राज्यसभा की सदस्यता मुबारक हो हरिवंश जी

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कल एक अखबार के जाने माने व्यक्ति हरिवंश जी, जिन्हें इस बार जदयू की विशेष कृपा से राज्यसभा जाने का मौका मिला है, उनकी आत्मस्वीकारोक्ति पढने का मौका मिल गया। एक चाय की दुकान पर। एक मित्र ने कहा कि यार, बेशर्मी की भी हद होनी चाहिए। कोई इतना बेशर्म कैसे हो सकता है। एक दूसरे मित्र ने कहा कि इस आदमी की नजर में इस अखबार के जितने पाठक हैं,

जब मित्रों ने इतनी बातें कह दी तो लगा जैसे मुझे भी पढ लेना चाहिए। सचमुच मुझे ऐसा कुछ भी नहीं लगा। सिवाय इसके कि हरिवंश जी तो बिना पैसे के राज्यसभा पहुंच गये फ़िर रामनाथ ठाकुर और कहकशां परवीन के मामले में क्या हुआ होगा। मेरे हिसाब से हर आदमी अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है। फ़िर चाहे वह उतना नामी संपादक हो या फ़िर मुझ जैसा मीडिया का एक दिहाड़ी मजदूर। अब कोई बिना पैसे के विश्व दर्शन कर लौट आये तो उसे यह कहने से कैसे रोका जा सकता है कि उसने बिना पैसे के दुनिया देख ली। उसे यह भी बताने की आवश्यकता नहीं है कि क्यों और किस कारण से किसी ने उसके वर्ल्ड टूर का प्रबंध किया। यह उसका विशेषाधिकार है। इसलिए हरिवंश जी ने जो बातें कहीं, वह उनके अपने विशेषाधिकार के हिसाब से उचित ही है।

अब् रहा सवाल कि ऐसा हुआ कैसे? जदयू ने अब तक साबिर अली, किंग महेंद्र और भी न जाने किन-किन महानुभावों को राज्यसभा भेजा है। यह सब पब्लिक डोमेन में है। किंग महेंद्र की राजनीतिक औकात कितनी है, यह भी सब जानते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि पैसे लेकर राज्यसभा टिकट बेचने वाले दलों में अकेले केवल जदयू ही है। राजद ने भी इस बार प्रेमचंद गुप्ता को झारखंड से राज्यसभा के लिए रवाना किया है। गुप्ता साहब की राजनीतिक हैसियत भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है। बिहार भाजपा ने आर के सिन्हा को राज्यसभा भेजा। यह बात कहना हास्यास्पद ही होगा कि आर के सिन्हा एक राजनीतिक व्यक्ति हैं।

खैर, कहने को तो कईयों ने विजय माल्या और सचिन तेंदुलकर तक को राजनीतिज्ञ की संज्ञा दी है। कहने में कोई समस्या भी नहीं है। आखिर देश में लोकतंत्र है और एक संविधान भी है जो अभिव्यक्ति के अधिकार को सुनिश्चित करता है। सवाल यह नहीं है कि जदयू ने हरिवंश जी को राज्यसभा भेजने के लिए पैसे लिए या नहीं, सवाल ईमानदारी का है।

जरा सोचिये, अगर नीतीश कुमार ने हरिवंश जी से पैसे लिये भी होते तब भी क्या वे इतनी ही ईमानदारी से कहते कि हां भाई, मैंने 8 करोड़ रुपए में राज्यसभा सदस्य बनने का गौरव खरीदा है। निश्चित तौर पर ऐसा नहीं होता। अगर होता तो हरिवंश जी को कहने की जरुरत नहीं होती। देश के लोग सब समझते हैं। किंग महेंद्र और आर के सिन्हा को राज्यसभा सदस्य बनाकर जदयू और भाजपा ने भारत की जनता पर कोई अहसान नहीं किया है और न ही वे इतने महान हैं कि उनके बगैर राज्यसभा की बौद्धिकता खतरे में पड़ जाती।

 बहरहाल, सवाल यही है कि हरिवंश जी को अब क्या करना चाहिए अपनी नयी भूमिका में। माफ़ करिए मैं तो उनसे यह नहीं कहने जा रहा कि वह अपनी शैली में कोई परिवर्तन लायें। अब तक उन्होंने जैसे व्यक्ति विशेष के पक्ष में अपने लेखन को तिलांजलि दी है, उसे पूर्ववत बनाये रखें या फ़िर राज्यसभा में पहुंचकर देश के विकास में कोई अहम भूमिका का निर्वहन करें, यह उनपर निर्भर करता है और यह निर्णय लेने का अधिकार भी उनका ही है।

हां, भारत का नागरिक होने के नाते इतना जरुर कहूंगा कि राज्यसभा आपके अखबार का दफ़्तर नहीं है। इसलिए जो भी करिए, देश की जनता को ध्यान में रखकर करें। भारतीय लोकतंत्र को आपसे बहुत उम्मीद है हरिवंश जी। बस इतना ही, बाकी सब तो देश और बिहार की जनता जान ही चुकी है कि आप कितने ईमानदार और कितने महान हैं।

…. अपना बिहार वेबसाइट पर वरिष्ठ पत्रकार नवल कुमार की अपनी बात

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