साप्ता.चौथी दुनिया के निशाने पर इंडियन एक्सप्रेस के संपादक

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भारत में पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का तमगा हासिल है. लेकिन कुछ संस्थानों ने इसे अपने हितों को साधने के लिए माध्यम के तौर पर इस्तेमाल किया और चौथे स्तंभ की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई. ऐसे वाक़ए भी हैं, जब पत्रकारिता के महानायक बनते स़ख्श कई बार महाअपराधी नायक की श्रेणी में बदल जाते हैं और उनका पूरा व्यक्तित्व भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़े बेशर्म इन्सान के रूप में तब्दील हो जाता है. यह घटनाएं जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो जैसे जुमले को ग़लत साबित करती हैं और भारतीय पत्रकारिता के चेहरे पर स्याह निशान छो़ड जाती हैं

jonsmये कहानी भारतीय पत्रकारिता के उस काले चेहरे की कहानी है, जिस चेहरे को स्वर्गीय रामनाथ गोयनका शायद स्वर्ग में बैठकर कभी प़ढना नहीं चाहेंगे या कभी जानना नहीं चाहेंगे. देश के एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे कहा कि अगर आज श्री रामनाथ गोयनका ज़िंदा होते, तो या तो अपने संपादक को बर्ख़ास्त कर देते और अगर नहीं कर पाते तो बंबई के एक्सप्रेस टावर के पेंट हाउस से नीचे छलांग लगाकर अपनी जान दे देते. स्वर्गीय श्री रामनाथ गोयनका ने जिस आदर्श को छुआ था, वो आदर्श प्रो-पीपुल जर्नलिज़्म का अद्भुत उदाहरण था. रामनाथ गोयनका ने अपने अख़बार के ज़रिये भारतीय पत्रकारिता की ऐसी ऊंचाइयां छुई थीं, जिनका लोग हमेशा उदाहरण देते थे. उन्होंने कभी हथियारों के दलालों, पूंजीपतियों, सत्ताधीशों के पक्ष की पत्रकारिता नहीं होने दी. इसीलिए उनके समय के संपादकों के नाम भारतीय पत्रकारिता के इतिहास के जगमगाते हुए पन्ने हैं.

लेकिन आज क्या हो रहा है. विवेक गोयनका रामनाथ गोयनका के उत्तराधिकारी हैं. विवेक गोयनका अपने अंग्रेज़ी अख़बार में पत्रकारिता के आदर्शों की धज्जियां उ़डते हुए देखकर अगर चुप हैं, तो इसका मतलब है कि विवेक गोयनका में रामनाथ गोयनका का अंशमात्र भी, सम्मान के लिए ल़डने की ताकत का अंश नहीं बचा है. ये पत्रकारिता जर्नलिज़्म ऑफ़ करेज नहीं है, जर्नलिज़्म ऑफ़ करप्शन है, जर्नलिज़्म ऑफ़ दलाली है, जर्नलिज़्म ऑफ़ टीनेशनलिज़्म है.

ये स़ख्त शब्द हमें इसलिए कहने प़ड रहे हैं, क्योंकि एक समय पत्रकारिता के महानायक के पद पर बैठा हुआ श़ख्स अगर अपराध-नायक बनने की तरफ़ ब़ढने लगे और सत्ता में बैठे अपने दोस्तों के ज़रिये पैसे कमाने लगे और अख़बार का इस्तेमाल देशद्रोही ताक़तों को मदद पहुंचाने के लिए करने लगे, तो लिखना ज़रूरी हो जाता है. ये कहानी भारतीय पत्रकारिता के दूसरे अख़बारों के संकोच की कहानी भी है, कम हिम्मत की कहानी भी है और हमारे आज के राजनीतिक दौर में किस तरह देशप्रेम, देशभक्ति एक तरफ़ रख दी जाती है और किस तरह देशद्रोह को आदर्श मान लिया जाता है, उसकी कहानी भी है.

ये कहानी शुरू होती है, जब जनरल वी के सिंह भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष बने. जब जनरल वी के सिंह भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष बने थे, उस समय भारतीय सेना में ख़रीदे जाने वाले हर हथियार के पीछे हथियारों के सौदागरों की भूमिका थी. हथियारों से संबंधित लॉबी साउथ ब्लॉक में टहलती रहती थी. देश के कुछ ब़डे नाम देश की सेना को सप्लाई होने वाले हर हथियार के ऊपर असर डालते थे. उनके पास रक्षा मंत्रालय से और भारत की सेना से जानकारियां पहुंच जाती थीं कि रक्षा बजट में हथियारों की ख़रीद का कितना प्रतिशत हिस्सा है और उसके हिसाब से वो योजना बनाने लगते थे. वो जानते थे कि युद्घ नहीं होने वाला है, इसलिए भारत की सेना को उन्होंने घटिया हथियारों की आपूर्ति की. भारतीय सेना हथियारों के दलालों के जाल में इस कदर जक़डी हुई थी कि चाहे वो टाट्रा ट्रक हों, चाहे वो राइफलें हों, चाहे वो तोपें हों या चाहे गोला-बारूद हो, हर जगह सब-स्टैंडर्ड सामान भारत की सेना में आ रहा था. जनरल वी के सिंह ने इस स्थिति के ख़िलाफ़ कमर कसी और उन्होंने ऐसे नियम बनाने शुरू किए, जिन नियमों की वजह से हथियारों के दलालों को अपना काम करना मुश्किल लगने लगा. जनरल वी के सिंह द्वारा उठाए गए क़दमों ने उन लोगों को असहज कर दिया, जो लोग भारत की सेना को बेचे जाने वाले हथियारों से फ़ायदा उठाते थे.

ये रिपोर्ट, जो हम आपके सामने रख रहे हैं, ये रिपोर्ट न तो जनरल वी के सिंह ने हमें बताई और न ये रिपोर्ट सेना के देशभक्त अफसरों द्वारा लीक की गई. ये रिपोर्ट हमारी छानबीन का नतीजा है, जो हम भारत के पाठकों के सामने इस आशा से रख रहे हैं कि अगर भारत की जनता इस बात को जान जाएगी, तो कम से कम हम अपने उस कर्तव्य का पालन कर पाएंगे, जो एक पत्रकार को करना चाहिए. जनरल वी के सिंह से पहले जितने जनरल हुए, उन्होंने सेना के जवानों में या भारत की पूरी सेना में हौसला भरने का काम पूरे तौर पर नहीं किया. 

टीएसडी की गतिविधियों से भारत में घुसपैठ कम हुई. जब टीएसडी की गतिविधियों की वजह से पाकिस्तान और चीन परेशान होने लगे, तो उन्होंने भारत में अपने एजेंटों से टीएसडी के बारे में जानकारी हासिल की. जनरल वीके सिंह ने टीएसडी को इस अंदाज में बनाया था कि टीएसडी के बारे में कोई जानकारी पाकिस्तान और चीन को नहीं मिल पा रही थी. टीएसडी है ये तो पता चल रहा था, लेकिन टीएसडी के कार्य करने की शैली, टीएसडी में कौन अफसर और जवान हैं, उनके टारगेट्स क्या-क्या क्या हैं. उनको ऑर्डर कौन देता है. उनके पास हथियार क्या-क्या हैं. इसको लेकर के पाकिस्तान और चीन में बहुत बडा भ्रम था. चूंकि उन्हें कोई जानकरी नहीं मिल पा रही थी, इसलिए उनके स्थानीय एजेंट उन दोनों सरकारों को डरा रहे थे. उन्होंने टीएसडी को एक हौवा बनाकर अपनी सरकारों को इसलिए बताया क्योंकि उनके पास सचमुच कोई ख़बर थी ही नहीं. पर उन्हें कोई न कोई ख़बर तो भेजनी ही थी.

टीएसडी पाकिस्तान और चीन के लिए एक डरावना हौवा बन गया और दोनों सरकारों को और दोनों सेनाओं को जब कुछ पता नहीं चला, तो इस बीच हथियारों के दलालों ने जनरल विजय कुमार सिंह की तस्वीर बर्बाद करने की सारी कोशिशें शुरू कर दीं. इन कोशिशों में जनरल वीके सिंह की उम्र का विवाद देश में उछाला गया. जनरल वीके सिंह की उम्र के विवाद की भी यह विडंबना है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय जनरल वीके सिंह के हाईस्कूल के सर्टीफिकेट में लिखी हुई उम्र प्रामाणिक नहीं मानता, लेकिन रेप केस में सबसे ज़्यादा रोल निभाने वाले एक अपराधी के बालिग या नाबालिग होने के विषय में हाईस्कूल के जन्म प्रमाणपत्र को सही मानता है. शायद भारत के सुप्रीम कोर्ट को ही ऐसा अंतर्विरोध शोभा देता है. जनता में इस फैसले की थू-थू भी हुई, पर हथियारों के सौदागरों ने, जिनमें सेना के कुछ ब़डे अफसर भी शामिल थे,  कुछ राजनीतिक नेताओं का साथ लेकर एक अख़बार के ज़रिये इस मुद्दे पर जनरल वीके सिंह के ख़िलाफ़ अभियान चला दिया.

इस बीच जनरल वीके सिंह रिटायर हो गए, लेकिन जनरल वीके सिंह ने जो क़दम उठाए थे, उन क़दमों से सेना के भीतर हथियारों के दलालों का काम, जहां एक तरफ़ मुश्किल हुआ, वहीं अभी भी टीएसडी को लेकर पाकिस्तान और चीन के मन में भयानक डर बैठा हुआ था. वे किसी भी तरह से टीएसडी की जानकारी चाहते थे और टीएसडी को डिफंक्ट करना चाहते थे. रामनाथ गोयनका के इस अख़बार ने इस काम में हथियारों के दलालों की और पाकिस्तान तथा चीन की ज़बरदस्त मदद की. इस अखबार ने इस तरह की ख़बर अपने पहले पन्ने पर, पहली हेडिंग केसाथ छापी कि जनरल वीके सिंह इस देश में लोकतंत्र को ख़त्म कर सेना का शासन स्थापित करना चाहते थे. और जिसके लिए उन्होंने सेना की दो टुक़िडयों को दिल्ली की तरफ़ कूच करने का आदेश दे दिया था.

अफ़सोस की बात तो यह है कि यह रिपोर्ट सेना के भ्रष्टाचार को लेकर नहीं है. इस अख़बार ने यह रिपोर्ट सेना के अंदरूनी घटनाओं को लेकर नहीं छापी है, यह व्यक्तित्वों के टकराव की कहानी नहीं है. यह रिपोर्ट भारतीय सेना के जांबाज़ अफसरों और सिपाहियों की भारत के रक्षाहितों के लिए की जाने वाली कार्वाइयों का खुलासा है. यह रिपोर्ट भारतीय सेना के अफसरों व जवानों को मारने के षडयंत्र का हिस्सा है. इसलिए श्री रामनाथ गोयनका के वारिस विवेक गोयनका के अख़बार की इस रिपोर्ट का हम जमकर विरोध करते हैं और इसे भारतीय पत्रकारिता की सबसे काली रिपोर्ट के रूप में देखते हैं. पत्रकारिता का महानायक बनता हुए एक स़ख्श कैसे महाअपराधी नायक की श्रेणी में बदल जाता है और कैसे उसका पूरा व्यक्तित्व भ्रष्टाचार के समर्थन में खड़े बेशर्म इन्सान के रूप में तब्दील हो जाता है, इसे देखना हो तो रामनाथ गोयनका के वारिस विवेक गोयनका के नेतृत्व में चलने वाले अंग्रेज़ी अख़बार को पढ़कर देखा जा सकता है.

यह अख़बार भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ रिपोर्ट नहीं करता, बल्कि भ्रष्टाचारियों के समर्थन में रिपोर्ट करता है, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ने वाले को यह अख़बार कन्फ्यूज्ड आदमी बताता है और भ्रष्टाचार करने वाले लोगों को नायक बनाता है, इस अख़बार में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ रिपोर्ट तलाशनी हो, तो आपको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी, लेकिन जो लोग भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं या आवाज़ उठा रहे हैं, उनके ख़िलाफ़ यह अख़बार पहलवानी करता दिखाई दे रहा है. यह भारत की पत्रकारिता का सबसे गंदा चेहरा है.

साभारः साप्ताहिक चौथी दुनिया

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