वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण बिहारी मिश्र ने अपनी पोस्ट के आलोचको को यूं दिया करारा जवाब

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रांची (राज़नामा संवाददाता)। वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण बिहारी मिश्र ने ईटीवी (न्यूज18) के सीनियर रिपोर्टर मनोज कुमार से संबंधित अपने फेसबुक वाल किये एक पोस्ट के आलोचकों करारा जवाब दिया है।

उन्होंने अपने फेसबुक वाल पर पुराने पोस्ट को रिफ्रेश करते हुये “मेरे आज के पूर्व पोस्ट पर, जिन्होंने हमसे सवाल पूछे, ये है उनका जवाब” शीर्षक से लिखा है कि………

वरिष्ठ लेखक-पत्रकार कृष्ण बिहारी मिश्र अपने फेसबुक वाल पर……

भाई,
हम स्वागत करते हैं, उन सभी का जो इस पोस्ट पर अपनी बाते रखे हैं, सभी का स्वागत, सभी को प्रणाम। किसी से हमें कष्ट नहीं। वो इसलिये कि कभी न कभी, किसी न किसी रुप में हमने एक साथ काम किया हैं, इसलिए प्रणाम, पर इसका मतलब ये भी नहीं कि हम
एक दूसरे की गलतियों को नजरदांज कर दें।
हमारा अपना स्वभाव है, आपका अपना स्वभाव है, और इस अवस्था में न तो आप अपना स्वभाव बदल सकते है और न हम अपना।
और अब, जिन्होंने इस दौरान हमें गालियां दी, उन्हें भी प्रणाम और जिन्होंने हमारे पोस्ट को लाइक किया, उन्हें भी प्रणाम। हमारे साथ ऐसा नहीं है कि आपने हमें गालियां दे दी तो मैं आपसे बहुत नाराज हो गया और ज्यादा प्रशंसा कर दी, तो मैं बहुत प्रसन्न हो गया, क्योंकि मेरा मानना है कि मन एक ऐसा दर्पण है, जो स्वयं बता देता है कि हम कहां गलत है और कहां सही।
कमाल की बात है, जिस चीज पर आपका दावा नहीं, उस पर आप दावा करते है और बड़े ही चतुरता से अपनी गलती को सहीं ठहराने में लग जाते है, ये आप कर सकते है, मैं नहीं।
मैंने जैसे ही यह पोस्ट किया, हमारे पास इन दो लोगों के फ्रेंड रेक्वेस्ट आये Om Prakash Singh और Sanjay Sinha के। मैं समझ गया कि ये फ्रेंड रेक्वेस्ट क्यों आये? क्योंकि इनके कमेंट्स बताने के लिए काफी है, कि इनकी सोच क्या थी? और किन उद्देश्यों को लेकर इन्होंने फ्रेंड रेक्वेस्ट किया था। Rajesh Singh अपने स्वभावानुसार आक्रामक दीखे। Naushad Alam को मैंने पहली बार आक्रामक होते हुए देखा। Sarfaraj Ahmad Saif ये नमूना कहां से आ गया, मैं जानता ही नहीं, ये तो मेरी बातों को ही फर्जी बता दिया और रही बात Manoj Kumar की तो उसका गुस्सा जायज है, और गुस्से में जो उसने आपत्तिजनक शब्दों का मेरे उपर प्रयोग किया, उसको लेकर मैं क्रोधित भी नहीं हूं, और न आनेवाले समय में कभी क्रोधित हुंगा, लेकिन Manoj Kumar की आड़ में जिन्होंने बहुत कुछ लिखा है या लिख रहे है, उन्हें मैं मना भी नहीं करुंगा। एक बात और जो सवाल Manoj Kumar ने हमने किये है, उसका उत्तर….
1. आपने लिखा है कि यह सफाई नहीं बल्कि संवाद है और मेरे नाम के आगे स्वर्गीय शब्द का प्रयोग भी किया, मनोज जी मृत व्यक्ति के साथ संवाद नहीं किया जाता। इसलिए आप यहां गलत है।
2. आपने कहा कि रेलवे से संबंधित एक समाचार थी, जिसे चलाने की हमने पैरवी की थी, भाई आप तो ऐसा कह रहे है कि उस समाचार चलाने से हमें कोई भला होने जा रहा था, अरे सामान्य समाचार था, आरएमएस में बच्चे हड़ताल कर रहे थे, उन्होंने कहा कि भैया हमारी मदद करें, तो मैंने ईटीवी को फोन लगाया, न कि आपको। सबूत मेरे पास है। संयोग से आपने हमें फोन किया और मैंने आपको वस्तुस्थिति की जानकारी भी दी और एक बात और बता दूं उस दिन मैंने कशिश, न्यूज 11 और वाईबीएन को भी सूचना दी थी, मकसद साफ था, बच्चों को उसका हक मिल जाये, अगर आपको लगता है कि ये गलत है तो भगवान आपको सद्बुद्धि दे।
3. आपने लिखा कि आपने संस्थान का नाम लिया, हां मुझे लेना पड़ा, क्योंकि वहां कार्यरत वरिष्ठ कार्मिक ने आपको ईटीवी के नाम से ही अंदर जाने दिया और आपको विशेष सुविधा मुहैया करायी, नहीं तो आपको मालूम होगा कि वहीं पर कई लोग जो घंटों से लाइन में लगे थे, जो सुविधा आपको मिली, वो उनको नहीं मिल पाई। एक महिला, जो बल की कार्मिक थी, उसे गुस्सा होकर, वहां से जाना पड़ा।
4. हां पत्रकार को अवकाश मिलना चाहिए, हां पत्रकार को भी परिवार होता है, पर उसकी आड़ में जब वह दूसरों के परिवार की चिंता नहीं करता है, तो वह पत्रकार कहलाने लायक नहीं है।
5. आपने लिखा है कि मेरे संग काम करते वक्त आपकी कोई शिकायत हम तक क्यों नहीं पहुंची? मैं बेवजह किसी की शिकायत पर विश्वास नहीं करता, पर मैंने देखा है कि लोग हमारी ही शिकायत, वह भी बेवजह करके हमें ही धकेल कर सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गये, जिसकी चिंता हमें कभी नहीं रही, ऐसे भी ये जो हमने पोस्ट किया है, वो किसी की इज्जत के साथ खेलने के लिए नहीं किया, ये अलग बात है कि लोग इसे गलत अर्थों में ले रहे है।
6. आपने लिखा संस्थान ने हमें रोटी और नमक खिलाया। अरे भाई संस्थान ने हराम में खिलाया क्या? मैंने परीक्षा दी, पास हुआ, इंटरव्यू दिया, पीटीसी की परीक्षा दी, तब जाकर हमारा सेलेक्शन हुआ. हमने दिन-रात मेहनत की, हमारा भी संस्थान को चमकाने में योगदान है, ऐसे में ये कहना कि संस्थान ने आपको रोटी दी, ये कहना शत प्रतिशत गलत है और अगर ऐसा नही है तो वही संस्थान बिना सेवा के हमें रोटी क्यों नहीं खिला देता। अरे भाई कोई भी व्यक्ति जो संस्थान खोला है, वो देश – सेवा के लिए नहीं खोला, अपना व्यवसाय चला रहा है, ये तो आपको भी मालूम है। मैने देश की रोटी खाई है, और आज भी हमें देश खिला रहा है, ईश्वर सारी व्यवस्था कर दे रहा है, वहीं ईश्वर जो आपकी भी व्यवस्था करता है, ये अलग बात है कि आप इसका श्रेय भी संस्थान को दे देते है।
7. आपने लिखा है कि मैंने कई संस्थानों में काम किया और कही टिक नहीं पाये, हर जगह से हमको धक्का देकर निकाल दिया गया। अरे भाई एक संस्थान का नाम तो आप भी जानते होंगे, जिस संस्थान में आप काम कर रहे है? तो भाई धक्का मार कर निकालने का प्रमाण पत्र आपके पास अवश्य होगा, आप क्यों नहीं वो प्रमाण पत्र धक्का मार कर निकालनेवाला सभी को दिखा देते है, ऐसे तो मैं जानता हूं कि मैंने ईटीवी को स्वयं छोड़ा और हाल ही में आईपीआरडी से स्वयं को मुक्त कर लिया, भाई इतना सच लिखेंगे तो दिक्कत होगी न, चिल्लाने और लिखने से अच्छा है कि लोगों को प्रमाण दे, जैसा कि मैं प्रमाण देकर लिखता हूं।
8. मैं हार गया हूं कि हताश हो गया हूं, ये वक्त बतायेगा। वक्त ये भी बतायेगा कि आज मैं सही हूं या गलत। कोई व्यक्ति किसी के बारे में सही या गलत नहीं बता सकता। समय पर छोड़िये और रही बात कौन सच है या कौन झूठ, वो तो तस्वीर आइने की तरह साफ है।
अंत में, मैं आपका जवाब नहीं देता, पर सोचा कि अगर जवाब मैं नहीं देता हूं तो लोग समझेंगे कि अरे मनोज ने ऐसा लिखा कि कृष्ण बिहारी मिश्र की बोलती ही बंद हो गयी।
ऐसे आप जैसा समझे, मेरे बारे में…
मैं वहीं हूं
कबीरा खड़ा बाजार में, लिये लुआठी हाथ।
जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।।

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