जैसे ही अंशकालिक शिक्षकों का मानदेय बढ़ा और मामला तूल पकड़ा तो फिर बेटी आकर पढ़ाने ली।

प्राप्त जानकारी के अनुसार करीब तीन साल पहले बड़गांई निवासी नूर अंबर नामक युवती ने विद्यालय में अंशकालीन शिक्षिका के रुप में योगदान दिया था। उस समय सभी शिक्षकों की तरह उसे सौ रुपये प्रति दिन के हिसाब से भुगतान होता था। इतने कम पैसे में बड़गांई रांची से रोज आकर उसके लिए पढ़ाना संभव न था। इसलिए उसने एक युगत भिड़ा ली।  वार्डन की सांठगांठ से  चकला गांव निवासी उसका बाप अमाल अंसारी पढ़ाने लगा और करीब तीन साल तक पढ़ाता रहा।

इस बात का खुलासा तब हुआ, जब अंशकालीन शिक्षकों का पारीश्रमिक दुगुना हुआ और विद्यालय के एक अन्य स्थानीय एवं योग्य अंशकालिक शिक्षिका ने इस अनियमियता का विरोध किया। इस विरोध के खिलाफ विद्यालय के क्रमशः रहे तीनों वार्डन खड़े हो गए और न्याय की गुहार लगाने वाली शिक्षिका को ही चलता कर दिया।

ऐसी बात नहीं है कि बेटी के स्थान पर बाप द्वारा तीन साल तक विद्यालय में पढ़ाते रहने की जानकारी और किसी को नहीं थी। मीडिया, राजनीति से जुड़े लोगों के आलावे सारे गांव-जेवार के लोग यही जानते थे कि कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय बालिका विद्यालय में सेवानिवृत सरकारी शिक्षक अमाल अंसारी ही पढ़ा रहा है।

लेकिन आज जब यह बात खुलकर सामने  गई है तो सबने चुप्पी साध रखी है। शायद समय-समय पर विद्यालय से मिलने वाली चाय की चाशनी उन लोगों के मुंह को जकड़ रखा है।

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