रिस्क नहीं चुनौती है ‘नो निगेटिव न्यूज’ की पहलः अमरकांत

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निगेटिव और पॉजिटिव दो विपरित धाराएं हैं। लेकिन पत्रकारिता में  इसके अपने-अपने मायने हैं। हर सूचना किसी के लिये निगेटिव होती है तो किसी के लिये पॉजिटिव। यह एक सोच है या सच, सदैव एक चिंतन का विषय रहा है। क्योंकि  किसी भी सूचना-समाचार के संकलन, लेखन, संप्रेषण, संपादन और प्रकाशन के बीच भाषा, शैली और तत्थों की सूक्ष्म पड़ताल ही सब कुछ तय करता है कि उसका स्वरुप क्या होगा ।

ऐसे में देश के जाने-माने हिन्दी दैनिक भास्कर ने ‘नो निगेटिव न्यूज’ की पहल की है। अखबार की इस पहल को लेकर रांची संस्करण के स्थानीय संपादकः अमरकांत   से  राजनामा.कॉम के संपादकः मुकेश भारतीय ने खास बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के अंश…..

amarkant_bhaskarसप्ताह में एक दिन ‘नो निगेटिव न्यूज’ जैसी पहल के पीछे  दैनिक भास्कर का मूल मकसद क्या है?

…..दिन की शुरुआत सुबह से होती है और सप्ताह की शुरूआत सोमवार से। हम मानते हैं कि सुबह खराब होने से दिन खराब होता है। पहला दिन खराब होने पूरा सप्ताह खराब हो जाता है। दूसरी तरफ निगेटिव चीजों को दबाकर पॉजिटिव चीजों को सामने लाना। आज ग्लोबल थिंकिंग हो रहा है कि पॉजिटिव चीजों को सामने लाया जाये।

आज पत्रकारिता में नकारात्मकता की चर्चा अधिक की जाती है। पॉल्टिक्स और व्यूरोक्रेट से जुड़े लोग अधिक करते हैं। इसे आप किस रुप में देखते हैं ?

…...आप चीजों को परोसते कैसे हैं या फिर परोसना कैसे चाहते हैं, सब कुछ इस पर डिपेंड करता है। याद होगा कि दैनिक भास्कर ने शुरु से ही निगेटिव चीजों को, मान लीजिये कि किसी की हत्या हो जाए, उसे मेन पेज पर या अंदर-लास्ट पेजों पर फोटो के साथ लगा कर देते हैं तो पाठक की जिस विभत्सता को देख शुरुआत होता है, वैसा हम नहीं चाहते हैं। हम लाश की खबर छापना लगभग न छापना शुरु किये। नक्सल एक्टिविटिज की खबरों को भी कभी-कभी हीं छापना शुरु किये। जब  हम छापते हैं कि बंद कर दिया।उसने ये कर दिया। वो कर दिया।तो इससे उनका मनोबल ही बढ़ता है। वे और आगे आकर अपना काम करने लगते हैं। जब हमने उन चीजों को इग्नोर करना शुरु कर दिये तो कुछ हद तक उसमें कमी आ गई। 

आपने एक संपादक पत्रकार के रुप में नो  निगेटिव न्यूज के प्रवेशांक को लेकर कैसा महसूस किया ?

……देखिए, अखबार की इस पहल को लेकर पहले दिन हम इस बात को लेकर परेशान थे कि हम जोव नया अभियान शुरु कर रहे हैं, वह पहले दिन कितना सफल रहेगा या असफल। कहीं कोई निगेटिव चीजें न सामने आ जाए, जिसे हमें छापना पड़े। मान लीजिये हम नो निगेटिव न्यूज मुहिम छेड़ रहे हैं और छापना पड़ जाये कि शहर में दिन दहाड़े कोई हत्या हो जाये तो क्या करेगें, उस खबर को छापना ही पड़ेगा। हां पर यहां हम यह जरुर देखेगें कि किस रुप में परोसा जाए।

दैनिक भास्कर के जो प्रतिस्पर्द्धी अखबार हैं,वे आपकी इस मुहिम को किस रुप में देख रहे हैं ?

…….आज सुबह से ही सभी बड़े अखबारों के अंदर दैनिक भास्कर की इस मुहिम की काफी चर्चाएं हैं। लेकिन इस मामले में पटना का अखबार दुर्भाग्यशाली रहा कि मुजफ्फरपुर वाली घटना हो गई। अगर सामने कोई बड़ी निगेटिव खबर है और उसे छापगें ही। और अगर आप उसे लीड छापते हैं तो आपका नो निगेटिव न्यूज की मुहिम कहां रहा। यह एक बड़ी चुनौती तो है।

 आप कहना चाहते हैं कि ऐसे मुहिम का मकसद सूचनाओं को प्रस्तुत करने का नजरिया बदलना है, सूचनाओं को रोकना नहीं ?

…..बिल्कुल। उसे रोकने का तो सबाल ही पैदा नहीं होता है। आप देखेगें कि आज हमारे अखबार के नो निगेटिव न्यूज मुहिम के पहले अंक में ही पेज एक पर भी है। दो पर भी है। अन्य पेज पर भी है। अगर कोई बड़ी घटना हो रही है तो हमारे पाठक को जानने का हक है कि कहीं लूट हो गया, डकैती हो गया, कहीं मर्डर हो गया तो उसे जानने का हक है। लेकिन हम उन्हें उसी कैप्सन के अन्तर्गत दे रहे हैं। हम उन्हें बता रहे हैं कि इन चीजों को महिमामंडित नहीं करेगें। मेरा कहना है कि सोमवार को सप्ताह की जो शुरुआत हो रही है,उसके पहले दिन हम गंदगी की ओर नहीं ले जायेगें। और अगर समाज में कहीं ऐसा कुछ हो रहा है, उससे बंचित भी नहीं करेगें।

पत्रकारिता के हाल के वर्षों  में इभनिंगर अखबारों का दौर चला, उसकी लोकप्रियता की तह में कुछ ऐसा ही था। बाद में उस ट्रेंड को  दैनिक अखबारों ने हड़प लिया। अब उससे मुक्ति संभव है?

….हम यही कहना चाह रहे हैं कि अखबार में यह मान लिया गया है कि निगेविटी ही खबर है। कोई अच्छा काम हो रहा है समाज में, उसे हम छोटे में निपटा देते हैं। और कहीं कोई घटना है तो उसे बड़ा तूल दे देते हैं। किसी अधिकारी के घर में छापा पड़ रहा है। किसी व्यवसायी की दुकान में छापा पड़ रहा है। उसे लेकर कोई यह नहीं देखता है कि उसमें मिला क्या। फिर भी अलंकार पर अलंकार कर ऐसे परोसते हैं कि मानो सीबीआई, विजिलेंस, इनकम टैक्स आदि एजेंसियों की बड़ी कार्रवाई हो।

पाठकों का एक बड़ा वर्ग भी मिर्च-मसाला जैसी खबरों में रुचि नहीं दिखाते ?

..…ऐसा हम मानने लगे हैं। लेकिन इसमें उतनी सच्चाई नहीं है, जैसा भ्रम का महौल दिखता है। लोगों में संवेदनशीलता की चाह बढ़ी है।

दैनिक भास्कर के जो प्रतिस्पर्द्धी अखबार हैं, अगर वे अपनी नीति में कोई बदलाव नहीं लाते हैं तो कहीं आपको ऐसा नहीं लगता है कि इसमें बड़ा रिस्क है ?

….देखिये, कहीं भी किसी से हम यह कंपलेन नहीं कर रहे हैं कि आप मेरे रास्ते पर चलो। लेकिन अगर हमारा रास्ता सही होगा तो मजबूरन वे भी  साथ आयेगें हीं।

लेकिन कहीं न कहीं तो आप यह महसूस कर ही रहे होगें कि इसमें एक बड़ा रिस्क है ?

……चुनौती है। रिस्क नहीं। चुनौती और रिस्क में फर्क है। देखिये हम पहले ही कह चुके हैं कि अखबार के मुहिम के पहले दिन का अंक कैसा होगा। हमारी तनाव इस बात को लेकर थी कि कहीं कोई बड़ी घटना न हो जाएगा और उसे हमें दबाना पड़ेगा। सच कहिये तो एक संपादक के रुप में हर रविवार को यह चिंता बनी रहेगी।

इन चुनौतियों से एक संपादक-पत्रकार के रुप में कैसे निपटेगें  ?

amarkant_editor….देखिये, एक संपादक नहीं, एक पत्रकार के रुप में हमें दिन भर कई मुश्किल चुनौतियों का सामना करना ही पड़ता है। और हमलोग इन चुनौतियों के बीच धीरे-धीरे ही सही चल ही लेते हैं। आगे भी चल ही लेगें। जब हम जागरण छोड़ के भास्कर ज्वाइन किये थे। यहां की पॉलीशी रही कि लाश मर्डर की फोटो नहीं छापनी है। बलात्कार की खबर दबानी है। तब भी मेरे मन में यह ख्याल आ रहे थे, जैसा कि आज आ रहे हैं कि जब मेरे प्रतिस्पर्द्धी अखबार ऐसा कुछ छाप रहे होगें तो उसे दबा के या नहीं छाप के हम क्या कर लेगें। लोकिन उस समय भी हम जो एक नया कांसेप्ट लाए कि कहीं कोई व्यक्ति की हत्या हो जाए तो व्यक्ति के लाश की तस्वीर न छाप के उसकी जिंदा वाली तस्वीर छापें। लेकिन वो एक बड़ा चुनौती वाला काम था कि किसी की हत्या हो जाए और उसके परिवार वालों से जिंदा वाली तस्वीर मांगी जाए। कल्पना कीजिये कि घर में मातम का महौल हो और कोई उनसे जिंदा वाली तस्वीर मांगी जाए तो कितनी विकट चुनौतियों का सामना करनी पड़ेगी।

संवाद संकलन से जुड़े मीडियकर्मी इन चुनौतियों का सामना कैसे कर पायेगें ?

…….देखिए, उन दिनों यह चुनौती थी लेकिन आज यह क्रेज बन गया है कि किसी की हत्या हो जाने पर लाश की तस्वीर नहीं छपती है बल्कि रोते-बिलखते परिजनों की तस्वीर छपती है।

आज पत्रकारिता एक व्यवसाय है। ऐसे में इस तरह की सोच और कल्पना का आपकी नजर में औचित्य ?

…….देखिये, सब कुछ की एक लिमिट होता है। हम जिन चीजों की कमाई खाते हैं, आज क्या है कि गंदगी को परोस कर के, मिर्च-मसाला लगा कर के चीजों को परोस रहे हैं। इससे समाज में गलत मैसेज जा रहा है। निगेटिव चीजें ही बिकती है। इस पर पुनर्विचार करने का दौर आ गया है।  

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