रेंगने को मजबूर क्यों हुआ एन डी टीवी ?

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तब आपातकाल का अंधा युग था। ‘सेंसर’ के तलवार के नीचे प्रेस कराह रहा था।नागरिक मौलिक अधिकार छीन लिए गये थे।प्रेस को झुकने के लिए कहा गया, वह रेंगने लगा। सभी नहीं। कुछ अपवाद थे जिन्होंने सरकारी तानाशाही के आगे झुकने की जगह जेल जाना पसंद किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काले कानून, तानाशाही को उन पत्रकारों ने अस्वीकार कर जेल के सींखचों का वरण किया।पत्रकारीय मूल्य को जीवित रखने वाले वे अपवाद कालान्तर में आदर्श के रुप में पूज्य हुए।पत्रकारिता के विद्यार्थियों के ‘रोल मॉडल’ बने।

....अपने फेसबुक पर वरिष्ठ संपादक पत्रकार एसएन विनोद
….अपने फेसबुक पर वरिष्ठ संपादक पत्रकार एसएन विनोद

आज आपातकाल नहीं है। सत्ता में वे राष्ट्रभक्त हैं जो इंदिरा गांधी के “कुशासन और भ्रष्टाचार” के खिलाफ जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के झंडाबरदार बने थे। आपातकाल में बंदी बन जेल में रहे। भारत की दूसरी आज़ादी की सफल लड़ाई के सिपाही थे आज के ये शासक। ओह! फिर आज ये प्रेस अर्थात् मीडिया को पंगु क्यों बना रहे हैं? मीडिया पर साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना उन्हें रेंगने को मजबूर क्यों किया जा रहा है? पत्रकारिता के स्थापित मूल्यों, मान्य सिद्धांत के साथ उन्हें बलात्कार करने को मजबूर क्यों किया जा रहा है? विरोध के स्वर को दबा कर, सच/तथ्य को सतह के नीचे दबा कर लोकतंत्र की नींव को कमजोर क्यों किया जा रहा है? सत्ता-स्तुति, एकपक्षीय जानकारी के लिए मीडिया को मजबूर कर कोई शासक जनता के दिलों पर राज नहीं कर सकता।इतिहास के पन्ने इसके गवाह हैं।

इस शाश्वत सत्य की मौजूदगी के पार्श्व में अगर वर्तमान सरकार, जे पी के अनुयायियों की सरकार, मीडिया को कुचलने का प्रयास करती है, तो इसे ‘विनाश काले, विपरीत बुद्धि’ की अवस्था निरुपित करने को मैं मजबूर हूँ। हाँ, चूँकि अन्य देशवासियों की तरह मैंने भी2014 में विश्वास व आशा के साथ नरेंद्र मोदी के “परिवर्तन” के आह्वान का साथ दिया था, चाहूँगा कि मेरे इस आकलन, इस आशंका को सत्ता गलत साबित कर दे। क्या देश के’प्रधान सेवक’ पहल करेंगे?

पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना के सफल “लक्षित हमले” (सर्जिकल स्ट्राइक) के बाद शुरु सर्वथा अवांछित, अशोभनीय राजनीतिक बहस को क्रूर विस्तार दिया मीडिया ने।कुछ ऐसा कि अपने घर में ही विभाजन का खतरा पैदा हो गया-सेना के मनोबल को दांव पर लगा दिया गया।

पाकिस्तान के खिलाफ राजदलों की एकजुटता के बावजूद मीडिया सन्देश ऐसा मानो विपक्ष देश का दुश्मन है ! मुद्दा आधारित टिप्पणी करने वाले,सत्याधारित विश्लेषण कर निष्पक्ष निष्कर्ष के कतिपय पक्षधरों ने जब कर्तव्य निर्वाह करते हुए सचाई प्रस्तुत करने की कोशिश की तो उनके खिलाफ चाणक्य की नीति-साम, दाम, दंड, भेद अपनाई गई।

एन डी टीवी इसी नीति का शिकार हुआ प्रतीत हो रहा है।सच के पक्ष में अपवाद की श्रेणी के इस खबरिया चैनल को झुकता-रेंगता देख पत्रकारिता की आत्मा कराह उठी है।सच जानने को इच्छुक देश तड़प उठा है। पत्रकारिता के विद्यार्थी हतप्रभ हैं, एन डी टीवी के नये बदले चरित्र और चेहरे को देख कर।चैनल ने घोषणा की थी अपनी वरिष्ठ, हाई प्रोफाइल पत्रकार बरखा दत्त द्वारा ली गई पी. चिदम्बरम के साक्षात्कार के प्रसारण की। अंतिम समय में कार्यक्रम रद्द कर दिया गया।शर्मनाक तो ये कि चैनल ने ऐसा राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किया।बात यहीं ख़त्म नहीं होती।

चैनल ने घोषणा कर दी कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रतिकूल रुप से प्रभावित करने वाली किसी खबर या कार्यक्रम का प्रसारण नहीं करेगा।”राष्ट्रभक्त”और”सिद्धांतवादी” के इस मुखौटे के पीछे का सत्य भयावह है।सच ये कि एन डी टीवी भी झुक गया, एन डी टीवी को भी झुका दिया गया।हाँ, कड़वा सच यही है।मुलायम सरीखे राजनेता की तरह प्रणब रॉय भी अंततः टूट गये।

देर-सबेर प्रणब को झुकाने वाले, तोड़ने वाले हाथ-हथियार भी सामने आ जायेंगे।लेकिन,लोकतांत्रिक भारत का स्वाभिमानी मीडिया आज निर्वस्त्र कोठे पर बैठ जिस प्रकार रुदन को विवश है, क्या कोई हाथ उसकी “लाज” के रक्षार्थ अवतरित होगा ?

भारत, भारतवासी प्रतीक्षारत हैं कि प्रणब रॉय भी करवट लें ! और, प्रतीक्षा इस बात की भी कि जे पी के शिष्यों की आत्मा भी अंततः करवट लेने को मजबूर होगी-आज़ाद मीडिया के हक़ में।

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