रुला जाती है इस रिकार्डधारी राजेन्द्र कुमार साहु की संघर्ष कहानी

Share Button

RAJENDRA SAHUराजनामा.कॉम (मुकेश भारतीय) वेशक झारखंड की राजधानी रांची के मोराबादी मैदान के पास अपनी दांतो की ताकत से एक साथ दो 709 और एक LP ट्रक खींच कर रिकार्ड बनाने वाले राजेन्द्र कुमार साहु सरीखे विरले ही होते हैं। लेकिन उनसे बातचीत और ग्रामीण स्तर पर पड़ताल के बाद उनकी जो राम कहानी उभर कर सामने आती है…यूं ही रुला जाती है।

rajendra sahu anandi
अपनी बूढ़ी मां के सहारे दो वक्त की रोटी के लिए राशन दुकान चलाते राजेन्द्र साहु

37 वर्षीय राजेन्द्र कुमार साहु  अभी अविवाहित हैं और उन पर परिवार की जिम्मेवारियों का पहाड़ लदा है। फिलहाल वह आजीविका के लिए गांव में ही अपनी बुढ़ी मां के साथ मिल कर एक छोटे से राशन दुकान (जेनरल स्टोर) चलाते हैं। उनके पिताजी काफी वृद्ध हो चले हैं।

11 जनवरी 1977 में ओरमांझी प्रखंड के आनंदी गांव में गरीबी और बदहाली की जमीन पर पैदा हुए राजेन्द्र कुल 4 बहनों और दो भाई में सबसे छोटे हैं। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा गांव के सरकारी स्कूल पूरी करने के बाद ओरमांझी एस एस हाई स्कूल से मैट्रीक तक की पढ़ाई। इस दौरान खेती-बारी करने के साथ गाय, बकरी चराते थे।

उसके बाद पारीवारिक आर्थिक स्थिति के मद्देनजर काम की तलाश में नई दिल्ली चले गए। वहां कई दिनों तक रेलवे जंक्शन के फुटपाथ पर सोना पड़ा। उसके बाद एक अज्ञात व्यक्ति ने उन्हें होटल में काम दिला दिया।

मिट्टी का घर और दरवाजा पर खड़े राजेन्द्र के वृद्ध पिता
मिट्टी का घर और दरवाजा पर खड़े राजेन्द्र के वृद्ध पिता

वहां वे थाली-प्लेट-गिलास धोने के काम करते थे। उस समय खाने-पीने के आलावे प्रति माह 400 रु. मिलते थे। यह वर्ष 1994 की बात है। 6 माह तक यहां काम किए। अन्य कहीं भी अच्छे काम की तलाश करते तो हर जगह गारंटर मांगा जाता था। फिर वापस चले आए।

वहां से गांव वापस आने के बाद मौलाना आजाद कॉलेज रांची से इंटर की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद हजारीबाग के चरही चले गए। वहां पर करीव ढेड़ वर्षों तक एक ईंट-भठ्ठा में लेबर (गाड़ी पर ईंट लादना और उतारना) काम किया।

उसके बाद चरही में ही एक व्यक्ति के साथ कोयला काटने (चारी करने) के काम करने लगे। उस कच्चे कोयले को जलाकर जमा करते थे। चोरी का कोयला बेचने वाले खरीद ले जाते थे। उसस समय 300-400 रोज हो जाते थे। यह वर्ष 1997 की बात है। करीब एक साल तक यह काम किए।

फिर चरही से ही लुधियाना चले गए। पैसे की कमी के कारण वहीं भी कई दिनों तक रेलवे स्टेशन पर सोना पड़ा। कई दिनों तक काम नहीं मिला।

अपने मिट्टी के घर के दरवाजे पर अच्छे दिन के इंतजार में खड़ा राजेन्द्र
अपने मिट्टी के घर के दरवाजे पर अच्छे दिन के इंतजार में खड़ा राजेन्द्र

तब एक वृद्ध व्यक्ति ने मदद की और इंटर के सर्टिफिकेट की पहचान पर एस स्वेटर बुनाई की फैक्ट्री में काम करने लगे। वहां करीब 6 माह तक 1500 रुपए प्रति माह पर साफ सफाई झाड़ू लगाने का काम किया।

सीजन ऑफ होने पर वहां से वे फिर दिल्ली चले आए। वहां कपड़ा रंगने की फैक्ट्री में मजदूरी करने लगे। यहां पर भी 1500 मिलते थे। करीब 5 माह तक काम किए।

उसके बाद पीलिया से ग्रस्त हो गए। ईलाज के पैसे न थे…मुफ्त ईलाज कराने के लिए लुधियाना लौट गए। जब रोग ठीक नहीं हुआ तो घर वापस आ गए।

जब ठीक हुए तो स्थानीय मधुबन होटल में बीयर बार में काम करने लगे। यह वर्ष  1998 की बात है। यहां शुरु में 600 और धीरे-धीरे बढ़ा कर 1800 प्रति मिलने लगे।

यहां पर एक वेटर से दोस्ती हो गई। वह बंबई से आया था।

उसके कहने पर बंबई चले गए। उसने जो पता दिया था वह गलत था। वहां जाकर बिल्डिंग में बेगारी (कुली) का काम करने लगे। 4000 रु. हर माह हो जाते थे। करीव एक साल यह काम केओ। उसके बाद 3000 रु. प्रति माह पर एक जेरोक्स दुकान में नौकरी कर ली।

6 माह बाद घर वापस आ गए और फिर मधुवन होटल में 2500 प्रति माह पर कैशियर का काम करने लगे। उसके बाद करीब एक साल तक 3000 रु. प्रति माह पर डेमोटाड़ हजारीबाग के मानसरोबर होटल में मैनेजर का काम किए।

उसके बाद वापस घर आ गए लेकिन गांव में बेकारी के कारण मन नहीं लगा तो अपना सायकिल-कैमरा 800रु. में बेच कर पुनः मुबंई चले गए। लेकिन वहां दुर्भाग्यवश एक दुर्घटना में वायां पैर फ्रेक्चर हो गया। फिर घर लौट आए।

उसके बाद रातु के एक होटल में वेटर का काम करने लगे। यहां पर उन्हें 3-4 हजार रुपये हो जाते थे। वहां से फिर कोकर के एक ढाबा में 4000 हजार रुपये प्रति माह पर कैप्टन का काम करने लगे।

इस तंगहाली में भी 16 टन का भार अपनी दांतो से खींचने वाले राजेन्द्र का और बड़ा रिकार्ड बनाने प्रयास जारी
इस तंगहाली में भी 16 टन का भार अपनी दांतो से खींचने वाले राजेन्द्र का और बड़ा रिकार्ड बनाने प्रयास जारी

यहां से वे फिर बंबई गए लेकिन इस बार पैसे की कमी दूर करने के लिए कोई नौकरी की तलाश में नहीं अपितु, मटका (एक तरह का जुआ) सेटिंग करने के ख्याल से गए थे। लेकिन इसमें वे असफल रहे और घर वापस आ गए इस चैलेंज के साथ कि जब खुद बंबई नहीं बुलाएगी…नहीं आउंगा।

इसके बाद वे खेती बारी आदि के काम में जुट गए। लेकिन खेती-बारी से घर-परिवार को संभालना बड़ा मुश्किल था। अंततः उन्होंने सूद पर कर्ज लेकर गांव में ही बाद एक छोटी सी राशऩ की दुकान खोल ली जो, अभी भी राजेन्द्र के परिवार के जीविका का मूल आधार बना हुआ है।

बहरहाल, राजेन्द्र कोई नाम नहीं बल्कि गरीबी और बदहाली की कोख से जन्मा एक संघर्ष का नाम है। उसकी राम कहानी कुछ यूं ही बयां करती है। अपनी दांतो की ताकत से एक साथ दो 709 और एक LP ट्रक खींच डालना कोई मामूली बात नहीं है। संसाधनो के आभाव के बीच कोई रिकार्ड करिश्मा ही होता है।

लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे प्ररणास्रोत रिकार्डधारी युवक के प्रति समाज और सरकारें अपनी आंख और कान नहीं खोल पाते। राजेन्द्र की आगे की कहानी में और भी कई  ऐसे संघर्ष छुपे हैं, जो मात्र चिखते हैं….  “ उपेक्षा न गई प्रतिभा की दर से ”।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...