लक्षमणपुर बाथे नरसंहारः न्याय पर उठा सबाल

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राजनामा.कॉम(मुकेश भारतीय)।  बिहार के जहानाबाद जिले के लक्षमणपुर बाथे गांव में जिस नगसंहार को देश के तात्कालीन राष्ट्रपति एपीजे कलाम ने राष्ट्रीय शर्म की संज्ञा दी और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी घटना की दर्दनाक तस्वीर देखते ही रो पड़े थे, उस कुकृत्य के सारे आरोपियों को पटना हाई कोर्ट ने रिहा कर दिया है।

रिहाई के इस फैसले को किसी भी दृष्टिकोण से न्याय नहीं कहा जा सकता। आरोप तो यहां तक लग रहा है कि जिस वर्गवाद और सामंतवाद की छांव में इस तरह के पशुवत व्यवहार हुये, उसकी जड़ें व्यवस्था में कितनी मजबूत है

bhathe1इस महा अमानवीय घटना का सार है कि 1 दिसबंर, 1997 को प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन रणवीर सेना से जुड़े एक दबंग जाति के लोगों ने कुल 27 महिलाओं व 10 बच्चों समेत 58 लोगों की गोली मार कर सामूहिक हत्या कर दी। मरने वाले सभी दलित जाति के लोग थे। इस नरसंहार ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।

इसमें कुल 45 लोगों को नामजद अभियुक्त थे। जिसमें अप्रैल,2010 में पटना के व्यवहार अदालत के न्यायाधीश विजय मिश्रा ने 26 अभियुक्तों को दोषी करार दिया और16 अभियुक्तों को फांसी व दस को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। शेष 19 अभियुक्तों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया। इसी मामले की सुनवाई करते हुये विगत 9 अक्टूबर,2013 को पटना हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को गलत ठहराते हुये सभी 26 दोषियों को रिहा कर दिया

पटना हाई कोर्ट ने उस नरसंहार के शिकार कमजोर दलित वर्ग के लोगों के परिवारों को मोटर वाहन कानून की धारा-163 ए के तहत मुआवजा देने का आदेश भी दिया है। यही नहीं, पटना हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति बी. एन. सिन्हा तथा न्यायमूर्ति अमरेश कुमार लाल की खंडपीठ ने निचली अदालत को 12 सप्ताह के अंदर न्यूनतम मजदूरी के अनुसार मुआवजे की राशि तय करने को कहा है। मुआवजे की राशि तय होने के बाद अरवल के डीएम को चार सप्ताह के भीतर मृतकों के आश्रितों व घायलों को राशि का भुगतान करने का आदेश दिया है।

वेशक पटना हाई कोर्ट के इस फैसले ने कई तीखे सबाल खड़े कर दिये हैं। अगर सारे अभियुक्त निर्दोष हैं तो नरसंहार करने वाले कहां है ? नरसंहार में मारे गये लोगों पर को भी मोटर वाहन कानून की धारा-163 के तहत मुआवजा मिलनी चाहिये ?

सच पूछा जाये तो यह फैसला पुलिस-प्रशासन से लेकर अदालतों में व्याप्त सामंतवाद की मानसिकता को दर्शाता है और इसे कमजोर वर्ग के लोगों में न्याय को लेकर असंतोष व असुरक्षा पैदा करने वाला से इतर कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

वक्त का तकाजा है कि न्यायालयें अपनी अंतरात्मा को जाति-वर्ग से उपर उठ कर टटोले और मानवीयता की परिधि में न्याय करे। समाज के वुद्धिजीवी वर्ग के लोग भी सरकार पर न्याय की स्थापना के लिये दबाव बनाये। अन्यथा लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का भगवान ही मालिक है। लोगों का कानून पर से विश्वास उठ जायेगा।  

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One comment

  1. nahi aisa nai hai mukesh sirji. Tabto aapne shayad hamare kshetra me faile maowadiyo ke aatank ki gaatha nai jante. Yaha dabang aur dabe kuchalo baat hin nai hai. Kya ap jante han ki inhi chand dabe kuchale logo ne hum sav ke bahu betiyo ke asmat ke saath kaisa khel khela tha . Tab to ap jaise mahanubhavo ke kalam ne ku6 v nai likha tha . Pata nai aisa qu.? Aaj IPF ka aatank hamare kshetra me nai hai to wajah sirf unki o ghinauni kartut hai . Mai nai kahata ki ye sab a6a hua tha us waqt pr hum karte v to kya karte . Mai v Bhojpur jile ka hin niwashi hum so ap hamare dard ko v samjhe to sach aur galat ka aakalan kr payenge aap. Kheti hum krte the aur fasal unki ho jaati thi. Hamari bahu betiya sham dhalane se pahale hin gharo me dubk jaati thi. Hum sham dhalte hin apne aashiyane me aajate the . Tab v koi neta ya party ku6 nai bol paye the o v to ek vote bank ki rajneeti thi . Tab to aapne kuchh nai likha tha . Aisa q.?

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