लफुआ, लम्पट, पत्रकार और मैनेजमेंट !

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पत्रकारों का इस्तेमाल लोकल लफुए और लफंगे अपना असर बढ़ाने में करते हैं। अनपढ़ पत्रकार लोकल लफुओं को माफिया घोषित करते हैं और मुलायम या लालू टाइप नेता लफुओं का इस्तेमाल करते हैं।

pressइनका इंटव्यू करके पत्रकार को लगता है, बड़ा तीर मार लिया। वो गधा नहीं समझ पाता कि सनसनीखेज खबर बनाने के चक्कर में वो खुद कैसे इस्तेमाल हो रहा है और एक लफुए को भइया भइया कहते कितना दयनीय दिख रहा है।

डरे हुए गुलाम मानसिकता वाले समाज में गुरु, मौलाना से लेकर आइ एस आइ तक इन लफंगों का कनेक्शन बनते देर नहीं लगती।

सब उन्हें राबिनहुड की छवि देने के लिए बेचैन रहते हैं ताकि विवेक और अंतरात्मा को तिलांजलि देने में शर्म न लगे। इस कड़ी में शहाबुद्दीन, पप्पू यादव, आनंद मोहन, राजा भैया, मुख़्तार अंसारी, सूरजदेव सिंह जैसे सैकड़ो नाम आते जाते रहे हैं।

अब कोई खान मुबारक है- उसे दो चार बंदूकधारी लफुओं के बीच बैठे दिखाया जा रहा है। मूर्ख पत्रकार, ये तो सोच कि तू किसे मजबूत बना रहा है, किसका महिमामंडन कर रहा है ? किसकी रंगदारी दर बढ़ा रहा है ? लानत है उस बुद्धि पर जिसे अपराधियों से सम्बन्ध पर गर्व होता है !   

………वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा अपने फेसबुक वाल पर।

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